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12वां पटना फिल्मोत्सव: फिल्मों में दिखा भारतीय समाज का बुनियादी अंतविर्रोध

  • द बैटल ऑफ भीमा कोरेगांव: दलितों के शौर्य, स्वाभिमान और संघर्ष का इतिहास

Patna:12वें पटना फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की शुरुआत डॉ सोमनाथ बाघमारे निर्देशित मराठी डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘द बैटल ऑफ भीमा कोरेगांव’ से हुई. भीमा कोरेगांव में जो विजय स्तंभ है, वहां हर साल लाखों अंबेडकरवादी और बौद्ध जुटते हैं. इस फिल्म में बहुजन बौद्धिक तथाकथित मुख्यधारा के इतिहास में भीमा-कोरेगांव में हुए ऐतिहासिक युद्ध की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं.
यह डाक्यूमेंट्री फिल्म पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ बहुजनराष्ट्र की परिकल्पना भी सामने रखती है. बुद्धिजीवी इसे बहुजन समाज का पहला स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं. यह फिल्म महार रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास से भी दर्शकों को रूबरू कराती है.

माई कास्ट : जातिवादी सामाजिक व्यवस्था का सच

आज प्रदर्शित अमुघन आरपी निर्देशित फिल्म ‘माई कास्ट’ भी जाति-व्यवस्था पर ही केंद्रित थी. तमिलनाडु के समाज में किस कदर परंपरागत तौर पर जातिवादी विषमता और भेदभाव बरकरार रहा है, उसे इस फिल्म ने दिखाया.

एमएसपी की जरूरत को दर्शाया ‘लूटिंग फार्मर्स एट द मंडी’ ने

डॉ. यशोवर्द्धन मिश्र निर्देशित मराठी फिल्म ‘लूटिंग फार्मर्स एट द मंडी’ एक बहुत कम अवधि की फिल्म थी, पर इसमें प्राइवेट मंडी द्वारा किसानों के निर्मम शोषण का यथार्थ बड़े प्रभावशाली तरीके से व्यक्त हुआ. एक सच्ची घटना पर आधारित इस फिल्म ने दर्शकों के हृदय को झकझोर कर रख दिया. इसे देखते हुए यह बखूबी समझ में आया कि किसान एमएसपी की मांग क्यों कर रहे हैं.

स्थानीय नौजवान फिल्मकारों की फिल्मों ने नयी संभावनाओं का परिचय दिया

आज एक विशेष सत्र में किलकारी नामक संस्था की ओर से बनाई गई स्थानीय युवा फिल्मकारों की तीन फिल्में दिखाई गईं. अमृत राज निर्देशित फिल्म ‘सम किड्स एंड मेनी ऑफ चिल्ड्रेन’ और अभिषेक राज निर्देशित फिल्म ‘एनफैन्सी ऑफ स्कारसिटी’ में बच्चों की दुनिया में मौजूद विषमता और वर्गीय विभाजन की स्थिति को दर्शाया गया.

प्राकृतिक संसाधनों की लूट, आदिवासियों की त्रासदी को दर्शाया ‘दी स्प्रिंग थंडर’ ने

राम डाल्टन की फिल्म ‘दी स्प्रिंग थंडर’ क्राउड फंडिंग यानी जनसहयोग के जरिए बनाई गई है. यह आदिवासी विरोधी विकास मॉडल पर सवाल तो उठाती ही है, प्राकृतिक संसाधनों की लूट और हिंसा की स्थितियों को भी दर्शाती है. फिल्म समीक्षक प्रशांत विप्लवी के अनुसार फिल्म यह दिखाती है कि ‘डेवलमेंट से सिर्फ पर्यावरण की ही क्षति नहीं होती है, बल्कि स्थानीय जीवन के परिवेश और मानवीयता की भी क्षति होती है.’

राहगीर होटल: संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों से घबराती सत्ता का सच

एकतारा कलेक्टिव की फिल्म ‘होटल राहगीर’ में एक होटल है, जिसका नाम होटल राहगीर है. वहां छात्रों, बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों का जुटान होता रहता है. होटल में टेलीविजन और बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों, प्रबुद्ध छात्र-छात्राओं और युवक-युवतियों का एक कंट्रास्ट निर्मित होता है. टीवी पर खबरें सरकार के एजेंडे के अनुरूप चलती रहती हैं, पर बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों- छात्र-छात्राओं की बातों में नए विमर्श हैं, ये विमर्श समाज के वर्चस्वशाली वर्ग, उसकी परंपराओं-रूढ़ियों और सत्ता के प्रचार से टकराते हैं.

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता भी फिल्में देखने पहुंच रहे

लॉक डाउन के बाद कोरोना के आतंक को तोड़ते हुए आयोजित हो रहे इस फिल्म फेस्टिवल में विभिन्न परिवर्तनकारी धाराओं के राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता फिल्में देखने पहुंचे. आज बिहार के तीन विधायक वीरेंद्र गुप्ता, अजित कुशवाहा और संदीप सौरभ भी दर्शकों के बीच मौजूद थे. फिल्मोत्सव में मधुबनी पेंटिंग के सामानों और किताबों का स्टॉल भी है.

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