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घोषणाओं के जश्न पर भारी नाकामी का सच

रूपक राग
केंद्र और राज्य सरकार क्या केवल घोषणाओं के बल जनता का कल्याण करना चाहती है. 2017 का अंत और 2018 की शुरुआत हो रही है. लेकिन केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में रघुवर सरकार के नेतृत्व में आमजनता का कितना विकास हुआ, इसे भाषणों के आभामंडल और चमकते विज्ञापनों की आड़ में कहीं छुपाने की साजिश तो नहीं की जा रही. लोकसभा के सत्र के दौरान कई सवालों के जवाब मोदी सरकार के मंत्रियों ने दिये हैं. खुद सरकार की तरफ से संसद में पेश आंकडें विकास के दावों को बेनकाब करती हैं. तो दूसरी तरफ नीति आयोग की रिपोर्ट झारखण्ड में रघुवर सरकार के विकास पुरुष होने को खोखला साबित कर रहे हैं.

रूपक राग
केंद्र और राज्य सरकार क्या केवल घोषणाओं के बल जनता का कल्याण करना चाहती है. 2017 का अंत और 2018 की शुरुआत हो रही है. लेकिन केंद्र में मोदी सरकार और राज्य में रघुवर सरकार के नेतृत्व में आमजनता का कितना विकास हुआ, इसे भाषणों के आभामंडल और चमकते विज्ञापनों की आड़ में कहीं छुपाने की साजिश तो नहीं की जा रही. लोकसभा के सत्र के दौरान कई सवालों के जवाब मोदी सरकार के मंत्रियों ने दिये हैं. खुद सरकार की तरफ से संसद में पेश आंकड़ें विकास के दावों को बेनकाब करती हैं. तो दूसरी तरफ नीति आयोग की रिपोर्ट झारखण्ड में रघुवर सरकार के विकास पुरुष होने को खोखला साबित कर रहे हैं.

हमारे रिपोर्टर गौरव ने नीति आयोग के आंकड़ों के हवाले से लिखा है कि झारखण्ड के 24 में से 19 जिले राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य के मामले में शर्मनाक ढंग से फिसड्डी हैं. यह पिछड़ापन किसी प्रतियोगिता का नहीं बल्कि इससे झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं की त्रासदी का पता चलता है. यह इसलिए भी आधुनिक समाज के लिए चिंताजनक और शासन के लिए शर्मनाक है, क्योंकि देश की निर्धनतम आबादी का बसेरा हमारा झारखंड ही है. यहां जनसंख्या के हिसाब से डॉक्टर और मरीज का अनुपात देश में सबसे कम है. सभी मरीजों को सरकार बेड नहीं मुहैया करा पाती. यह हाल रिम्स और जिला सदर अस्पतालों से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक है. एनएफएचएस-4 के आंकड़े भी सरकार की हेल्थ सर्विस की नाकामी की पोल खोलते हैं. स्थिति यह है कि राज्य सरकार के पास कोई अपनी स्पष्ट हेल्थ नीति तक नहीं. ऐसे में क्यों नहीं झारखण्ड में स्वास्थ्य के ऐसे अमानवीय मानक सामने आयेंगे.

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दूसरी तरफ हम केंद्र सरकार की बात करें तो जिन योजनाओं को सरकार ने महत्वकांक्षी और मील का पत्थर बताया था, वे भी फेल होती देख रही हैं. यह फेलयर जनता के स्तर से नहीं बल्कि शासकीय स्तर का है. कई लोक कल्याणकारी योजनाओं में केंद्र सरकार एक फीसदी भी राशि खर्च नहीं कर पाई. यह हम नहीं, बल्कि आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं. मोदी सरकार ने अटल पेंशन, जनधन, जीवन ज्योति, आम आदमी बीमा योजना, वरिष्ठ बीमा योजना जैसी कई जनकल्याण की योजनाओं की घोषणा की थी. लेकिन, उनके क्रियान्वयन में गंभीरता नहीं दिखाई गयी.

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वर्ष- 2016-17 में अटल पेंशन योजना में 200 करोड़ की राशि आवंटित की गयी, जबकि खर्च केवल 29 करोड़ किये जा सके. पीएम जनधन योजना में आवंटित 100 करोड़ के मुकाबले सिर्फ 01 करोड़ रुपये ही खर्च किये जा सके. इसी तरह आम आदमी बीमा योजना के 450 करोड़ में से सारी की सारी राशि बेखार्चे ही रह गयी. वरिष्ठ बीमा योजना के तहत आवंटित 109.32 करोड़ रुपये में से भी राशि खर्च नहीं की जा सकी.

इस तरह हम समझ सकते हैं कि इन योजनाओं का लाभ आमजनता को कितना मिला पाया होगा. इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट की भी स्थिति कोई अच्छी नहीं है. नमामि गंगे प्रोजेक्ट के 2615 करोड़ खर्च नहीं हो सके. नमामि गंगे परियोजना पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में यह चौंकानेवाला खुलासा हुआ है. यह स्थिति तब है जब खुद पीएम मोदी इस प्रोजेक्ट को लेकर कभी उत्साहित और गंभीर थे. कैग ने खुलासा किया कि 113 स्थलों में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केवल 36 स्वचालित गुणवत्ता प्रणालियों को लगा पाया. साथ ही राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, विभिन्न राज्य कार्यक्रम प्रबंधन समूहों तथा कार्यपालक एजेंसी एवं केंद्रीय क्षेत्र के उपक्रमों के पास काफी मात्रा में धनराशि अनुपयोगी पड़ी रही.

इसी तरह दिल्ली में निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा पहली बार सरकार के लिए प्राथमिकता में आया था. महिला सुरक्षा को लेकर कानून के साथ नीतिगत कई फैसले लिए गये थे. निर्भया योजना उन्हीं में से एक है. मगर यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस योजना की एक फीसदी राशि भी सरकार द्वारा खर्च नहीं की जा सकी. कैग ने खुलासा किया कि महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण को समर्पित योजना निर्भया की 99 फीसदी राशि राजकोष में ही रह गये. इतना ही नहीं इस तरह की योजनाओं में निर्भया कोष, मेक इन इंडिया, राष्ट्रीय निवेश एवं अवसंरचना कोष, वरिष्ठ नागिरक कल्याण कोष और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम जैसी कई योजनायें हैं जिनके लिये आवंटित राशि पूरी तरह खर्च नहीं हो पाई और उसे लौटा दिया गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के लिये आवंटित राशि में से काफी अधिक राशि (100 करोड़ रुपये से अधिक) को लौटाया गया. विभिन्न प्रकार के अनुदानों, विनियोग के तहत दी गई इस प्रकार की 2,28,640 करोड़ रुपये की राशि, इसमें वर्ष के दौरान अतिरिक्त अनुदान भी लिया गया जो कि अंतत: इस्तेमाल नहीं हुआ और वित्त वर्ष के आखिरी दिन उसे लौटा दिया गया.

इन आंकड़ों का मतलब क्या निकलता है. यही कि प्रधानमंत्री केवल घोषणाओं से संतुष्ट हो जाते हैं और हमारे मुख्यमंत्री महंगे कार्यक्रमों का आयोजन करके. लेकिन उनकी घोषणों और योजनाओं का क्या हश्र हो रहा है, इसकी निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है. गुजरात, हिमाचल की चुनावी सभाओं में व्यस्त पीएम मोदी और 3 साल शासन का जश्न मनाने में डूबे सीएम रघुवर दास को अब जमीनी हकीकत से भी रूबरू होनी चाहिए.

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