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हज कमेटी के पूर्व अध्यक्ष का सीएम से सवालः मुझे क्यों नहीं दिया राज्यमंत्री का दर्जा

Md. Asghar Khan

Sanjeevani

Ranchi, 19 October: झारखंड स्टेट हज समिति के तीन वर्ष का कार्यकाल 16 अक्टूबर को समाप्त हो गया. अगली कमेटी कब बनेगी और कौन लोग इसके ओहदेदार होंगे, इस पर सरकार की ओर से न कोई दिलचस्पी दिखाई जा रही है, न ही इसे लेकर कोई पहल हो रही है. इस बीच झारखंड हज कमेटी के पूर्व अध्यक्ष हाजी मंजूर अहमद अंसारी को उनके कार्यकाल के दौरान राज्य मंत्री का दर्जा नहीं दिया जाना, सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है.

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तीन साल में तीन पैसा भी नहीं मिला

राज्य में कई आयोग, समिति और संवैधानिक बोर्ड ऐसे होते हैं, जिनके अध्यक्ष या चेयरमैन को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त होता है.  जैसे अल्संख्यक आयोग, वक्फ बोर्ड, हज कमेटी, महिला आयोग, पिछड़ा आयोग आदि. राज्य के आयोग, बोर्ड समिति के अध्यक्षों को नियमानुसार मंत्री का दर्जा भी प्राप्त है. मगर मंजूर अंसारी इससे वंचित रहें. जबकि इससे पहले सभी हज समिति के चेयरमैन को यह लाभ मिल चुका है. ऐसे कई सवालों पर पूर्व अध्यक्ष एक ही बात बोलते हैं, ये मुख्यमंत्री साहब बताएं, मुझे क्यों नहीं दिया गया राज्यमंत्री का दर्जा ? मैं तीन साल में तीन पैसा तक नहीं जानता हूं सरकार का. 

कांग्रेसी होना का खमियाजा है?

मंजूर अंसारी पुराने कांग्रेसी हैं. पिता के समय से कांग्रेस पार्टी को अपनी सेवा देते आ रहे हैं. हज कमेटी के अध्यक्ष पद से पहले झारखंड कांग्रेस में कई अहम ओहदे (पद) पर भी रह चुके हैं. वहीं राज्य में पिछले तीन सालों से भाजपा की बहुमत वाली सरकार है. जब इन परिप्रेक्ष्य पर न्यूज विंग ने मंजूर अंसारी से सवाल किया, ‘क्या आपको राज्यमंत्री का दर्जा नहीं दिया जाना कांग्रेसी  होने की वजह है’ तब वो सवाल को टालते हुए कहते हैं कि ये तो मुख्यमंत्री ही जानते हैं. आपको उनसे ही ये सवाल करना चाहिए. ड्राईवर छोड़ दीजिए, मैंने तो तेल तक का पैसा अपनी जेब से खर्च किया है. वेतन समेत अन्य सभी तरह की सुविधाओं से वंचित रखा गया मुझे.

मुख्यमंत्री कहते थे-चिंता मत करिए, बस दर्जा अभी देते हैं

राज्यमंत्री का दर्जा ना मिलना मंजूर अंसारी को बहूत अखरता है. वह बताते हैंः इस बाबत मैं पांच बार मुख्यमंत्री रघुवर दास से मिला. हर बार आश्वासन दिया गया कि बस दर्जा देते हैं. उनके मुताबिक इस संबंध में मुख्यमंत्री रघुवर दास कहते थें, ‘चिंता मत करिए, हो जायेगा’. लेकिन फाइल हमेशा मुख्यमंत्री के दफ्तर में अटकी रही. मंजूर अहमद ने बताया, इसके लिए कांग्रेस विधायक इरफान अंसारी और आलमगीर आलम ने भी सीएम से अनुरोध किया. फिर भी फाइल पर दस्तख़त नहीं किया गया. पता नहीं उनकी नियत में क्या था.

वेतन मद का 32 लाख सरेंडर हो गया

हज समिति के अध्यक्ष, सदस्य और स्टाफ के वेतन के लिए 32 लाख रुपए का बजट था. लेकिन वो कागज तक ही सिमित रहा. किसी को कुछ नहीं मिला. मंजूर अहमद ने कहा कि अंत में सारी राशि लौट गई.

पिछली सरकार ने भी की गलतियां

राज्य में इस तरह की सरकारी संस्थाओं के लिए नियमावली बनी हुई है. पर झारखंड स्टेट हज कमेटी इससे वंचित है. नतीजा हर बार, हर काम के लिए मुख्यमंत्री के पास फाइल भेजकर अनुमति लेनी पड़ती है. मंत्री का दर्जा न मिलने के लिए मंजूर अंसारी पिछली सरकार को भी को भी जिम्मेदार मानते है. उन्होंने कहा कि पिछली सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहे हाजी हुसैन अंसारी अगर हज कमेटी की नियमावली बना दिए होते तो मुख्यमंत्री के पास फाइल भेजकर अनुमति लेनी की जरुरत नहीं पड़ती. जो इस पद पर आता उसको इसकी सुविधा ऑटोमैटिक मिलनी शुरु हो जाती.

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