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सीएनटी-एसपीटी एक्ट की तर्ज पर भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करने की तैयारी में विपक्ष 

Md. Asghar Khan
Ranchi :
 विपक्षी दल संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल 2017 का विरोध करने में जुट गये  है. इसे लेकर झारखंड की विपक्षी पार्टियां एक बार फिर सीएनटी-एसपीटी एक्ट की ही तर्ज पर सदन से सड़क तक उतर सकती हैं. दरअसल झारखंड सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल 2017 को कानूनी शक्ल देने के लिए फिर से केंद्र सरकार को भेजा है. गौरतलब है कि पिछली बार भेजे गये  इस बिल में केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने आपत्ति दर्ज कर इसे वापस लौटा दिया था. जिसके बाद राज्य सरकार ने कहा कि उसमें सुधार कर फिर से भारत सरकार को भेज दिया गया है. लेकिन इस बिल का विरोध विपक्षी पार्टियां ना सिर्फ संशोधित बिंदुओं को लेकर कर रही हैं, बल्कि इस बिल को अस्तित्व मैं  नहीं आने देने के पक्ष में है. विरोधी पार्टियों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण बिल 2013 के कई प्रावधानों को हटा दिया गया है. संशोधित बिल के अनुसार सोशल  इंपैक्ट और सहमति वाले बिंदुओं को खत्म कर दिया गया है. सरकार की मंशा है कि राज्य के लोगों को भूमिहीन कर पलायन के लिए मजबूर कर दिया जाये. बार-बार बिल में आपत्ति दर्ज करने के बावजूद सरकार इस कानून का लाने की जिद पर क्यों अड़ी हुई है.

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हठधर्मी कर रही है सरकार : झामुमो 

झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव विनोद पांडे का कहना है कि भूमि अधिग्रहण बिल राज्य के लोगों का 
अस्तित्व ही मिटा देगा. कारपोरेट घरानों को स्थापित करने के लिए केंद्र और राज्य दोनों ही उतावले हुए हैं. यह बिल आदिवासी-मूलवासी विरोधी है.  यह अधिकारों से वंचित करने वाला है.  उन्होंने कहा कि लगातार हो रही आपत्तियों के बावजूद सरकार इस बिल को लाने के लिए हठधर्मी कर रही है. सीएनटी-एसपीटी एक्ट की तरह इसका विरोध झामुमो सदन से सड़क तक करेगा. 

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बिल लाने की हड़बड़ी सरकार की नीयत-नीति को दर्शाती हैः झाविमो

झारखंड विकास मोर्चा के विधायक प्रदीप यादव ने कहा कि चंद कारपोरेट घरानों के लिए सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन किया था, जिसे अब कानून की शक्ल देने की कोशिश  हुई है. उन्होंने कहा कि इतने विरोध के बाद भी इस बिल को लाने की जल्दबाजी सरकार की किसान, गरीब और आदिवासी विरोध नीति-नीयत को दर्शाता है. बिल में से सोशल इंपैक्ट आकलन के प्रावधान को हटाना सबसे खतरनाक है. इससे सरकार बिना सहमति लिए ही किसी की भी जमीन लेकर कारपोरेट को दे देगी. प्रदीप  यादव ने कहा कि बिल में जो आपत्ति केंद्र सरकार की तरफ की गयी  थी, वो महज आईवाश थी. दरअसल ये सब केंद्र सरकार के इशारे पर ही हो रहा है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री 2013 के भूमि अधिग्रहण बिल पर तीन बार अध्यादेश ला चुके थे, जिसे जनता ने  नकार दिया. राज्य में इन्हें जिस तरह से सीएनटी-एसपीटी एक्ट पर जनता ने जवाब दिया है, वैसा ही जवाब भूमि अधिग्रहण बिल पर देगी.

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जमीन  लूटने के लिए लाया जा रहा है बिलः माले

झारखंड माले इकाई के सचिव जनार्दन प्रसाद ने कहा कि भूमि अधिग्रहण बिल में सोशल इंपैक्ट असेसमेंट जैसे बिंदु को संशोधित किया गया, ताकि वे जमीन जैसे चाहे लूट सके. केंद्र और राज्य सरकार झारखंड की जमीन   लूटने का धंधा कर रही है. जनता ने इस बिल का विरोध किया था और कर रही है. सरकार लोगों से भूमि के अधिकार को छीनना चाहती है. उन्होंने कहा कि सोशल इंपैक्ट के पहलू को पूरी तरह से हटा दिया गया है. सरकार के पास इस बिल को फिर से भेजा जाना राज्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. राज्य की जनता ने न सिर्फ संशोधित बिल को पूरी तरह से नकार दिया है, बल्कि 2013 में बने इस बिल के पक्ष में भी नहीं है. सरकार भले ही इस बिल पास करने की लाख कोशिश कर ले, लेकिन लेफ्ट पार्टी और राज्य की जनता किसी भी 
कीमत पर इस बिल को लाने नहीं देगी.

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गरीबों को जमीन से बेदखल करना मोदी और रघुवर सरकार का एजेंडा: सुबोधकांत

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता सुबोधकांत सहाय ने भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध करते हुए कहा कि सरकार किसान और गरीबों को जमीन से बेदखल करना चहाती है. पहले सीएनटी-एसपीटी एक्ट बिल में संशोधन कर ऐसा करना चाहती है, जब बात नहीं बनी तो भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन कर लोगों को भूमिहीन करने की तैयारी में लगी हुई है. सुबोधकांत सहाय ने कहा कि यूपीए सरकार के 2013 के भूमि अधिग्रहण बिल के सभी प्रावधानों हटा दिया गया, जिसमें जमीन मालिकों की समहित और बाजार से चार गुना रेट देने का प्रावधान था. पूंजीपतियों को लाभ पहुचाने का कम  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास कर रहे हैं. कांग्रेस पार्टी इसका विरोध करेगी और इसे भी सीएनटी-एसपीटी बिल की तरह नहीं लाने देगी.

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