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अनाथ भाजपा के नाथ राजनाथ

|| विनय गोयल ||
बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा। और राजनाथ को डूबती भाजपा की नैया पार लगाने का दायित्व एक बार फिर सौंपा गया है। भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी मामलों को फिलहाल विराम लग गया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव बिना किसी चींचपड़ के निपट ही गया। आखिरकार राजनाथ सिंह के नाम पर संघ व पार्टी की सहमति बन ही गयी। अटकलों पर भी विराम लग गया। अटकलों के बीच ही राजनाथ की दोबारा निर्विरोध अध्यक्ष पद पर ताजपोशी कर दी गयी। यह बात दीगर है कि अध्यक्ष पद की ताजपोशी कांटों से भरी हुई है। राजनाथ की राह इतनी आसान नहीं है। राजनाथ के आगे पार्टी की अंदरूनी कलह, आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी की साख बनाने की चुनौती, राहुल गांधी के मुकाबले खुद राजनाथ को बेहतर साबित करने की चुनौती, भाजपा के गढ़ उप्र में डूबती नैया को पार लगाने की चुनौतियों को सामना करना है। वैसे भी उनकी अध्यक्ष पद पर ताजपोशी भी भाग्य के सहारे हुई है।

2009 में भारतीय जनता पार्टी की कमान राजनाथ से लेकर नितिन गडकरी को सौंप दी गयी थी। गडकरी को संघ का वरदान प्राप्त था। गडकरी ने अपने काल में अजब गजब फैसले किये। जिनकी आलोचना व सराहना भी हुई। गडकरी की ताजपोशी से हिन्दी भाशी भाजपाइयों को काफी निराशा हुई। राजनाथ चूंकि उप्र से राजनीति कर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। इसलिये उप्र के कार्यकर्ताओं के लिये नये न थे। लेकिन गडकरी महाराष्ट्र से आते हैं। उन्होंने कभी भी कोई चुनाव नहीं लड़ा था। संघ के सहयोग पर उन्हें महाराष्ट्र में प्रदेश अध्यक्ष मिला था। राष्ट्रीय राजनीति का उन्हें कोई अनुभव न था। फिर भी संघ की सिफारिश पर पार्टी का अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। उस समय भी उनके अध्यक्ष बनने पर अंदरूनी विरोध के स्वर मुखर हुए थे।

एक नजर राजनाथ सिंह पर
62 वषीर्य राजनाथ सिंह उप्र के चंदौली जिले से संबंध रखते हैं। वह काफी समय तक आरएसएस से जुड़े रहे हैं। इसके अलावा वो जनता पार्टी से भी जुड़े थे। वह भौतिक विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट है। राजनीति में आने से पहले मिर्जापुर जिले में लेक्चरर थे। वह अपने व्यक्तित्व के कारण मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के शासन काल में शिक्षा मंत्री बनाये गये। नकल विरोधी अभियान के तहत उन्होंने ही नकलची छात्रों के हाथों में हथकड़ी व जेल का रास्ता भी राजनाथ सिंह ने दिखाया था। उप्र के मुख्यमंत्री पद राजनाथ ने दो वर्ष तक राज किया था। राजनाथ ने ही भाजपा के एक मात्र नेता हैं जिन्हें पार्टी के नेतृत्व की जिम्मेदारी एक से अधिक बार मिली है। 2005 में आडवाणी पर कुछ आरोप लगाये गये थे। जिनके चलते आडवाणी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उस वक्त भी राजनाथ ने ही पद भर संभाला था। उसके बाद उन्हें फिर पूर्णकालिक अध्यक्ष पद पर चुना गया था। 2009 में उनका कार्यकाल पूरा होने पर संघ के प्रिय नितिन गडकरी को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन 2012 में गडकरी पर गंभीर आरोप लगे। पार्टी में उनके पर लगे आरोपों से कलह थे। संघ तो उन्हें दोबारा पार्टी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी देना चाहता था। लेकिन आडवाणी व अन्य नेता इसके खिलाफ थे। इस तरह राजनाथ सिंह के नाम पर संघ व पार्टी दोनों ने सहमति दे दी। इस प्रकार राजनाथ को दूसरी बार सहमति से पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया।

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