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सिरसी-पालकोट-सारंडा वाइल्डलाइफ कॉरिडोर से ग्रामीणों को विस्थापित करना सरकार की योजना नहीं : वन विभाग

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News Wing Ranchi, 28 November: सिरसी-पालकोट-सारंडा वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के निर्माण के तहत लातेहार, गुमला, खूंटी, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम जिले के 214 गांवों को चिन्हित किया गया है. इन क्षेत्र के ग्रामीण संभावित विस्थापन के खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं. कई संगठन इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ खड़े हो गये हैं. अखिर क्या है सरकार की योजना. कॉरिडोर के निर्माण से कितने गांव विस्थपित होंगे. इन तमाम मुद्दों प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन प्राणी प्रतिपालक लाल रत्नाकर सिंह(आईएसएफ) ने विभाग की ओर से पक्ष रखते हुए कहा है कि. सरकार की कॉरिडोर के निर्माण के लिए लोगों को विस्थापित करने की कोई योजना नहीं है. न्यूज विंग के संवाददाता ने इस मुद्दे पर उनसे विस्तार से बातचीत की.

सवालः सिरसी-पालकोट-सारंडा वाइल्डलाइफ कॉरिडोर के खिलाफ गांव-गांव में जन आंदोलन खड़ा होता जा रहा है. 214 गांवों को चिन्हित किया गया है, जिन्हें विस्थापित करने की योजना है. इसकी क्या सच्चाई है. 

जवाबः पिछले दिनों से समाचार पत्रों के माध्यम से हम लोग को भी यह सूचना मिल रही है कि कुछ संगठन 214 गांव खाली होने के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है. गांवों को विस्थापित करने का कोई प्रश्न ही नहीं है. यह पूरी तरह काल्पनिक बात है. कहां से यह बात उठी यह हम नहीं जनते. इस संबंध में लोग रैली और सभा करके अपना कीमती समय जाया कर रहे हैं. 214 गांव को विस्थापित करने की सरकार की कोई योजना नहीं है. न ही इस तरह की किसी योजना पर सरकार विचार कर रही है.

सवालः विभाग के एक अधिकारी अनुपम सिंह रावत ने यह योजना बनाई थी, जिसमें 214 गांवों को चिन्हित किया गया था. यह योजना 2014 से 2023 के बीच में पूरी करनी थी. इसकी क्या सच्चाई है.

जवाबः रावत जी का प्लान पलामू की योजना है. जिसमें बांध परियोजना पलामू का मैनेजमेंट इस पर आधारित है, लेकिन गांव को कॉरिडोर के नाम पर विस्थापित करने की किसी भी तरह की योजना वन विभाग की नहीं है.

सवाल: पलामू व्याघ्र परियोजना के लिए 8 गांव को खाली करने का नोटिस दिया गया, सरकार या वन विभाग उस पर क्या कर रही है.

जवाबः विभाग किसी भी परियोजना को दो भागों में बांटती है, जिसमें एक कोर एरिया होता है. कोर एरिया के अंतर्गत वैसे एरिया होते हैं जहां वन जीव विचरण करते हैं. कोर एरिया में जो गांव बसे होते हैं, उन गांव के ग्रामीणों से वन विभाग संवाद करती है अगर वह स्वेच्छा से कोर एरिया से हटने की सहमति देते हैं तब इस पर विचार किया जाता है. इस तरह की परियोजना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी योजना बनी हुई है. उसका अनुपालन वन विभाग करता है. जहां तक पलामू बाघ परियोजना के 8 गांव को विस्थापित करने की बात है, तो ऐसे गांव को विस्थापित करने के पूर्व ग्रामीण अगर स्वयं उन इलाकों से बाहर होने की इच्छुक है तब ही उन्हें मुआवजा का प्रवधान है. ऐसे गांव का पुनर्वास भी किया जाता है. गांव को खाली करने की इच्छा जानने के लिए विभाग द्वारा पत्राचार जरूर किया गया है, लेकिन किसी को दबाव देकर गांव को खाली कराने की बात सही नहीं है. अगर ग्रामीण कहते हैं कि हम विस्थापित नहीं होंगे तो उन पर किसी तरह का दबाव नहीं दिया जा सकता. जो ग्रामीण ऐसे इलाके में रहते हैं, वह स्वेच्छा से वह गांव छोड़ना चाहें तो उसके लिए पैकेज निर्धारित है. इसके तहत प्रति परिवार को दस लाख मुआवजा देने का प्रावधान है. जिसमें केंद्र की हिस्सेदारी 60% और राज्य की हिस्सेदारी 40% होती है. अभी कुंजराम गांव के लोगों ने स्वेच्छा से हटने की सहमति दी है. प्रथम चरण में इस गांव के लोगों को मेदनीनगर के पोलबोल में जमीन दिखाया गया है. गांव वाले भी सहमत हुए हैं. 

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