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हाल झारखंड के राजस्व का : जीएसटी और वैट ना होता, तो डूब चुकी होती लुटिया 

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: देश भर में खनिज संपदा में अव्वल कहे जाने वाले राज्य झारखंड की आर्थिक रूप से लुटिया डूब चुकी होती, अगर राज्य को वैट और जीएसटी का सहारा ना मिला होता. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि झारखंड की आर्थिक नीति बनाने वाले इस वित्त वर्ष 2017-18 में फेल दिखे. सरकार भले ही शराब बिक्री में, खनन संबंधित कार्यों में या राजस्व निबंधन में उठाए गए अपने कदमों पर खुद अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन सच यह है कि राजस्व वसूली में राज्य इस बार काफी पीछे पिछड़ गया. मिलने को तो सरकार को तीन अनुपूरक बजट मिला. तीनों मिलाकर हो गए 82161 करोड़ रुपए. लेकिन खर्च के मामले में सरकार 60,000 करोड़ के आंकड़े को भी नहीं छू पायी.

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उत्पाद विभाग (शराब संबंधित) की कमाई आधी

झारखंड राज्य बनने के बाद सरकार शराब व्यवसाय टेंडर के माध्यम से निजी हाथों में दे देती थी. लेकिन 2017-18 में सरकार ने अपनी नीति बदलते हुए शराब व्यवसाय को अपने हाथों में ले लिया. सरकार ने फ्रंटलाईन और शोमुख कंपनी को शराब बेचने के लिए लेबर आउटसोर्स का काम दे दिया. सरकार को उम्मीद थी कि उसके इस कदम से शराब के राजस्व वसूली में कमाल का इजाफा होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शराब से राजस्व वसूली का टारगेट सरकार की नीति की वजह से आधी वसूली पर ही अटक गया. सरकार ने इस वित्त वर्ष में 1600 करोड़ राजस्व वसूली का टारगेट रखा था. जिसके एवज में सरकार मार्च खत्म होने तक करीब 825 करोड़ ही वसूल पायी है. दूसरी तरफ सरकार के शराब बिक्री का काम अपने हाथ में लेने से राज्य भर में दुकानों में कमी आयी. शहरों में शराब दुकान पर भीड़ को देखते हुए पुलिसकर्मी तैनात किए जा रहे हैं.

जमीन की रजिस्ट्री

निबंधन ने किया निराश

सरकार ने महिलाओं के लिए एक और अहम योजना की शुरूआत की. सरकार ने घोषणा की कि महिला के नाम जमीन खरीदे जाने पर एक रुपए में ही निबंधन (रजिस्ट्री) का काम होगा. इस मामले में सरकार को मुंह की खानी पड़ी. पहले निबंधन सरकार की कमाई का मुख्य जरिया था. लेकिन महिलाओं के नाम एक रुपए में निबंधन शुरू करने के बाद राजस्व वसूली में काफी गिरावट देखने को मिल रही है. इधर पैसे वाले भी जमीन खरीद के लेन-देन का काम महिलाओं के नाम पर कर रहे हैं. जिससे सरकार को राजस्व में जबरदस्त तरीके से चूना लग रहा है. इस वित्त वर्ष में सरकार ने निबंधन से 900 करोड़ का टारगेट रखा था. लेकिन 2018 मार्च तक सरकार को निबंधन से सिर्फ 446 करोड़ रुपये की कमाई हुई. ये आंकड़ा लक्ष्य के आधे से भी कम है. ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार की तरफ से महिलाओं के नाम पर एक रुपये में जमीन का निबंधन कितना कारगर साबित हो पाया ?

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कक

खान + परिवहन + भूराजस्व = वैट और जीएसटी से कम

खनन कार्यों के लिए मशहूर झारखंड में सरकार खनन पट्टों और लीज से उतनी आमदनी नहीं कर पायी जितनी वो कर सकती थी. परिवहन विभाग ने भी सरकार को इस साल काफी निराश किया है. तीनों विभागों की कमाई मिला कर भी वैट और जीएसटी जितनी नहीं है. खनन विभाग ने इस वित्त वर्ष में 8508 करोड़ के टारगेट का पीछा करते हुए 5485 करोड़ की कमाई की. परिवहन विभाग का 1500 करोड़ का टारगेट था, लेकिन कमाई हुई सिर्फ 780 करोड़. जबकि भू-राजस्व विभाग 400 करोड़ के बदले सिर्फ 101 करोड़ की ही कमायी कर पाया. वहीं जब जीएसटी और वैट की बात करें तो वाणिज्य कर विभाग का 15500 करोड़ रुपए का टारगेट था, लेकिन वसूली हुई 9600 करोड़ की. कुल मिला कर हिसाब-किताब और गुणा भाग देखा जाए तो खनन, परिवहन और भूराजस्व ने मिलाकर उतनी कमाई नहीं की जितनी कमाई जीएसटी और वैट से हुई.

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