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सर्वोच्च न्यायालय ने न्यामूर्ति वीरेंद्र सिंह को उप्र का लोकायुक्त बनाया

नई दिल्ली/लखनऊ : सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह को बुधवार को उत्तर प्रदेश का नया लोकायुक्त नियुक्त कर दिया है। न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वीरेंद्र सिंह फिलहाल उप्र उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष हैं। उनका कार्यकाल यहां तीन जनवरी, 2016 तक था।

सर्वोच्च न्यायालय ने, लोकायुक्त नियुक्ति में संवैधानिक प्राधिकार की विफलता पर अपनी नाराजगी भी जताई है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति एन.वी. रमन की पीठ ने न्यायालय के आदेश का पालन न कर पाने के लिए ‘संवैधानिक प्राधिकार की विफलता’ पर गहरा खेद प्रकट किया है।

न्यायालय ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति न कर पाने के पक्ष में दिए गए स्पष्टीकरण से ‘नाखुश’ है।

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सिब्बल ने न्यायालय में कहा कि मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कॉलेजियम ने लोकायुक्त का नाम तय करने के लिए गंभीर प्रयास किए।

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लेकिन नए लोकायुक्त पर आम सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बुधवार को राज्य का नया लोकायुक्त नियुक्त कर दिया।

यह पहला मौका है जब सर्वोच्च न्यायालय ने किसी राज्य का लोकायुक्त नियुक्त किया है।

सिब्बल ने इससे पहले न्यायालय को बताया कि मंगलवार को लोकायुक्त की नियुक्ति पर निर्णय के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, नेता विरोधी दल स्वामी प्रसाद मौर्य और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ की सदस्यता वाले कॉलेजियम की मुख्यमंत्री आवास पर शाम पांच बजे बैठक शुरू हुई थी और देर रात 11 बजे तक चली थी। इसके बाद बुधवार सुबह भी दो घंटे बैठक हुई।

सिब्बल ने अदालत को पांच नाम दिए थे। मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच पांच में से तीन नामों पर सहमति बनी थी, लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कोई भी राय व्यक्त नहीं की।

नए लोकायुक्त न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह का जन्म चार जनवरी, 1949 को मेरठ में हुआ था। वह 13 अप्रैल, 2011 तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रहे थे।

उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से 1972 में कानून में स्नातक किया। वर्ष 1977 में पीसीएस (जे) में चयनित हुए और 1989 में उच्च न्यायिक सेवा के लिए पदोन्नत हुए। वह 2005 में जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने और 13 अप्रैल, 2009 को उच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त हुए। इसके बाद 24 दिसंबर, 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में विधिवत शपथ ली।

सर्वोच्च न्यायालय ने उप्र सरकार को नया लोकायुक्त चुनने के लिए पिछले साल छह महीने का वक्त दिया था। लेकिन सरकार ने और वक्त मांगा। इस साल जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय ने चार हफ्ते का अतिरिक्त वक्त दिया। इसके बाद पांच अगस्त को सरकार ने न्यायमूर्ति रवींद्र सिंह का नाम तय कर राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा, लेकिन राज्यपाल ने इससे पहले चयन समिति की बैठक का ब्योरा मांग लिया।

सूत्रों के अनुसार, इस नाम से सियासी जुड़ाव पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एतराज को राज्यपाल ने गंभीरता से लिया और सरकार ने कॉलेजियम की बैठक नहीं बुलाई तो राज्यपाल ने अगस्त में रवींद्र सिंह का नाम खारिज कर दिया और नया नाम भेजने को कहा।

इस बीच सरकार ने लोकायुक्त संशोधन विधेयक पेश किया। इसमें लोकायुक्त चयन में मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म करने का प्रस्ताव था। राज्यपाल के पास यह लोकायुक्त संशोधन विधेयक अभी तक लंबित है।

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