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आदिवासी भाषाओं के अस्तित्व पर संकट, डिग्रीधारी हैं बेरोजगार, कॉलेजों में खाली शिक्षकों के पद

Pravin Kumar

Ranchi, 16 November: झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है. यहां रहने वाले आदिवासियों की पहचान उनकी संस्कृति और भाषा से है, लेकिन ग्लोबलाइजेशन का आदिवासियों की संस्कृति के साथ-साथ उनकी भाषा पर भी गहरा असर पड़ा है. झारखंड में करीब 30 आदिवासी जातियां अनुसूचित जनजाति की सूची में हैं, लेकिन उन 30 जनजातियों में से मात्र 5 जनजातियों की भाषा ही फिलहाल साहित्यिक दृष्टिकोण से प्रचलन में है. जबकि हर आदिवासी समूह की अपनी बोली रही है, लेकिन विडंबना यह है  सरकारी संरक्षण, संवर्धन और प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण आदिवासी भाषाओं की दशा खराब हो गयी है. पीपुल्स लिंग वेस्टिंग ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण के मुताबिक देश में बोली जाने वाली 800 भाषाओं में से आधी भाषाएं अगले 50 वर्षों में सुनाई नहीं देगी. सर्वे के मुताबिक देश में करीब 780 भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें से 400 भाषाओं पर खतरा मंडरा  रहा है, जिसमें झारखंड की भी कई आदिवासी भाषा शामिल हैं. देश में बोली जाने वाली 250 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं और 130 से अधिक भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं जिसमें आदिम जनजाति असुर की भाषा भी शामिल है.

ऐसा ही रहा तो 50 सालों बाद नहीं सुनाई देगी जनजातीय भाषायें : हो भाषा विशेषज्ञ

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‘हो’ भाषा के विशेषज्ञ डोबरो विड़िउली का कहना है कि झारखंड की आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के कगार पर पहुंचती जा रही है. अगर सरकार ने इन भाषाओं को संरक्षित नहीं किया तो आने वाले 50 सालों में यह भाषा सुनाई नहीं देंगे. इन्हें बचाने का एकमात्र उपाय यही है कि स्कूलों के साथ-साथ यूनिवर्सिटी में भी इन भाषाओं की पढ़ाई सुचारू रूप से हो. डॉ असारीता टूटी कहती हैं कि झारखंड  में क्षेत्रीय और जनजातीय भाषा को  द्वितीय राजभाषा का  दर्जा 2011 में दिया गया. इसके बावजूद राज्य में भाषा विकास  के लिए अब तक सरकार के द्वारा कोई ठोस कार्य धरताल में नहीं दिख रहे हैं. उन्होंने कहा कि पिछले कई सालों से रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय भाषा विभाग में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है. यह जनजातीय भाषाओं के प्रति सरकार के नजरिये को दिखता है. चाहे सरकार किसी भी दल की हो. सभी ने झारखंडी भाषाओं के विकास के नाम पर राज्यवासियों को छला है.

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जनजातीय भाषाओं में नेट, पीएचडी, एमफिल अभ्यर्थी बेरोजगार

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा एसोसिएशन ऑफ सीनियर यूजीसी जेआरएफ नेट उत्तीर्ण अभ्यर्थियों के एसोसिएशन की सदस्य डॉ. दमयंती सिंकू बताती हैं. राज्य में क्षेत्रीय और जनजातीय भाषा के प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए शिक्षक नहीं है. जबकि वस्तुस्थिति यह है कि राज्य में कई वर्षों से विश्वविद्यालय में शिक्षकों का नियुक्ति नहीं की गयी है. जिस कारण विश्वविद्यालय के कई पद रिक्त हैं.

1996 में हुई परीक्षा, अबतक नहीं आया रिजल्ट

दमयंती सिंकू ने बताया कि रांची विश्वविद्यालय में क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना 1980 में स्थापना गई थी, तब से यहां 5 जनजाति एवं चार क्षेत्रीय भाषा की पढ़ाई नियमित रूप से हो रही है. 1ए-बी. एस. यू. एस. सी.- 1996 में पहली बार जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा के लिए बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग (पटना) विज्ञापन ने 62 पदों पर लगभग 30 अभ्यर्थियों से साक्षात्कार लिये गये, पर परिणाम अब तक लंबित है. विज्ञापन में दिए गए अन्य दूसरे विषय का परिणाम निकला और उनकी  नियुक्ति भी नहीं की गई.

2007 में जेपीएससी ने निकाला था विज्ञापन, आज भी नियुक्ति का इंतजार कर रहे 196 अभ्यर्थी

उन्होंने बताया कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. 2007 में भी झारखंड लोक सेवा आयोग ने भी विज्ञापन निकाला और सभी दूसरे विषय के शिक्षक नियुक्त किये गये, लेकिन 9 झारखंडी भाषाओं के 196 अम्यर्थियों को नियोजित नहीं किया गया. आज भी वो लोग अपनी नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं.

नियम बदलने से लटक गया नियुक्ति का मामला

नेट उर्तीण हेसेल सारू कहती हैं कि 2017 में फिर से जेपीएसी ने अनुबंध पर नियुक्ति का आवेदन मांगा. साक्षात्कार भी लिये गये, इसके बाद राज्य सरकार ने नियम बदल दिये. फिर नियुक्ति का मामला अटक गया. उन्होंने कहा कि अखिर क्षेत्रिय भाषाओं के साथ इस तरह सौतेला व्यवहार सरकार क्यों कर रही है. कहीं आदिवासी भाषा के प्रति सरकार का यह नजरिया भाषा को मारने की तो साजिश तो नहीं है.

नौकरी करने की उम्र सीमा हो रही खत्म

डॉ तालकोलिन कुल्लू का कहना है की झारखंड बनने के बाद भी यहां के भाषाओं को सम्मान नहीं मिल रहा है और वे लोग अपनी भाषा में पढ़ाई कर खुद को ठगे हुए महसूस कर रहे हैं. सरकार के प्रति आक्रोश है, लेकिन आखिर क्या कर सकते हैं. अब तो नैकरी की उम्र सीमा भी खत्म होने को है.

आरयू में जनजातीय भाषाओं के शिक्षकों के अधिकतर सीट खाली

रांची विश्वविद्यालय में मुंडारी भाषा के शिक्षक के लिए कुल 25 पद सृजित हैं, जबकि इनमें से 23 पद रिक्त है. वहीं इस भाषा में अबतक 60 उम्मीदवार नेट उत्तीर्ण हैं. जो नौकरी के इंतजार में हैं. संताली भाषा में कुल 06 पद सृजित हैं. सभी छह पद रिक्त पड़े हैं, जबकि 50 लोग इस भाषा में नेट उतीर्ण हैं. हो भाषा के लिए 6 पद सृजित हैं. सभी छह पद रिक्त हैं, जबकि 40 लोग इस भाषा में नेट उतीर्ण हैं. खड़िया भाषा के चार पद सृजित हैं. चारों पद रिक्त हैं, जबकि इस भाषा में 22 लोग नेट उतीर्ण हैं. उपरोक्त भाषाओं में कुल 234 लोग नेट उतीर्ण हैं, जो अपनी नियुक्ति के इंतजार में बूढ़े होते जा रहे हैं. ऐसा ही हाल अन्य भाषाओं में भी है.

1980 से 2011 तक तीन बार किये गये पद सृजित

झारखंड में क्षेत्रीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा 1980 से 2011 तक तीन बार पद सृजित किए गए, लेकिन इन पदों पर बहाली के लिए कोई मुकम्मल प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी. सैकड़ों स्टूडेंट्स आज भी क्षेत्रीय जनजातीय भाषा विभाग में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. बिना शिक्षक के इन्हें अपना पढ़ाई पूरा करना पड़ता है. क्षेत्रीय भाषा विभाग में शिक्षक तो नहीं हैं, फिर भी विडंबना यह है कि छात्रों को एमफिल, पीएचडी की डिग्रियां प्रदान की जा रही है.

पूरी दुनिया के जनजातीय भाषाओं पर संकट

1992 में एक अमेरिकी भाषा शास्त्री ने कहा था कि 2100 तक दुनियाभर की 90 फीसदी भाषाएं समाप्त हो जाएंगी और साढ़े 6 हजार भाषाओं में से तकरीबन 3000 केवल 100 सालों में खत्म हो जायेगे. आज विश्व स्तर पर ढाई हजार भाषाओं में से आदिम जनजाति असुर की भाषा गिनी जा रही थी जो अब गिने चुने लोग ही बोलते है यह खत्म होने के कगार पर हैं.

क्यों समाप्त हो रही जनजातीय भाषाएं

भाषा वैज्ञानिकों की मानें तो इन भाषाओं को बचाने के लिए सार्थक कदम नहीं उठाए गए तो इनका मिटना तय है. जिन भाषाओं के अस्तित्व पर सबसे ज्यादा संकट मंडरा रहा है उनके संरक्षण पर ध्यान देना सबसे ज्यादा जरूरी है. आज के समय में झारखंड के आदिवासी कई संकटों का समना कर रहे हैं. विकास का बुलडोजर उनके बसाहट पर चल रहा है. आदिवासी अपनी बसहाट को छोड़ कर अजीविका के लिए पलायन करने की वजह से दूसरे समूहों में जाने  को विवश हैं और वहां  रहने के कारण उनकी भाषा प्रभावित हो रही है. यही नहीं, उन्हें मजबूरन दूसरी भाषाओं को अपनाना पड़ रहा है. इसके अलावा रोजी-रोजगार का संकट, बाहरी हस्तक्षेप और धर्म परिवर्तन आदि भी कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से इनकी संस्कृति और भाषा समाप्त हो रही है. भाषा को बचाने के लिए सरकार को भाषागत रोजगार के आयम बढ़ाने होंगे. वहीं इतिहासकार अशोक कुमार सेन का मनना है झारखंड की आदिवासी भाषा बचाने का एकमात्र रास्ता है कि इसे रोजगार से जोड़ा जाए नहीं तो मानव समाज विकास की कई परंपरा, संस्कृति और इतिहास विलुप्त हो जायेगी.

 

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