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हिंदू प्राचीन ग्रंथों में कृष्ण मृग को वायु और चंद्र का वाहन कहा गया है

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 Nw desk : सलमान खान के जेल जाते ही काले हिरण स्टार बन गये हैं. हालांकि वे पहले से ही स्टार हैं,  लेकिन लोग अब उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहते हैं. काला हिरण कोई मामूली हिरण नहीं है.  वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट बताते हैं कि इन हिरणों की आबादी में कमी आ रही है.  खास बात यहै कि काले हिरण हालात के मुताबिक खुद को बदलना जानते हैं.   नर ब्लैक बक का वजन आम तौर पर 34-45 किलोग्राम होता है और कंधे पर उसकी ऊंचाई 74-88 सेंटीमीटर होती है.  मादा  का वजन 31-39 किलोग्राम  और ऊंचाई नर से जरा कम होती है. मादा ब्लैक बक भी नर की तरह सफेद रंग लिये होती है.  दोनों की आंखों के चारों ओर, मुंह, पेट के हिस्से और पैरों के भीतरी हिस्से पर सफेद रंग होता है.  दोनों की पहचान में सबसे बड़ा अंतर सींग का होता है.  नर के लंबे सींग होते हैं.  

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राजस्थान में तो काले हिरण की संरक्षक करणी माता मानी जाती हैं

संस्कृत में कालेे हिरण का जिक्र कृष्ण मृग के रूप में मिलता है.  हिंदू प्राचीन ग्रंथों में भी कृष्ण मृग का स्थान है. ब्लैक बक यानी काला हिरण  भगवान कृष्ण का रथ खींचता नजर आता हैइसके अलावा काले हिरण को वायु,  सोम और चंद्र का वाहन भी माना जाता है.  राजस्थान में तो काले हिरण की संरक्षक करणी माता मानी जाती हैं.    नर ब्लैक बक का रंग भी बदलता है. मानसून के अंतिम दिनों में नर हिरणों का रंग काला दिखता है, लेकिन सर्दियां आते ही उनका रंग हल्का पड़ने लगता है. अप्रैल की शुरुआत तक फिर रंग भूरा हो जाता है.  भारत के दूसरे हिस्सों में इस प्रजाति के हिरणों का रंग काला नहीं पाया जाता.  दक्षिण भारत में इनकी बड़ी आबादी है और यहां इनका रंग काला नहीं होता.  

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बिश्नोई समुदाय इनकी पूजाा करता है   

 भारतीय संस्कृति में भी काले हिरण का खास स्थान रहा है.  अनुमान है कि सिंधु घाटी सभ्यता में य भोजन का स्रोत रहा है और धोलावीरा और मेह्रगढ़ जैसी जगह भी इसकी हड्डियों के अवशेष मिले हैं.  बिश्नोई जैसे समुदाय इनकी पूजा करते हैं.  आंध्र प्रदेश ने इन्हें स्टेट एनिमल का दर्जा दिया है.  16वीं से 19वीं सदी के बीच कायम रही मुगल सल्तनत में ब्लैक बक की कई छोटी पेंटिंग मिलती हैं.  भारत और नेपाल में ब्लैक बक को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता और नुकसान पहुंचाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाती है.   काले हिरण थोड़ी-बहुत हरियाली वाले अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में भी पाये जाते हैंआम तौर पर इनका चारा घास है.  

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