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लोकप्रियता सिद्ध करने में विफल रहे रघुवर दास

Manoj Kumar
झारखंड में विधानसभा के दोनों उप चुनावों के रिजल्ट आ गए. गोमिया और सिल्ली में जेएमएम प्रत्याशियों की जीत हुयी. दोनों सीटें जेएमएम के ही थे. दोनों विजयी उम्मीदवार निवर्तमान विधायकों अमित महतो और योगेंद्र महतो की धर्मपत्नी क्रमशः सिल्ली और गोमिया उप चुनाव जीती हैं. अमित महतो और योगेंद्र महतो को माननीय न्यायालय द्वारा सजा हुयी थी, और वर्तमान संवैधानिक प्रावधान के तहत इन दोनों की विधायकी समाप्त हो गयी थी.

तदुपरांत दोनों जगह उप चुनाव हुए. यह चुनाव सरकार बनाने और सरकार गिराने के लिए नहीं हुए अपितु इस चुनाव में रघुवर दास जी अपनी लोकप्रियता सिद्ध करना चाह रहे थे और एक समय के लोकप्रिय नेता सुदेश महतो को अपनी हार का बदला लेने का सुनहरा अवसर था. वहीं हेमन्त सोरेन को अपनी नेतृत्व क्षमता को पुनः सिद्ध करने का अवसर था. जहां हेमन्त के नेतृत्व में सारा विपक्ष एकजुट था, वहीं एनडीए गोमिया में बिखरा हुआ था और आजसू और बीजेपी दोनों के प्रत्याशी क्रमशः लम्बोदर महतो और माधवलाल भाग्य अजमा रहे थे.

वहीं सिल्ली में भाजपा तकनीकी रूप में आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को समर्थन दिया था. सुदेश महतो एनडीए के उम्मीदवार थे पर लगभग 13500 मतों से चुनाव हार गए. कहने को तो बीजेपी का समर्थन उन्हें प्राप्त था, पर जमीन पर नहीं दिखा. सुदेश जिस तेजी से राजनीतिक सीढियां चढ़ते गए अब लगता है कि वे जमीन से कट चुके हैं. हंसमुख, विनम्र और सर्वसुलभ अमित उनपर भारी हैं. गोमिया में आजसू और बीजेपी अलग-अलग लड़ी. बीजेपी पूरी दम-खम से लड़ी पर यहां भी जेएमएम भारी पड़ा. मोदी सर का भी सरकारी प्रोग्राम गोमिया से निकट ही हुआ था, पर कोई लाभ बीजेपी को नहीं हुआ. ऐसा ही पीएम का प्रोग्राम लिट्टीपाड़ा विधानसभा उपचुनाव के वक्त भी हुआ था और वह भी निष्फल रहा था.

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उल्लेखनीय है कि अभी हाल में ही नगर पालिका चुनावों में बीजेपी ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया था और पीएम सर भी रघुवर दास जी को बधाई और श्रेय दिए थे. पर रघुवर दास अपने कार्यकाल के तीनों उपचुनावों में मुंह की खाये. रघुवर दास जी पूरे दम-खम से लड़े और अच्छी रणनीति भी बनाये पर बीजेपी को एकजुट नहीं रख पाये और परिणाम विपरीत रहा. दूसरी तरफ मोदी की आंधी से बचने के लिए लालू प्रसाद के अथक प्रयास से विपक्ष न केवल एकजुट हुआ. बल्कि हेमन्त के नेतृत्व को भी स्वीकार किया. हेमन्त सोरेन दिशोम गुरु और झारखण्ड आंदोलन के नेता शिबू सोरेन के पुत्र व उत्तराधिकारी हैं. पर वे अपनी सादगी और विनम्रता से लोगों को आकर्षित करते हैं और चुनाव दर चुनाव अपनी क्षमता को स्थापित करने में सफल हो रहे हैं.

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रघुवर दास की सरकार काम से ज्यादा काम का ढोल पीटने में अपनी ऊर्जा जाया करते रहती है. एक तो सरकार और संगठन में तालमेल का अभाव है, वहीं पार्टी एकजुट नहीं है, पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर नेता अर्जुन मुंडा, कड़िया मुंडा आदि हासिये पर हैं. एक बात और कि वर्तमान के मुख्यमंत्री रघुवर दास जी की बोली भी कभी-कभी मर्यादा को लांघ जाती है. उपर्युक्त परिस्थितियों और समीकरणों की दृष्टि से ही इस उपचुनाव के परिणाम को समझा जा सकता है. हां विधायक तो सीमा जी और बबिता जी बनीं पर वास्तविक विनर हेमन्त सोरेन ही रहे और लूजर रघुवर दास जी और सुदेश जी ही रहे. अंत में यह कहना उचित होगा कि यह चुनाव महिला शक्ति का प्रकटीकरण भी है.

लेखक के निजी विचार

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