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जमीर जिंदा रखिये मेरे भाई…

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Surendra Nath Mishra

सोच और नजरिये की समृद्ध विरासत के बावजूद नौकरशाही के लोग इस समय दिवालियेपन की बानगी पेश करते नजर आ रहे हैं. झारखंड सरकार में मुख्य सचिव सरीखे सर्वोच्च ओहदेदार को 2003 से 2014 तक स्पष्टीकरण देने को 30 बार रिमाइंडर दिया गया. अभी तक झारखंड सरकार की चीफ सेक्रेटरी राजबाला वर्मा इन 15 वर्षों में अलग-अलग जिलों की डीसी भी रहीं. चाईबासा ट्रेजरी से कपटपूर्ण तरीके से पचासों करोड़ की निकासी के आदेश देने का औचित्य बताने के लिए राजबाला वर्मा को 30 बार स्पष्टीकरण पूछा गया. आज की तारीख तक इन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, इसलिए पशुपालन घोटाले के आरोपियों की कतार में खड़ीं हैं.

भारतीय प्रशासनिक सेवा के सर्वोच्च पदों पर बैठे ऐसे लोग क्यों पूरे सिस्टम का कबाड़ा निकालने पर आमादा हैं. 30 स्पष्टीकरण और 14 साल का समय क्यों दिया गया इन्हें. आम सरकारी मुलाजिम पर एक स्पष्टीकरण की अनदेखी पर कितनी बड़ी गाज गिरती है यह बताने की जरूरत नहीं. फिर चीफ सेक्रेटरी कैडर की यह अफसर कानून और व्यवस्था से उपर कैसे हो गयीं ? इनपर कड़ी कार्रवाई कब होगी ? या फिर रघुवर दास ने झारखंड के चुनिंदा नौकरशाहों को मनमर्जी की खुली छूट दे रखी है ? धन्यवाद सरयू राय जी को जिन्होंने मुख्यमंत्री रघुवर दास को नसीहत के अंदाज में इस मामले के बाबत पत्र लिखकर तो पूछा.

झारखंड सचिवालय में कई विभागों के निदेशकों, सचिवों ने तथ्यों की सुविधानुसार व्याख्या करते हुए पूरे सिस्टम को हाईजैक कर रखा है. इनके कारनामों की बानगी न तो प्रिंट मीडिया, न ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबर बनते दिख रही है. सरकारी विज्ञप्तियों और नेताओं की जुगाली छापने-दिखाने को ही अगर पत्रकारिता कहते हैं तो जनहित में ऐसी पत्रकारिता बंद होनी चाहिये. पंच सितारा सुविधाओं के हकदारों की कतार में शामिल झारखंड के कुछ स्वनामधन्य पत्रकारों ने तो हद कर दी है. बाबूराव विष्णुराव पराडकर के जमाने की पत्रकारिता तो अखबारों में करोड़ों के विज्ञापनों के बोझ तले मर चुकी है. जमीर जिंदा रखिये मेरे भाई. आपको एक-एक कर अपने कारनामों का जल्द हिसाब देना होगा.

(लेखक के निजी विचार हैं)

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