न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

10 फीसदी सवर्ण आरक्षण से क्या मिलनेवाला है मुस्लिम समाज को

1,353

MZ KHAN 

लोकसभा चुनाव में मुश्किल से 60-70 दिन बचे हैं. वोटर्स को रिझाने के लिए वायदों की बरसात हो रही है. आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा और आयकर में 5 लाख की छूट की घोषणा इसी कड़ी का एक हिस्सा है. निशाना 5 करोड़ मध्यम वर्ग पर लगाया गया है. ये संवैधानिक संशोधन कोर्ट में टिक सके या नहीं, ये अलग मुद्दा है. इस आरक्षण से सवर्ण गरीब मुस्लिमों को भी रिझाने की कोशिश की गयी है. इस लुभावनी घोषणा से मुस्लिम कितने प्रभावित होंगे, ये विचार का विषय है.

पिछले पांच साल में, सच्चार कमिटी की रिपोर्ट के बावजूद, मुस्लिमों का कोई खास भला नहीं हुआ है. ये समाज भय और दहशत के माहौल में जीने को विवश है. न इन्हें नौकरी मिली और न वित्तीय संस्थानों से रोज़गार के लिए कर्ज. भाजपा सरकार ने हर साल 2 करोड़ नौकरी का वायदा किया था, जो सिर्फ़ जुमला साबित हुआ.

ये चुनाव निश्चित रूप से हंगामेदार और एतिहासिक होने जा रहा है. ये देश की दिशा और दशा तय करने जा रहा है. मतदाता शांत हैं. मुस्लिमों का भी वही हाल है जो अन्य समुदायों का है. मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर कुछ मुस्लिम तंजीमें आवाज़ बुलंद कर रही हैं. लेकिन इसमें संजीदगी कम, शोर ज़्यादा है. अगर ये तंजीमें गंभीर हैं तो इसके लिए सियासी जमातों पर दबाव बनाने की ज़रूरत है.

पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतों की बंदरबांट ने इनके वजूद को ही महत्वहीन बना दिया था. सियासी जमायतों ने ‘यूज़ एंड थ्रो’ की पॉलिसी पर अमल करते हुए इन्हें अस्तित्वहीन बना दिया है. हर चुनाव में  कुछ बिचौलिया किस्म के लोग और तंजीमें वोटों के सौदागर बनकर सामने आ जाती हैं. और इसका खमियाज़ा पूरी क़ौम को भुगतना पड़ता है.

जहां तक लोकसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात है तो आबादी के तनासुब में 70-75 मुस्लिम प्रतिनिधि संसद पहुंचने चाहिए. और ये तभी मुमकिन हो सकता है जब हम अपनी लड़ाई जम्हूरी तऱीके से और पुर वक़ार अंदाज़ में आगे बढ़ाएंगे. बिना सियासी भागीदारी के मुस्लिमों की समस्याओं का समाधान मुमकिन नहीं है.

SMILE

इस सच्चाई से भी किसी को इनकार नहीं कि चुनाव धर्म और ज़ात की बुनियाद पर लड़े जाते हैं. बिरादरियां अपनी आबादी के हिसाब से भागीदारी चाहती हैं, राजनीतिक दलों पर दबाव बनाती हैं. कभी-कभी इस दबाव के नतीजे में हिंसक आंदोलन खड़े कर दिये जाते हैं. इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं. अंत मे राजनीतिक दलों को इनके दबाव के आगे झुकना पड़ता है.

15% आबादी वाली मुस्लिम कौम अपनी सियासी मूर्खता के सबब सिर्फ़ वोट बैंक बनकर रह गयी हैं, जो इसके सियासी मुस्तक़बिल के लिए खतरनाक ही नहीं बल्कि देश की प्रगति के लिए बाधक हैं. इस अवधारणा को तोड़ना होगा. हर जगह नुमाइंदगी होनी चाहिये.

पार्टियों को भी चाहिये कि मुस्लिम उम्मीदवारों को मुस्लिम आबादी तक सीमित न किया जाये. इन्हें हिन्दू आबादी से उम्मीदवार बनाया जाये और उस मिथ्य को तोड़ा जाये, जो आज़ादी के बाद से अबतक चला आ रहा है. मौलाना आज़ाद जैसी शख्सियत भी रामपुर जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र से चुनाव लड़ने पर विवश हुई थी.

सियासी जामयतें जो खुद को सेक्युलर समझती हैं, उन्हें अपने चरित्र और व्यवहार में भी सेक्युलर बनने की ज़रूरत है. अगर ऐसा हो जाता है तो लोगों का मिज़ाज बदलेगा. सोच में तब्दीली आयगी और कटुता, संकीर्णता और धर्मान्धता धीरे-धीरे ख़त्म होगी. साम्प्रदायिक तनाव,झगड़े से देश को मुक्ति मिलेगी. चुनाव आते-जाते रहते हैं. सत्ता बदलती रहती है लेकिन सौहार्द की डोर कमज़ोर पड़ी तो नुकसान देश का है.

  इसे भी पढ़ेंः मुस्लिम समाज- गुजरात में कितना आसान है मुसलमानों का घर खरीदना

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
%d bloggers like this: