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मुख्यमंत्री ने झारखंड का नियम बनने के बाद बिहार के नियम की गलत व्याख्या कर भ्रष्टाचार करने के आरोपी मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी को दी क्लीन चिट

KUMAR GAURAV

Ranchi : एक कहावत है, अगर आपके पास पद, पावर और पैसा तीनों में से कोई एक भी हो तो आप दुनिया की कोई भी चीज हासिल कर सकते हैं. उसे खरीदने या पाने के लिए चाहे जो भी हथकंडे अपनाने पड़े. अगर किसी के पास पदपावर और पैसा तीनों है तो कोई भी मनचाहा काम आसानी से कर सकता है. उसके लिए उसे नियम और मापदंड की कोई चिंता नहीं करनी होगी. अगर नियम विपरित जाते हैं तो उसे बदल कर या पुराने नियमों का हवाला देकर सीधा फायदा पहुंचाया जा सकता है. यही हुआ स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी के साथ उन्होंने सरकारी पैसे का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया. अपने निजी महाविद्यालय में सरकारी राशि से योजनाओं का कार्यान्वयन कराया. जो नियमों के बिल्कुल विपरित था. इसकी शिकायत दर्ज कराई गयी, जांच भी हुई, पर राज्य के मुख्यमंत्री और उनके अधिकारियों ने पुराने नियम का हवाला देकर अपने भ्रष्ट मंत्री को क्लीन च‍िट दिलवा दी. जिस नियम का उल्लेख किया गया वो एकीकृत्त बिहार के समय जारी मार्गदर्शिका का है. जबकि झारखंड में इसके लिए  18  नवंबर  2002   में अलग से मार्गदर्शिका जारी की गई थी.

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निजी संस्थान व जमीन पर हुआ सरकारी राशि का इस्तेमाल

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सरकार ने इसकी निगरानी जांच शुरू करायी थी. जांच में पाया गया कि निजी संस्थान व जमीन पर सरकारी राशि का इस्तेमाल हुआ हैलेकिन इसमें कुछ भी गलत नहीं है. निगरानी ने अपनी जांच रिपोर्ट में पलामू के तत्कालीन उपायुक्त की रिपोर्ट (पत्रांक-1025 दिनांक 05.09.2011) का उल्लेख किया था. इसमें उपायुक्त ने विधायक की अनुशंसा पर ली जानेवाली योजनाओं के लिए एकीकृत्त बिहार के समय जारी मार्गदर्शिका का उल्लेख किया था. निगरानी की रिपोर्ट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लिखा था कि जांच से यह तो स्पष्ट है कि सरकारी राशि का इस्तेमाल निजी संस्थान में किया गया है. इसलिए संबंधित विभाग से इस बारे में पूछा जाये कि ऐसा नियम के अनुसार हुआ है या नहीं. इसके बाद भी ग्रामीण विकास विभाग ने एकीकृत्त बिहार के समय जारी मार्गदर्शिका का उल्लेख करते हुए काम को नियमानुसार बताया.

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बिहार के मार्गदर्शिका का दिया गया हवालाजबकि झारखंड के लिए जारी हुई थी नई मार्गदर्शिका

सरकार के अफसरों ने पुराने नियम का उल्लेख कर स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी को निगरानी जांच (पीई-44/2010) में क्लीन चिट दिलवायी है. मामला रामचंद्र चंद्रवंशी पर निजी जमीन पर विधायक मद से 1.97 करोड़ की लागत से सड़क निर्माण का है. मंत्री को क्लीन चिट दिलाने के लिए अफसरों (पलामू के तत्कालीन डीसी से लेकर विभाग के तत्कालीन सचिव तक) ने एकीकृत्त बिहार के समय विधायक योजना और मुख्यमंत्री विकास योजना की मार्गदर्शिका पत्रांक-1212 (दिनांक – 01.02.1999) की कंडिका-5.10 का उल्लेख किया. हालांकि राज्य अलग होने के बाद ग्रामीण विकास विभाग के तत्कालीन सचिव उदय प्रताप सिंह ने नयी मार्गदर्शिका (पत्रांक-7897 दिनांक 18.11.2002) जारी की थी. इसकी प्रति सभी डीसी को भेजी थी. पर अफसरों ने पुरानी मार्गदर्शिका का उल्लेख करते हुए विधायक मद से कराये गये कामों को नियमानुसार बताया. जून 2010 में तत्कालीन विधायक चंद्रशेखर दुबे ने शिकायत की थी कि रामचंद्र चंद्रवंशी ने निजी जमीन पर विधायक मद से 1.97 करोड़ से सड़क निर्माण कराया. कल्याण विभाग और कला-संस्कृति एवं युवा कार्य विभाग के करीब 23 करोड़ रुपये से निजी संस्थान आरसीआइटी कॉलेज में काम कराया.

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एकीकृत्त बिहार की मार्गदर्शिका में क्या है

एकीकृत्त बिहार के समय जारी मार्गदर्शिका में लिखा है कि यदि कोई संस्था विधायक के नाम से होलेकिन यह आम जनता के लिए उपयोगी व लाभकारी हो और उसका निबंधन-संबंधन होतो उस स्थिति में विधानमंडल के सदस्य संस्था में अपनी राशि का उपयोग निर्माण या विकास में कर सकते हैं.

अलग राज्य बनने के बाद जारी हुई थी नयी मार्गदर्शिका

अलग राज्य बनने के बाद जारी मार्गदर्शिका में दो पार्ट है. पहले पार्ट में 33 विकास कार्यों और दूसरे पार्ट में सात कार्यों का जिक्र हैजिनमें विधायक मद की राशि का इस्तेमाल किया जा सकता है. पार्ट-दो की कंडिका-चार के अनुसार निजी संस्थान से संबंधित निर्माण व अन्य कार्य विधायक मद से नहीं कराया जाना है.     

ऐसे शुरू हुई जांच और मंत्री को मिली क्लीन चीट

जून 2010 : तत्कालीन विधायक ने मंत्रिमंडल निगरानी को पत्र लिखकर विश्रामपुर के पूर्व विधायक रामचंद्र चंद्रवंशी पर अपने निजी संस्थान में 25 करोड़ की सरकारी राशि से काम कराने का आरोप लगाया. इसमें रामचंद्र चंद्रवंशी के विधायक मद की राशि 1.97 करोड़ से सड़क मरम्मत का भी आरोप शामिल है.

  • 18.10.2010 : सरकार ने शिकायत की निगरानी जांच का आदेश दिया
  • 23.12.2011 : निगरानी ब्यूरो ने (पत्रांक 11120 दिनांक 23.12.11) मंत्रिमंडल निगरानी को बताया कि आरोप प्रमाणित नहीं हुआ है. इसलिए जांच बंद की जाये.
  • 23.02.2012 : मंत्रिमंडल निगरानी ने निगरानी ब्यूरो को पत्र लिखकर दो बिंदुओं पर प्रतिवेदन मांगा.
  • 25.11.2013 : निगरानी ब्यूरो के तत्कालीन एडीजी ने दोबारा कहा कि आरोप की पुष्टि नहीं हुई. इसलिए जांच को बंद किया जा सकता है.
  • 10.01.2014 : मंत्रिमंडल निगरानी सचिव एनएन पांडेय ने मामले की जांच बंद करने की अनुशंसा तत्कालीन मुख्यमंत्री से की.
  • 06.02.2014 : तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जांच के निष्कर्ष पर असहमति जताते हुए कुछ बिंदुओं पर जांच का आदेश दिया. कहा कि यह तय है कि निजी महाविद्यालय के परिसर में सरकारी राशि से योजनाओं का कार्यान्वयन कराया गया है. इसलिए जिन विभागों द्वारा ऐसा किया गयाउनसे पूछा जाये कि क्या ऐसा नियमों के अनुरूप किया गया है या उल्लंघन हुआ है.
  • 26.11.2014 : कल्याण विभाग ने मंत्रिमंडल निगरानी को बताया कि आरसीआइटी कॉलेजनावाडीह विश्रामपुर में कराये गये छात्रावास का निर्माण सरकारी नियमों के अनुरूप हुआ है.
  • 15.06.2015 : कला-संस्कृति एवं युवा कार्य विभाग ने मंत्रिमंडल निगरानी को बताया कि सरकारी राशि से स्टेडियम का निर्माण आरसीआइटी कॉलेज परिसर के बाहर कॉलेज की भूमि पर किया गया है और स्टेडियम का संचालन उपायुक्त के स्तर से गठित समिति करता है. स्टेडियम का इस्तेमाल और संचालन लोकहित में हो रहा है. भूमि के हस्तांतरण की कार्रवाई कर ली जायेगी.
  • 22.06.2015 : ग्रामीण विकास विभाग ने मंत्रिमंडल निगरानी को बताया कि इटको विश्रामपुर मुख्य पथ से आरसीआइटी कॉलेज होते हुए विश्रामपुर रोड (6.00 किमी) की मरम्मत 197.231लाख से करायी गयी. इस रोड में सरकारी सड़क के अलावा आरसीआइटी कॉलेज (रामचंद्र चंद्रवंशी वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा संचालित) की भूमि पर पथ निर्माण कराया गया. यह जनहित में है और नियमानुसार है. विभाग ने विधायक योजना एवं मुख्यमंत्री विकास योजना की मार्गदर्शिका पत्रांक-1212, दिनांक-01.02.1999 की कंडिका-5.10 का उल्लेख करते हुए इसे नियमानुसार बताया है. अफसरों ने वर्ष 2002 में झारखंड सरकार द्वारा जारी नयी मार्गदर्शिका को नजरअंदाज कर दिया.
  • 12.08.2015 : मंत्रिमंडल निगरानी सचिव ने विभागीय मंत्री से मामले की जांच को समाप्त करने की अनुशंसा की.
  • 28.08.2015 : विभागीय मंत्री ने जांच समाप्त करने की अनुमति दी. जिसके बाद मंत्रिमंडल निगरानी विभाग ने 02 सितंबर 2015 को जांच बंद करने का आदेश निगरानी ब्यूरो को दिया.

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