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जन अधिकार यात्रा ने अधिकारों के लिए संघर्ष तेज़ करने का लिया संकल्प

रांची : एक दस-दिन की जन अधिकार यात्रा का झारखंड के गांवों, जंगलों व पहाड़ों से गुजरने के बाद रविवार को रांची में एक बड़े प्रदर्शन के साथ समापन हो गया। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य था लोगों को उनके आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों पर केंद्र व राज्य सरकार द्वारा बढ़ते हमलों के विरुद्ध संगठित करना।

यात्रा मुख्य रूप से पांच मुद्दों पर केंद्रित रही : (1) रोज़गार की गारंटी व मनरेगा पर प्रहार; (2) खाद्य सुरक्षा व राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून को लागू न करना; (3) जल, जंगल जमीन व भूमि अधिग्रहण; (4) वन अधिकार व वन अधिकार कानून और (5) सामाजिक सुरक्षा पेंशन। यात्रा ने राज्य दमन व हजारों निर्दोष आदिवासियों का जेल में कैद होने का भी खुलासा किया।

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पूरे झारखंड से आए हज़ारों लोगों ने मोराबादी मैदान से राज भवन तक जुलूस निकाला, जहां एक बड़ी जन अधिकार सभा हुई। इस सभा में लोगों ने यात्रा के अनुभवों, अधिकारों पर हो रहे हमलों व अधिकारों के लिए संघर्ष को और तेज़ करने की बात रखी।

विनोद सिंह (ऑल इण्डिया पीपल्स) फोरम ने कहा कि सब जगह यात्रा ने सरकार द्वारा कानूनों के उल्‍लंघनों के नकारात्मक असर को देखा। उन्होंने यह भी कहा कि यात्रा का भारी समर्थन लोगों द्वारा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के संकल्प का प्रतीक है।

दक्षिणी छोटानागपुर यात्रा के दल से फ़ादर स्टेन स्वामी (बगाइचा) ने लोगों से कहा कि केंद्र की नई सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में जनता-विरोधी संशोधनों को लोगों के संघर्ष के कारण वापस लेना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि अभी के लिए तो खतरा टल गया है, पर केंद्र व राज्य सरकार लगातार अन्य उपायों से भूमि अधिग्रहण करने की कोशिश में लगी हुई है।

दयामनी बारला ने बताया कि यात्रा खूंटी भी गई जहां पहले लोग कोयल कारो बांध के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे और अब तजनार बाँध के निर्माण को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

रामस्वरूप (एकता परिषद) ने झारखंड में वन अधिकार कानून के बुरे कार्यान्वयन के बारे में बात रखी। उन्होंने कहा कि लोग वन भूमि का पट्टा पाने के लिए दर दर भटक रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड में हज़ारों लोग भूमिहीन है, पर अभी तक राज्य सरकार ने भूदान बोर्ड का गठन नहीं किया है।

उत्तरी छोटानागपुर यात्रा से जुड़े अफजल अनीस (युनाइटेड मिली फ़ोरम) ने कहा कि झारखंड सरकार ने पिछले महीने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने की घोषणा की, पर यात्रा ने देखा कि कही भी लोगों के पास नए राशन कार्ड नहीं थे।

बलराम (भोजन का अधिकार अभियान) ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने में विलम्ब स्वाभाविक है, चूंकि केंद्र सरकार ने ही यह कानून लागू करने की अंतिम तिथि को गैर-कानून रूप से तीन बार आगे बढ़ाया है।

जेम्स हेरेंज (नरेगा वॉच) ने मनरेगा में उत्‍पन्‍न हुए संकट के बारे में लोगों को जानकारी दी। उन्होंने कहा कि चूंकि सरकार लगातार मनरेगा को कमज़ोर करती जा रही है, यह कार्यक्रम अपने उद्देश्यों को – जो है लोगों के जीवन में कुछ आर्थिक सुरक्षा लाना, गांव में उपयोगी संपत्ति का निर्माण करना व स्थानीय लोकतंत्र को मज़बूत करना – पूरा नहीं कर पा रहा है। उन्होंने लोगों को बताया कि केंद्र सरकार ने मनरेगा पर खर्च 2010-11 में 40,000 रुपए से घटा कर 2014-15 में 38,597 रुपए कर दिया, जिसके कारण राज्य मनरेगा में काम करने के इच्छुक सभी ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन का रोजगार नहीं दे पा रहे हैं। उन्होंने सभा में उपस्थित लोगों को बताया कि पलामू-लातेहार की यात्रा गढ़वा के कई ऐसे गांवों से गुज़री जहां नरेगा का कोई काम उपलब्ध नहीं था, जबकि वह क्षेत्र सूखा से जूझ रहा है।

श्यामा सिंह (मनरेगा सहायता केंद्र मनिका) ने कहा कि नरेगा में सबसे गंभीर समस्या है मज़दूरी भुगतान में देरी। उन्होंने कहा कि मेराल के निकट कोलोदोहर गांव में मजदूरों को 18 महीनों बाद मज़दूरी मिली।

धीरज कुमार (रोज़ी रोटी अधिकार अभियान) ने कहा कि यात्रा सैकड़ों एसे वृद्ध व विधवाओं से मिली जिनको पेंशन नहीं मिल रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की उदासीनता के कारण कई वंचित लोगों को पेंशन नहीं मिल रही है।

ज्यां द्रेज ने लोगों को याद दिलाया कि उनके भोजन, रोज़गार, शिक्षा, वन, सूचना आदि के अधिकार सालों के संघर्ष से ही हासिल हुए हैं, और अब इन अधिकारों को बचाने के लिए और मेहनत करनी होगी। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य को भी एक सार्वजनिक अधिकार बनाने की बहुत ज़रुरत है, चूंकि देश के करोड़ों लोग स्वास्थ्य सेवाओं को प्राप्त नहीं कर पाते।

सभा में लोगों ने नारे लगाए व गीत भी गाए। झारखंड जन संस्कृति मंच व मांडर ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।
(प्रेस विज्ञप्ति)

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