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मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में एडमिशन लेने से पहले जानें कुछ जरूरी बातें!

Ujjwal Bhardwaj (HR)

Ranchi : एसोचेम के अध्ययन के अनुसार केवल 7 प्रतिशत लोगों को ही नौकरी मिलती है, बाकि 93 प्रतिशत लोग बेरोजगार रह जाते हैं. देश में करीब 5500 मैनेजमेंट स्कूल हैं, जिसमें कुछ गिने चुने बी स्कूल ही हैं, जो अच्छी एजुकेशन के साथ प्लेसमेंट दिलाने में आईआईएम की तरह हैं. मैनेजमेंट की पढ़ाई में लाखों खर्च करने के बाद 8000 से 10000 की नौकरी करने को मजबूर होना पड़ता है.

Ujjwal Bhardwaj (HR)

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Ranchi : एसोचेम के अध्ययन के अनुसार केवल 7 प्रतिशत लोगों को ही नौकरी मिलती है, बाकि 93 प्रतिशत लोग बेरोजगार रह जाते हैं. देश में करीब 5500 मैनेजमेंट स्कूल हैं, जिसमें कुछ गिने चुने बी स्कूल ही हैं, जो अच्छी एजुकेशन के साथ प्लेसमेंट दिलाने में आईआईएम की तरह हैं.  मैनेजमेंट की पढ़ाई में लाखों खर्च करने के बाद 8000 से 10000 की नौकरी करने को मजबूर होना पड़ता है. 

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दिनों दिन घट रहे हैं कैंपस प्लेसमेंट

कैंपस प्लेसमेंट दिन-ब-दिन कम होते जा रहे हैं. इसका प्रमुख कारण है इकनोमिक स्लो डाउन और इन्ही कारणों से आज 220 से अधिक बी-स्कूल बंद हो चुके हैं. बड़े शहरों में जैसे दिल्ली एनसीआर, बैंगलोर, मुंबई, कोलकाता और लखनऊ में जबकि 120  से अधिक बंद होने के कगार पर हैं. जानकारों का कहना है कि मैनेजमेंट की डिग्री बांटने में जो कॉलेज लगे हैं और मैनेजमेंट की पढ़ाई को सिर्फ बिज़नेस का जरिया समझते हैं उन्हें ये भी ध्यान देना चाहिए की इंडस्ट्रीज को कैसे लोग चाहिए उसकी ट्रेनिंग मिले, इंडस्ट्रीज विजिट, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, केस स्टडी एंड रिसर्च के साथ-साथ इंडस्ट्री लीडर्स से मुलाकात जरुरी है.

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इंडिया में टॉप-बी स्कूल में सीट कम होना भी है एक दिक्कत

शीर्ष बिज़नेस स्कूल जो गुणवत्ता पूर्ण एजुकेशन एंड प्लेसमेंट दिलाने में सक्षम हैं उनके पास पर्याप्त  सीट्स नहीं होते हैं. कैट एग्जाम में 80 परसेंटाइल और अधिक लेन वाले अच्छे स्टूडेंट्स चाहते हैं कि शीर्ष के 100 कॉलेज में नामांकन हो लेकिन सीट्स के आभाव में ऐसे करीब 40000 स्टूडेंट्स जो शीर्ष के कॉलेज में नहीं जा पाते हैं. यही कारण है कि स्टूडेंट्स निम्न गुणवत्ता वाले बी-स्कूल में नामांकन को मजबूर हो जाते हैं. जहां कम वेतनमान पे शिक्षक रख कर मैनेजमेंट की शिक्षा दिलवायी जाती है स्किल डेवलपमेंट पर कोई काम नहीं होता. अतः मैनेजमेंट की शिक्षा कहीं न कहीं अधूरी रह जाती है. सिलेबस को समय- समय पर बदलना भी जरुरी होता है, जो की सभी संस्थान नहीं कर पाते, जिसके कारण एक गैप रह जाता है. रोजगार के लिए बाजार को क्या जरुरत है, क्या नहीं इसके आधार पर सिलेबस को अपडेट करना बहुत जरुरी है.

भवन देखकर न लें नामांकन

मैनेजमेंट में नामांकन बी-स्कूल के भवन देखकर न लें, प्लेसमेंट का रिकॉर्ड देखकर लें, साथ ही यह भी देख लें कि टीचर कितने हैं और कैसे हैं, क्योंकि बहुत जगह तो वहीं से पास आउट पढ़ाते हैं.

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अधिक बैंक लोन लेकर पढ़ाई न करें

मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए बैंक से लोन लेना जितना आसान है, उसको चुकाना उतना ही मुश्किल. कैंपस प्लेसमेंट की वर्तमान स्थिति को देखकर, तो यही लगता है कि बैंक का लोन  कहीं आपको घर से चुकाना न पड़ जाए, शुरुआत में 10000 में अपना खर्च चलाएंगे या बैंक को देंगे. मेरी मनें, तो वर्क के साथ साथ भी आप डिस्टेंस से मैनेजमेंट की पढ़ाई कर सकते हैं. पैसे भी कम लगते हैं और एक्सपीरियंस भी पर्याप्त हो जाता है, जिसके बाद आपको प्राइवेट नौकरी मिलने में भी मदद मिल जाती है.

मैनेजमेंट में सब्जेक्ट का चुनाव भी बहुत महत्वपूर्ण होता है

आप ऐसे सब्जेक्ट को चुनें, जिसमें आपकी रूचि है और जो आप कर सकते हैं, यह सोचकर सब्जेक्ट न चुनें कि ह्यूमन रिसोर्स और फाइनेंस बहुत सब्जेक्टिव है, तो मार्केटिंग कर लेता हूं. ये चीजें आपको आगे दिक्कत करेंगी. सभी सब्जेक्ट का अपना महत्व है.

जो भी नौकरी मिले उसमें काम करें

अंत में यह जरूर बताना चाहूंगा अपने एक्सपीरियंस से कि जो भी नौकरी मिले उसमें काम करें. उसे छोड़कर फिर नई नौकरी न खोजें क्योकि ऐसे में आप एक्सपीरियंस नहीं बना पाएंगे. कहीं भी कम से कम 18 महीने जरूर काम करें. कहा जाता है, एक जगह गड्ढा खोदने से पानी मिल ही जायेगा, इसके उलट दस जगह काम करने से ऊर्जा और समय तो जायेगा ही, किसी एक क्षेत्र में आप श्रेष्ठ उपलब्धि पाने से भी चूक जायेंगे.

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