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सूबे के मुखिया दिव्यांगों के लिए बहाते हैं आंसू और समाज कल्याण विभाग दो साल में भी नहीं बना पाता है नियमावली

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Saurabh Shukla/Kumar Gaurav

Ranchi, 09 December: दिव्यांग एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनकर लाचारी और बेबसी महसूस होने लगती है. लेकिन ऐसा नहीं है कि वो किसी से कमजोर हैं. अगर उन्हें सही मार्गदर्शन मिले तो वो साबित कर सकते हैं कि, वो किसी से कम नहीं हैं. ऐसा नहीं है कि सरकार दिव्यांगों का ख्याल नहीं रखती या उनके विकास, उन्नती और तरक्की के बारे नहीं सोचती. लेकिन, सरकार के योजनाओं को अमलीजामा पहनाने वाला विभाग ही अगर सुस्त हो, तो फिर कोई क्या करे. कई बार, कई मौकों पर देखा गया है कि सूबे के मुखिया रघुवर दास दिव्यांगों के लिए आंसू बहा चुके हैं. उनसे कई वादे कर चुके हैं. लेकिन वो वादा फिलवक्त अधूरा है. वजह है विभाग की सुस्ती.      

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धुर्वा में इसबार भी मुख्यमंत्री ने की थी घोषणा

विश्व दिव्यांग दिवस के मौके पर राज्य के दिव्यांगों के लिए कई तरह के योजनाओं के लाने पर विचार रखा था. ये सुन वहां मौजूद कई विकलांग खुश हो गए और फिर से वे अपने अच्छे दिन के ख्वाब सजाने लगे. पर ये ख्वाब पूरे कर देने की चाहत सरकार और उनके विभाग की है, ऐसा प्रतीत नहीं होता. ऐसा इसलिए क्योंकि केंद्र सरकार ने दिव्यांग अधिकार विधेयक 2016 को 14 दिसंबर 2016 को ही पास कर दिया था.पर झारखंड के विकलांगों को आज तक इसका लाभ नहीं मिल पाया है. इसका कारण है कि राज्य के समाज कल्याण विभाग आज तक इसकी नियमावली तैयार कर पाने में असमर्थ हैं. क्या वो सच में असमर्थ है, या कल्याण विभाग इनके कल्याण में कोई रूची रखती ही नहीं.

दिव्यांग ट्रस्ट बनाने कि हुई है घोषणा पर बन नहीं पाएगी

मुख्यमंत्री ने दिव्यांग ट्रस्ट बनाकर इनके कल्याण के लिए दो करोड़ देने की बात कही है, साथ ही ये भी कहा है कि कॉर्पोरेट घरानों से सीएसआर के तहत कुछ राशि इस ट्रस्ट को देने का आग्रह भी किया जाएगा. पूरी कहानी यहीं जाकर अटक जाती है कि ट्रस्ट नियमावली तैयार किए बिना गठित की ही नहीं जा सकती. निःशक्तता विभाग के एक अधिकारी के हिसाब से नियमावली सरकारी टेबलों के ही चक्कर काट रही है. ये चक्कर पूरा कब होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती. इस नियमावली को तैयार करने के आदेश 2 साल पहले ही दिए गए थे.

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7,69,980 विक्लांगों को होता फायदा

राज्य सरकार अगर ये नियमावली तैयार कर लेती तो राज्य के 7,69,980 दिव्यांगों को अपने अधिकारों से वंचित नहीं होना पडता. झारखंड देशभर के दिव्यांगो के मामले में 2011 के जनगणना के मुताबिक 12वें पायदान पर है. दिव्यांग विधेयक 2016 के हिसाब से  कुल 21 तरह के दिव्यांगों को ये सुविधा देनी है, पहले इसकी संख्या सिर्फ सात थी.

कितने दिन नहीं कितने साल बोलिएः लुईस मरांडी

समाज कल्याण महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री डॉ लुईस मरांडी मरांडी से इस मामले में जब बात की गई तो उन्होंने कहा कि हम इसके लिए महीनों से नहीं सालों से तैयारी करने में जुटे हुए हैं, पर अब ये अंतिम स्तर पर है. देर क्यों हो रही है, इस संदर्भ में पूछने पर वो कहतीं हैं कि विधेयक के संशोधन में समय लगता है यही कारण है.

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