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मानव तस्करी सदी का सबसे भयावह रूप में

डॉ प्रभाकर कुमार , सदस्य बाल कल्याण समिति बोकारो

मानव तस्करी 21 वीं शताब्दी के सबसे भयावह अपराधों की श्रेणी का एक अपराध है, जो पूरे विश्व में जाल की तरह फैल गया है. भारत के कई राज्यों में यह अपनी अंतिम पराकाष्ठा को पार किया है. जिसमें तमिलनाडु , आंध्र प्रदेश , कर्नाटक , पश्चिम बंगाल , महाराष्ट्र आदि राज्य हैं. इन राज्यों में मानव तस्करी सर्वाधिक देखी जा रही है. जहाँ लड़कियों-महिलाओं की खरीद फरोख्त कर रेड लाइट क्षेत्र में खरीद बिक्री की जा रही है. सरकार की तमाम कोशिशों के बाबजूद भी मानव तस्करी में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा रही है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो का यह मानना था कि महिलाओं के अपेक्षा लड़कियों की तस्करी ज्यादा होती है. जो बच्चे गायब हो रहे हैं उनमें 70 % लड़कियां होती हैं एवं 30 % लड़के. लड़कियों के गायब होने का मुख्य कारण वेश्यावृत्ति है, जो गिरोहों से अन्य राज्यों, महानगरों, वेश्यालयों में बेच दिये जाते हैं. लड़को से भिक्षा वृति या सस्ती मजदूरी करवाना मुख्य उद्देश्य है.


कम उम्र की बच्चियों की ज्यादा मांग

मानव तस्करी पहले के मुकाबले इन दिनों ज्यादा हो रही है. बच्चे भी लगातार गुम हो रहे हैं. भारत की लड़कियों की मांग खाड़ी देशों-विदेशों में अत्यधिक है. एजेंट वैसे बच्चों, लड़की का सौदा मुंहमांगी कीमत में करते हैं. जिनकी उम्र कम होती है. मानव तस्करी आज समाज की गंभीर समस्या, त्रासदी के रूप में देखी जा रही है. जहां शारीरिक शोषण व देह व्यापार से लेकर बंधुआ मजदूरी के लिये मानव तस्करी की जा रही है. भारत में 80 प्रतिशत जिस्मफरोशी के लिये यह कुकृत्य को अंजाम दी जा रही है.


गरीब, बेबस लाचार बच्चे ज्यादा शिकार

मानव तस्करी के शिकार अधिकांश बच्चे बेहद गरीब इलाकों, भारत के पूर्वी इलाकों के दूर-दराज के होते हैं. अत्यधिक गरीबी, शिक्षा का व्यापक प्रचार प्रसार की कमी. सरकारी नीतियों का ठीक तरह से क्रियान्वयन का अभाव, स्थानीय एजेंटों की भूमिका प्रमुख होती है, ऐसे एजेंट गरीब , बेबस , लाचार , निरीह परिवार की कम उम्र की लड़कियों पर नजर रखकर उनके परिवारों को शहर में अच्छी नौकरी के नाम पर झांसा देते हैं. परिवार की सहमति लेकर बच्चियों को घरेलू नौकर उपलब्ध करवाने वाले संस्थाओं को बेच देते हैं. आगे चलकर ये संस्थाएं और अधिक दामों में इन बच्चियों को घरों में नौकर के रूप में बेचकर मुनाफा कमाते हैं.


10 हजार एजेंसी शामिल हैं कुकर्म में

भारत में नई दिल्ली, मुम्बई , चेन्नई आदि महानगरों में घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली लगभग 10,000 एजेंसिया मानव तस्करी के भरोसे चल रही है. इनके माध्यम से 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चियों को बेचा जाता है. जहां उनसे घरों में 16 घंटों तक काम लिया जाता है. और रात में यौनाचार का भी शिकार होना पड़ता है. मानव तस्करी की शिकार बचियां न सिर्फ घरेलू नौकर, बल्कि जिस्मफरोशी के जाल में भी फंस जाती है. और हर स्तर, हर तरह से इनका शोषण होने का क्रम जारी रहता है. शारीरिक यातना , मानसिक यातना एवं संवेगात्मक यातना.


भारत की बच्चियों की मांग पश्चिमी देशों में

बच्चीयों की मांग पश्चिमी देशों में चरम पर है. उन्हें यहां के कम उम्र के बच्चों की कीमत मुंह मांगा मिलती है. आज के समय में ऑनलाइन पोर्न उधोगों में भी गायब बच्चों विशेषकर लड़कियों लड़को का उपयोग किया जा रहा है. इतने भयावह मामलों के बीच भिक्षा वृति तो वह अपराध है जो ऊपरी तौर पर दिखाई देता है , मगर ये सारे अपराध भी बच्चों से करवाये जा रहे हैं.


झारखंड की 1.23 लाख लड़कियां दूसरे राज्य में नौकरानी

21 वीं शताब्दी की सबसे जवलंत, संवेदनशील मुद्दा मानव तस्करी है. अधिक मुनाफे का धंधा होने की वजह से यह एक संगठित गिरोह बन गया है. झारखंड के पाकुड़, साहेबगंज, खूंटी में मानव तस्करी का रूप भयावह दिखती है. झारखंड की 1. 23 लाख आदिवासी लड़कियां देश के विभिन्न शहरों में घरेलू नौकरानी के रूप में काम कर रही

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