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नेतरहाट की सुदंरता के पीछे छिपी है खनन की खौफनाक हकीकत, अवैध खनन से मालामाल हो रहा हिंडालको

Ranchi : झारखंड के कई इलाकों में खनिजों का अवैध खनन कोई नयी बात नहीं है. यह अवैध खनन राज्य में बेधड़क चलता रहता है. फिर चाहे वह आयरन ओर के खनन का मामला हो, या फिर कोयला और बॉक्साइट जैसे खनिजों का. सरकार की खनन के लीज शर्तों का कहीं भी पूरी तरह पलान नहीं हो रहा है. नेतरहाट की पहाड़ी अपनी सुदंरता के लिए पूरे देश में जानि जाती है. पर आज इसकी सुंदरता पर भी कंपनियां ग्रहण लगाने पर उतारू हैं. नेतरहाट में भी खनन का काम धड़ल्ले से किया जा रहा है. हिंडालको कंपनी खनन कर यहां की खनिज संपदा को निकाल रही है. जिससे यहां विलुप्त होती आदिम जनजाति असुरों का जीवन दुभर हो गया है.

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पीने को साफ पानी तक नसीब नहीं

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इलाकों के आदिवासियों को पीने के लिए साफ पानी तक नसीब नहीं होता है. इस खनन इलाके में रहने वाले आदिम जनजाति परिवार जिनका भोजन, स्वास्थ्य, रोजगार जंगल पर निर्भर था, आज वह अपने संसाधनों से वंचित होते जा रहे हैं. सरकार भले आज तक जंगल के इस बिहड़ में मूल-भूत सुविधा पहुंचाने में नकाम रही है. लेकिन उनके बसहाट से उन्हें बेदखल कर बॉक्साइट निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. नेतरहाट के आदिम जनजतियों को उजाड़ने का पूरा मसौदा तैयार दिखता है. क्षेत्र नक्सलग्रस्त होने के बावजूद भी यहां खनन का काम बिना किसी डर के लगातार होता रहता है. जब नक्सलियों को लेवी नहीं मिलती तो वे एक-दो दिन के लिए बॉक्साइट का परिचालन रोक देते हैं. वसूली पूरी होते ही फिर से वही धंधा शुरु हो जाता है.

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कब से बॅाक्साइट खनन किया जा रहा है, किसे दिया गया है ठेका

राज्य में बॉक्साइट खनन कार्य 1984 से किया जा रहा है. आदित्य बिरला समूह की कंपनी हिंडालको को गुमला जिला के बिशनपुर प्रखंड में बॉक्साइट खनिज के खनन का कार्य दिया गया है. यह देश की अलुमिनियम उत्पादन में अग्रणी कंपनी है एवं भारत के सबसे बड़ी अलुमिनियम उत्पादकों में से एक है. हिंडालको बॉक्साइट खनन के लिए झारखंड के लोहरदगा और गुमला जिले के साथ महाराष्ट्र के कोल्हापुर एवं सिंधुदुर्ग जिले में खनन पट्टा आवंटित है.

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गुमला जिला में है कपंनी का खनन पट्टा

हिंडालको आवंटित खनन ब्लॉक अमटीपानी के गुरदरी, अमटीपानी, चिरोडीह गांव के 190.95 हेक्टेयर, खनन ब्लॉक कुंजाम एक के कुजाम, चातम, देवरागिनी गांव के 80.87 हेक्टेयर और खनन ब्लॉक कुजाम दो के कुजाम और चिरोडीह गांव के 157.38 हेक्टेयर में फैला हुआ है. इस इलाके में खनन कार्य के लिए हिंडालको को ठेका दिया गया है. लीज के शर्त के अनुसार खनन कार्य के लिए स्थानीय लेबर को एग्रिमेंट कर बहाली करनी थी. लेकिन कपंनी एक-दो स्थनों पर खुद खनन कर रही है. बाकि जगहों पर ठेकेदारों को कम्पनी ने खनन के लिए ठेका दे दिया है. खनन कर रहे ठेकेदार अपनी क्षेत्र सीमा से बाहर जा कर खनन का काम करते हैं, पर हिंडालको कंपनी उन्हें कुछ नहीं बोलती.

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हिंडालको को खुद करना था काम, पर ठेकेदारों को दे दिया काम का ठेका

हिंडालकों ने एनएडीए, जीएनएस, होरिजेनस, मां तारा, एमभीइ, एमएसइ, वाईसी, ओसी, आलइड जैसी कंपनियों को ठेका पर खनन का काम दिया है. ये सभी ठेकेदार उन इलोकों में भी खनन करतें है जहां हिंडालको को खनन पट्टा नहीं मिला है. लीज क्षेत्र से बाहर जाकर पूरे इलाके में खनन किया जा रहा है, जिसमें वन क्षेत्र वह इलाका भी शामिल है जो लीज के अन्तर्गत नहीं आता.

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नियम के विरूद्ध बेखौफ होता है जेसीबी का प्रयोग

जानकार बताते हैं कि खनन में ऑटोमैटिक मशीनों का उपयोग नहीं किया जाना था, लेकिन जिन्हें हिंडालको ने काम दिया वे सभी ठेकेदार बेधड़क जेसीबी मशीनों का उपयोग कर रहे हैं. साथ ही ब्लास्टिंग करके अवैध रूप से बॉक्साइट खनन कर रहे हैं. इसे रोकने वाला कोई नहीं. मामले में सभी संर्दभ लोगों का कमीशन तय है. वह अपनी हिस्सेदारी लेकर आदिवासीयों को मौत के मुंह में धकेलते जा रहे है.

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क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा बुरा असर

बाक्साइट खनन के इलाको में वहां रहने वाले लोग के स्वास्थ्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है. इसका खुलासा जेरोम जेराल्ड कुजूर एवं राकेश रोशन किड़ो वाले को अध्यन रिपोर्ट में समाने आया है. जिसमें हकीकत को समाने लाने का काम किया. खनन से प्रभावित इलाके में प्रदूषण से होने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है. इस अध्ययन में 5 गांव के 226 परिवार को शामिल किया गया. इनमें 78 परिवार असुर समुदाय से, 144 परिवार मुंडा समाज से और 5 परिवार उरांव समुदाय के है.

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खनन से शिक्षा पर प्रभाव

पिछले 40 सालों से नेतरहाट के पठार पर खनन का कार्य हो रहा है. खनन से पूर्व कंपनी ने सरकार को क्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा देने का दावा किया करती थी. जबकि जमीनी हकिकत कुछ और बयां करती है. 78 असुर परिवार की कुल आबादी 792 है. जिसमें मात्र 136 पुरूष और 94 महिला सदस्य ही साक्षर हैं. मुंडा समुदाय के 144 परिवार खनन से प्रभावित है जिसकी कुल आबादी 989 है. जिसमें 35.89 प्रतिशत लोग ही साक्षर हैं. ऐसा ही हाल उरांव समुदाय के पांच परिवारों का है. इनकी आबादी 54 है, जिसमें 34 लोग ही साक्षर हैं. पूरा इलाका आज भी आर्थिक रूप से कमजोर है. बच्चों अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए 10-12 साल के उम्र से ही बॉक्साइड को ट्रकों पर लोड करने का काम मजबूरीवस करते हैं.

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प्रभावित क्षेत्र के लोगों की अजीविका के स्रोत पर क्या प्रभाव पड़ा

इलाके में खेती के काम के लिए बारिश के पानी के अलावा और कोई दूसरा साधन नहीं है. इलाके की आजीविका का प्रमुख आधार खेती है. खनन के पूर्व लोगों का दावा है कि यहां मोटे अनाज की उपज अधिक होती थी. खनन के बाद इसके उपज में कमी आई है. कारण बताते हुए लोगों ने कहा कि गर्मी के दिनों में धूलकण उड़कर खेतों में चले आते हैं. बरसात में यही धूल बहकर खेतों में आने से उपज में कमी आई है.

रिपोर्ट के अनुसार यदि हम कम्पनी के दावों को याद करें तो उनके दावे यहां भी खोखले साबित हुए हैं. कंपनी का कहना है ऊपरी ढाल वाले भागों में चारों ओर वर्षा के पानी को रोकने के लिए सीमेंट और कॉक्रीट की नाली बनायी जाएगी. यह पूरे इलाके में कही नहीं दिखता.

रैयतों के जमीन पर भी हिंडालको खनन करने से नहीं चूक रही है. कंपनी रैयतों को मुवाआजा के तौर पर प्रति एकड़ एक लाख रूपये की दर से भूगतान करती है. फिर उस जमीन से खनन कर रैयात को जमीन उपजाउ बाना के लौटना होता है. पूरे इलाके में एक भी ऐसे रैयत नहीं मिले जिनकी जमीन को कंपनी ने उपजाउ बाना कर लौटाया हो.        

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जल स्तर की स्थिति

क्षेत्र में पेयेजल की समस्या विकराल है. बरसात के पानी को रोकने की व्यवस्था नहीं होने के कारण गांव के लोग आज भी चुआं से अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं. आज इन इलाकों में पानी से जनित कई रोग हो रहे हैं, जिसका उपचार भी नहीं हो पा रहा है.

वन एवं वन संपदा पर प्रभाव

ठेकेदारों से खनन कार्य करने से वन की जमीन पर अवैध खनन का कार्य तेजी से चालू है. वन विभाग भी अपने नक्से में इस बात को स्वीकार कर चुका है कि जंगल की जमीन से अवैध खनन हो रहा है. लेकिन आज तक इसे रोका नहीं जा सका. ठेकेदारों द्वारा अवैध खनन के लिए जंगल की जमीन का उपयोग किया जा रहा है. इसका पूरा क्षेत्र जहां सड़के नहीं है, वहां भी जंगल से बॉक्साइट उठाने के लिए ट्रकों का आना जाना होता है. ट्रकों के आवाजाही से जंगल में कच्चे रास्ते बनते और बिगड़ते हैं.

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सभी अवैध खनन को वैध बनाता है हिंडालको

इलाके में मजदूरों को 1200 रूपये प्रति ट्रक देखर बॉक्साइट का अवैध खनन कराया जाता है. फिर उसे ठेकेदार चार हजार रूपया प्रति ट्रक की दर से कंपनी को बेचते हैं. कंपनी इन अवैध माल का चालान बनाकर वैध करने का काम करती है. ठेकेदारी से हो रही खनन ने पूरे इलाके को तहस नहस कर दिया है. कपंनी खनन इलाके के लिए दावा करती है कि खदान क्षेत्र के चारों ओर 2500 पेड़ हर साल लगते है. कपंनी का यह दवा भी खोखला ही निकला. पेड़ लगाना तो दूर पठार क्षेत्र के ढलान पर अवस्थित बचे साल के वृक्षें को भी नहीं बचा रही है.

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