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मां को डायन बता गांव से निकाला, “आशा” ने दिया आसरा

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Ranchi,  03 October : शहर से करीब 20 किमी दूर रिंग रोड के किनारे बसी नयी भुसूर बस्ती. और यहां स्थित आशा संस्था ऐसे कई नाबालिक बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहा है. एसोसियेशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस ने इन बच्चों के जीवन में रंग भर, उन में उम्मीद की नई रोशनी जगायी है. ईंट भट्ठों में तप रहे बचपन को संवार इन्हें बाल श्रम की दलदल से निकाला है. इस संस्था के सचिव अजय कुमार जायसवाल बताते हैं कि यहां के अधिकांश बच्चे मौसमी पलायन करने वाले मजदूरों के हैं, जिनका बचपन बिहार, उत्तर प्रदेश और  पश्चिम बंगाल में ईंट भट्ठों पर काम करके बीत रहा था. और कुछ ऐसे बेसहारा भी हैं जिनका इस दुनिया में कोई नहीं. आशा संस्था ऐसे बच्चों के जीवन को सही आकार देने के लिए निरंतर प्रयासरत है.

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शिक्षा से जोड़ना थी बड़ी चुनौती

आशा हॉस्टल में रह रहीं संध्या रानी ने बताया कि हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, इन बच्चों के मन में शिक्षा के प्रति इनकी रुचि को जगाना. जिन बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा, उन्हें रोज सुबह स्कूल के लिए तैयार करने में समस्या आ रही थी. पर अब सभी बच्चे स्कूल जाते हैं और पढ़ने में भी अव्वल हैं. बच्चों का बैंक में खाता भी है. आशा संस्था बाल श्रम के विरोध में वर्ष 2000 से काम कर रही है. वर्ष 2011 में भुसरू बस्ती में इसका हॉस्टल बनाया गया. यहां अभी छह साल से 15 साल के करीब 70 बच्चें हैं.

कोई खिलाड़ी बनना चाहता है तो कोई गायक

यहां रहने वाले बच्चे आम दिखते हैं, पर इनके बुलंद हौसले इन्हें औरों से अलग बनाते हैं. अभावग्रस्त बच्चों के सपने बड़े हैं औऱ वह अपने सपने को साकार करने लिए परिश्रम भी कर रहे हैं. 13 वर्षीय निशा कुजूर बेहतरीन फूटबॉल प्लेयर हैं और इनका सपना है कि वह आगे चल कर कामयाब खिलाड़ी बने. वहीं आठ साल की संजना में जैसे सरस्वती का वास है. वह बड़ी होके गायक बनना चाहती हैं. 

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