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हाई कोर्ट ने पुलिस विभाग पर उठाया सवाल, कहा: गिरफ्तारी के लिए नियमों और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर

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New Delhi: दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए दिशा-निर्देशों और पुलिस के इन निर्देशों को जमीनी स्तर पर वास्तविक ढंग से लागू करने में काफी अंतर है.

पुलिस को प्रशिक्षित और संवेदनशील बनाये जाने की है जरूरत

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की एक पीठ ने इस विरोधाभासी स्थिति की ओर विशेष ध्यान दिलाते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार किये जाने के संबंध में मानक मानदंडों को समुचित ढंग से लागू करने के लिए पुलिस को प्रशिक्षित और संवेदनशील बनाये जाने की जरूरत है. अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के लिए मानक मानदंड़ों और पुलिस द्वारा जमीनी स्तर पर उनके वास्तविक कार्यान्वयन के बीच अंतर खत्म होना चाहिए.

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हमें एक सार्थक दिशानिर्देश की आवश्यकता है

अदालत ने कहा कि हमें एक सार्थक दिशानिर्देश की आवश्यकता है’’ जैसे कि एक व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है, विशेषकर पारिवारिक विवाद के मामलों में और इस पहलू की आमतौर पर अनदेखी की जाती है.’’ पीठ ने कहा कि यह मामला व्यापक रूप से जनहित से जुड़ा है.’’ दिशानिर्देश शोषण के आरोप और पुलिस अधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी की धमकी को खत्म कर सकते है. अदालत ने दिल्ली निवासी अमनदीप सिंह जोहर की एक जनहित (पीआईएल) याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. याचिका में आरोपी को गिरफ्तार किये जाने और किसी व्यक्ति को पुलिस स्टेशन बुलाने के संबंध में दिशा-निर्देश बनाये जाने का आग्रह किया गया है.

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अगली सुनवाई 20 दिसम्बर को 

याचिका की सुनवाई करते हुए पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल (आरजी) दिनेश कुमार शर्मा को अदालत के समक्ष उठाये गये मुद्दे की जांच करने और अपनी स्थिति रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया था. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 20 दिसम्बर तय की है. वकील निखिल बोरवांकर के माध्यम से दाखिल याचिका में आग्रह दिल्ली पुलिस को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह मनमाने ढंग से टेलीफोन पर किसी व्यक्ति को थाने बुलाने से बचे.

डीजीपी सुलखान सिंह भी उठा चुके है सवाल

उल्लेखनीय है कि 31 दिसबंर 2017 को डीजीपी पद से रिटायर होने वाले सुलखान सिंह ने राज्य पुलिस के काम करने के तरीके पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा था कि ब्रिटिश पुलिस के खिलाफ पूरे स्वतंत्रता संग्राम और भारतीयों के संघर्ष की बात करें तो आपको कई उदाहरण मिल सकते हैं. आपको उनमें एक भी फर्जी केस, फर्जी एंकाउंटर, फर्जी सबूत और फर्जी जांच नहीं मिलेगी. उन्होंने पुलिस विभाग की लाइब्रेरी और राज्य अभिलेखों से रिसर्च कर भारतीय पुलिस और ब्रिटिश पुलिस के काम करने के तरीकों का विश्लेषण करने के बाद यह बात कही है. 

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