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वायु का प्रदूषण चिंताजनक

वायु प्रदूषण से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के सभी नगर पीड़ित हैं। दिल्ली और लखनऊ की वायु का प्रदूषण चिंताजनक है। चीन भी आक्रांत है, धुंध के बादल आते हैं। दिल्ली का क्षेत्र पड़ोस भी धुंध का शिकार बना है। भारतीय परंपरा वायु को प्रणाम करती रही है। वायु प्राण हैं। प्राण नहीं तो जीवन नहीं। वायु अमर देव हैं। वायु से ही बोली भाषा और गान भी है। वायु से आयु है। वैदिक पूर्वजों ऋषियों के प्यारे देवता वायु प्राणशक्ति के संचालक भी हैं। वैदिक ऋषि वायु प्रीति में सराबोर दिखाई पड़ते हैं।

ऋग्वेद में बताते हैं, “इनकी ध्वनि सुनाई पड़ती है, लेकिन रूप नहीं दिखाई पड़ता – घोषा इदस्य श्रृण्विरे न रूपम। (ऋ0 10.168.4) वायु का रूप नहीं होता। वायु की तीव्र गति आंधी है। आंधी का शोर सुनाई पड़ता है, लेकिन वायु का रूप नहीं। रूप नहीं तो क्या फर्क पड़ता है। स्पर्श अनुभूति तो है ही। ऋषि वायु को सोम पीने का निमंत्रण देते हैं, हे वायु! आओ सोम रस सजाकर रखा गया है।” (वही 1.2.1) प्राण ही जीवन है। प्राण से प्राणी है। वायु प्राणी का प्राण हैं। ऋग्वेद में देवों का प्राण भी वायु ही है। बड़ी बात है देवों को भी मनुष्य जैसा बताना। वायु देवों के भी प्राण हैं। वायु अनिवार्य है।

स्वाभाविक ही उनकी स्तुतियां हैं। ‘वायु’ को प्रत्यक्ष देव कहा गया है और प्रत्यक्ष ब्रह्म भी। ऋग्वेद (1.90.9) में स्तुति है ‘नमस्ते वायो, त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। तन्मामवतु – वायु को नमस्कार है, आप प्रत्यक्ष ब्रह्म है, मैं तुमको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा। आप हमारी रक्षा करें।’ ऋग्वेद का यही मंत्र यजुर्वेद (36.9), अथर्ववेद (19.9.6) व तैत्तिरीय उपनिषद् (1) मंे भी जस का तस आया है। ब्रह्म संपूर्णता है। आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञानी भी ब्रह्म में उत्सुक हैं।

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भारतीय अनुभूति का ब्रह्म अंध विश्वास नहीं है, प्रयोग सिद्ध है और प्रत्यक्ष है। कहते हैं, “वायु ही सभी भुवनों में प्रवेश करता हुआ हरेक रूप रूप में प्रतिरूप होता है – वायुर्थेको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूव:। सभी जीवों में प्राण की सत्ता है, प्राण नहीं तो जीवन नहीं। प्राण वस्तुत: वायु है। ऋग्वेद (10.16.3) में स्तुति है ‘तेरी आंखें सूर्य में मिल जायें और आत्मा वायु में।’ तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया अग्नि तत्व अग्नि में जाए और प्राण तत्व वायु में – भुव इति वायौ। हम सबके प्राण वायु से आते हैं, मृत्यु के दिन वायु में लौट जाते हैं।”

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बीते सप्ताह एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के कुछ प्रोफेसर व छात्र मुझसे मिले थे। अच्छा लगा कि उन्होंने पर्यावरण बेचैनी के सवाल भी पूछे। मैंने उन्हें ऋग्वैदिक समाज की जीवन पद्धति बताई। वे संतुष्ट थे। यहां जल और वायु नमस्कारों के योग्य रहे हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में वे वायु को भी मधुरस से भरा पूरा पाना चाहते हैं – मधुवाता ऋतायते। वृहदारण्यक उपनिषद् के सुंदर मंत्र में वायु के लिए कहते हैं, “अयं वायु: सर्वेषां भूतानां मध्वस्य – यह वायु सभी भूतों का मधु (सभी भूतों के पुष्पों से प्राप्त रस) है और सभी भूत इस वायु के मधु हैं – वायो: सर्वाणि भूतानि मधु। मरूद्गण वायु का पर्याय हैं। ऋग्वेद में वे समतावादी हैं, धनी, दरिद्र सबको एक समान संरक्षण देते हैं। वशिष्ठ के सूक्तों में इन्हें अति प्राचीन भी बताया गया है ‘हे मरूतो आपने हमारे पूर्वजों पर भी बड़ी कृपा थी’।”

वशिष्ठ की ही तरह ऋग्वेद के एक और ऋषि अगस्त्य मैत्रवरूणि भी मरूद्गणों के प्रति अतिरिक्त जिज्ञासु है। पूछतें हैं ‘मरूद्गण किस शुभ तत्व से सिंचन करते हैं? कहां से आते हैं? किस बुद्धि से प्रेरित हैं? वायु सबकी जिज्ञासा है। वायु पर्वतों को भी अपनी ध्वनि से गुंजित करते हैं, राजभवन कांप जाते हैं और जब अंतरिक्ष के पृष्ठ भाग से गुजरते हैं उस समय वृक्ष डर जाते हैं और वनस्पतियां औषधियां तेज रफ्तार रथ पर बैठी महिलाओं की तरह भयग्रस्त हो जाती है। तेज आंधी और पानी का ऐसा काव्य चित्रण अनूठा है।’

कहते हैं, वे गतिशील मरूद्गण भूमि पर दूर-दूर तक जल बरसाते हैं। वे सबके मित्र हैं। यहां वायु ही वर्षा के देवता हैं। स्वाभाविक ही वे मनुष्यों को अन्न पोषण देते है।

पहले वायु की तीव्रगति। फिर वर्षा और उससे अन्न। प्रकृति में एक प्रीतिकर यज्ञ चल रहा है। वायु प्राण हैं। अन्न भी प्राण हैं। अन्न का प्राण वर्षा है। वायुदेव वर्षा लाते हैं। ऋग्वेद में मरूतों की ढेर सारी स्तुतियां हैं। कहते हैं, “आपके आगमन पर हम हर्षित होते हैं, स्तुतियां करते हैं। लेकिन कभी-कभी वायु नहीं चलती, उमस हो जाती है। प्रार्थना है हे मरूतो आप दूरस्थ क्षेत्रो में न रूके, द्युलोक अंतरिक्ष लोक से यहां आयें। (5.53.8) ऋषि कहते हैं रसा, अनितमा कुभा सिंध आदि नदियां वायु वेग को न रोके।’ं’

(वही 10) वे नदी के साथ पर्वतों से भी यही अपेक्षा करते हैं। (5.55.7) हम सबको वायु का प्रवाह अच्छा लगता है। वायु रूकी तो उमस बढ़ती है। कहते हैं “हे मरूतो आप रात दिन लगातार चलें, सभी क्षेत्रों में भ्रमण करें।” (5.54.4) पूर्वजों ऋषियों का भावबोध गहरा है। वायु प्राण है, वायु जगत का स्पंदन है। वे देवता हैं, वे जीवन हैं, जीवन दाता भी हैं। वायु से वर्षा है, वायु से वाणी है। गीत-संगीत के प्रवाह का माध्यम वायु हैं। गंध-सुगंध और मानुष गंध के संचरण का उपकरण भी वायु देव हैं। वायु नमस्कारों के योग्य हैं। इसीलिए वायु का प्रदूषण नहीं करना चाहिए।

पूर्वजों ने वायु अध्ययन पर बड़ा परिश्रम किया था। अध्ययन चिंतन की भारतीय दृष्टि में वायु प्रकृति की शक्ति है। उन्होंने वायु का अध्ययन एक पदार्थ की तरह भी किया है। वे सृष्टि निर्माण के पांच महाभूतों से एक महाभूत हैं, उनका अध्ययन जरूरी है, लेकिन दिव्य शक्ति की तरह उनको प्रणाम भी किया जाना चाहिए। पूर्वज मरूद्गणों का जन्म, स्वभाव तत्व और उनका काम ठीक से जाना चाहते हैं लेकिन नमस्कारों के साथ। वायु के नमस्कार की प्रीति का उद्गम भारत है।

चरक संहिता आयुर्विज्ञान का महाग्रंथ है। इसके 28वें अध्याय (श्लोक 3) में आत्रेय ने बताया है, “वायुरायुर्बलं वायुवार्यु धार्ता शरीरिणाम – वायु ही आयु है। वायु ही बल है, शरीर को धारण करने वाले भी वायु ही हैं।” कहते हैं, “यह संसार वायु है, उसे सबका नियन्ता गाते है – वायुर्विश्वमिदं सवर्ं प्रभुवायुश्च कीर्तित:।” यहां ‘कीर्तत:’ शब्द ध्यान देने योग्य है। वायु को सर्वशक्तिमान गाने की परम्परा पुरानी है। शरीर और प्राण-वायु का संयोग जीवन है, दोनों का वियोग मृत्यु है।

वाग्भट्ट ने ठीक कहा है, “वह विश्वकर्मा, विश्वात्मा, विश्वरूप प्रजापति है। वह सृष्टा, धाता, विभु, विष्णु और संहारक मृत्यु है।” चरक संहिता में कहते हैं वह भगवान (परम ऐश्वर्यशाली) स्वयं अव्यय हैं, प्राणियों की उत्पत्ति व विनाश के कारण हंै, सुख और दुख के भी कारण हैं, सभी छोटे बड़े पदार्थो को लांघने वाले हैं, सर्वत्र उपस्थित हैं।” वे शरीर के भिन्न अंगों में प्रवाहित हैं।

भारतीय मनीषा ने वायु को समग्रता में देखा था। हनुमान पवनपुत्र हैं। लंकादहन में यों ही 49 पवन नहीं चले थे। लेकिन कौन इंकार करेगा कि वायु का प्रदूषण हजारों रोगों की जड़ है। प्राणवायु के लिए ही लोग सुबह-सुबह टहलने निकलते हैं, जहां वायु सघन है, वहां के जीवन में नृत्य है। जंगलों में वायु सघन है। इसीलिए वन उपवन मधुवन हैं। भारत का अधिकांश प्राचीन ज्ञान वनों/अरण्यों में ही पैदा हुआ था। वैदिक साहित्य और सगंधा उपवन हैं। वैदिक मंत्रों में प्राणवायु की सघनता है। हम सब वैदिक संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं, बावजूद इसके हम वायु को प्रदूषित करते हैं। स्वयं अपने ही जीवन को क्षति पहुंचाते हैं। उन्हें आदरपूर्वक शुद्ध रखने व नमस्कार करने में ही हमारे जीवन की गति है। — हृदयनारायण दीक्षित

( लेखक वर्तमान में उप्र विधानसभा के अध्यक्ष हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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