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पार्टी फंडों में चुनावी चंदा या कालाधन?

||प्रभुनाथ शुक्ल||
केंद्रीय सूचना आयोग और राजनीतिक दलों के मध्य चुनावी चंदे और उससे जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने को लेकर बात नहीं बन पा रही है। राजनेता और उनकी पार्टियां इसे आरटीआई के तहत आम जनता के सामने नहीं लाना चाहती हैं, जबकि सूचना आयोग इस पर तटस्थ है। एक बार पुन: सूचना अधिकार अधिनियम पर ठंडी पड़ी बहस को आयोग ने गर्म कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत छह राजनीतिक दलों को मांगी गई सूचना का जवाब न देने पर नोटिस जारी किया है। अयोग ने सुनवाई की तारीख भी तय कर दी है। पूर्ण पीठ के सामने 22 जुलाई को इसका फैसला होगा।

इसमें केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मायावती के अलावा पूर्व रक्षामंत्री शरद पवार, माकपा के प्रकाश कारात व भाकमा के सुधाकर रेड्डी के नाम शामिल हैं। याचिकर्ता आर.के. जैन और 16 अन्य की शिकायत पर यह कार्रवाई की गई है।

आयोग के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया जाता है तो वह कानूनी तौर पर अधिकारों का प्रयोग सुनवाई के लिए कर सकता है। इसके अलवा सभी याचिकर्ता उच्च न्यायलय या फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

आयोग की पूर्ण पीठ में सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युल, बिमल जुल्का और सुधीर भार्गव की तरफ से सुनवाई की जाएगी। सूचना में राजनीतिक दलों के चंदे और आतंरिक चुनाव और दूसरी जानकारिया मांगी गई थी।

इनकी फाइलें सूचना के इंतजार में धूल फांक रही थीं। आयोग के इस डंडे से सियासी दलों का फंडा पेच में फंसता दिखता है। याचिकर्ता आयोग की कार्यप्रणाली से अंसतुष्ट थे। जैन का आरोप था कि आयोग निष्पक्षता से काम नहीं कर रहा है। सभी छह राजनीतिक दलों को नोटिस भेजने में रजिस्टार की तरफ से दोहरा मापदंड अपनाया गया।

सोनिया गांधी के व्यक्तिगत नाम से नोटिस भेजा गया, जबकि भाजपा और दूसरे दलों के सचिवों और प्रमुखों के पद नामों से जारी किया गया। जबकि शिकायतों में सीधे नामों का उल्लेख किया गया था। सूचना अधिकार को लेकर राजनीतिक दलों में पहले से आम सहमति है।

सभी दल खुद को आरटीआई कानून से अपने को स्वतंत्र रखना चाहते हैं। जबकि आयोग ने 2013 आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल और एसोशिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स याचिका के आधार पर राजनीतिक दलों को सार्वजनिक प्राधिकरण घोषित करते हुए जबाबदेह बनाया।

2005 में कांग्रेस की तरफ से लाया गया यह कानून अब उसके और दूसरे राजनैतिक दलों के गले की फांस बन गया है। राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने की कांग्रेस की तरफ से विचार बनाया गया था लेकिन वह परवान नहीं चढ़ा।

इसका सीधा मतलब रहा कि संसद में यह बिल आराम से पास हो जाएगा और राजनीतिक दल प्राधिकरण की परिभाषा से बाहर हो जाएंगे। निश्चित तौर पर यह राजनीतिक दलों के घबराहट का नजीता रहा। हलांकि आयोग के फैसले को अदालत में जाकर भी चुनौती दी जा सकती है।

सवाल है कि सूचना को लेकर इतनी घबराहट क्यों हैं? इसे छुपाया क्यों जा रहा है? इसका सीधा सा मतलब है कि दाल में कुछ काला नहीं पूरी दाल ही काली है। निश्चित तौर पर इसका असर राजनीति और उसकी छबि पर भी पड़ेगा। राजनीतिक दलों को बखूबी मालूम है कि अगर वे इस मसले पर अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे तो मुश्किल होगी।

मामला पारदर्शिता और लोक व्यवस्था से जुड़ा है फैसला विरोध में जा सकता है। देश में जब सिविल कोड और समान नागरिक संहिता के आलवा डिजिटल इंडिया की बात की जा रही हो। विदेशों से कालाधन लाया जा रहो।

इससे कालाधन कानून में और अधिक पारदर्शिता आएगी और यह पता चलेगा कि राजनीतिक दलों को जो मोटी रकम चंदे के रूप में दी गई है क्या उस पर टैक्स लगा होता है? ऐसा नहीं होगा तो वह कालाधन माना जाएगा और देश में उपलब्ध कालेधन की तस्वीर साफ होगी।

उस स्थिति में सूचना कानून की समानता पर राजनीतिक दल एकमत क्यों नहीं? अहम बात यह है कि राजनीतिक दल अपने को प्राधिकरण नहीं मानते हैं तो सरकारी सुविधाओं का लाभ क्यों लेते हैं।

सस्ती जमीनें टैक्स रिवेट और कार्यालयों का अव्यावहारिक किराया के साथ सरकारी सुविधाओं और मानदेय का लाभ क्यांे उठाते हैं। भाषणों और मंचों पर समता, समानता और एक रुपता की बात करने वाली राजनीति और हमारे माननीय सूचना की पारदर्शिता पर बगल क्यों झांकते दिखते हैं।

देश की जनता से आयकर के इतर 15 फीसदी सेवा कर लिया जा रहा है। देश में दर्जनों आय एवं उत्पाद कर के अलावा तरह-तरह के टैक्स हैं। फिर चुनावी चंदे पर टैक्स क्यों नहीं लगता? चुनावी चंदा राजनीति के गले की फांस बन गया है। सब जानते हैं कि चंदे की बात सामने आई तो मुश्किल हो जाएगी।

चंदे की ताकत पर ही कार्पोरेट जगत और राजनीतिक पार्टियों में आत्मीय संबंध हैं। सरकार की नीतियां चंदे से तय होती हैं। उद्योग और कार्पोरेट जगत को इसी आड़ में मोटा फायदा पहुंचाया जाता है। यह सच है कि बड़े-बड़े औद्योगिक समूह पार्टियों को चुनावी चंदा देते हैं तो उसका लाभ भी लेते हैं।

अब वक्त आ गया है कि सब कुछ आइने की तरफ साफ होना चाहिए। जनता की गाढ़ी कमाई चंदे में क्यों लुटाई जाती है। उसका सीधा लाभ कार्पोरेट जगत आम आदमी को क्यों नहीं देता है?

आम लोगों को यह पता चलना चाहिए कि राजनीतिक दलों और औद्योगिक समूहों और बड़ी-बड़ी हस्तियों के संबंध किस तरह देश की अर्थ व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और कथित तौर पर लाभ पहुंचाने वाली आर्थिक नीतियां बनाई जाती हैं, जिससे गरीब और गरीब होता रहा हैं उसकी क्रय शक्ति में कमी आ रही जबकि अमीर आगे बढ़ रहा है।

सूचना के माध्यम से सब कुछ साफ हो जाने पर देश में एक अलग तरह की आवाज उठेगी। यह सियासी दलों के लिए मुश्किल पैदा करेगी। सबसे अधिक कांग्रेस और भाजपा के लिए फिर भाकपा, सपा एवं बसपा के लिए समस्या होगी, क्योंकि मायावती पर दौलत लेकर टिकट देने का आरोप लगता रहा है।

यह हम नहीं कहते उनकी पार्टी से अलग हुए नेताओं ने इस तरह का बयान दिया है। चुनावी चंदे के मामले में कांग्रेस और भाजपा सबसे आगे है। हम विदेशों से काला धन लाने की बात करते हैं लेकिन देश में जमा काला धन भी बाहर आना चाहिए। लेकिन क्या यह बाहर आएगा? यह सबसे बड़ा सावल है।

देश का सबसे अधिक काला धन राजनीतिक दलों और उनके पार्टी फंडों में जमा हो सकता है। आप ने तो देश के महानगरों में होटलों में डिनर पार्टी देकर चुनावी चंदा जुटाया था, जिसका असर देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी होगा।

राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। आयोग का यह फैसला उचित है। राजनीतिक दलों को भी इसका सम्मान करना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये इनके निजी विचार हैं)

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