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सरकार पीट रही नक्सलियों के सफाये का ढिंढोरा, आंकड़ों के मुताबिक लेवी से मालामाल हो रहे नक्सली

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Chandi Dutta Jha

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Ranchi: सूबे में नक्सलियों के खात्मे के नाम पर बार-बार समय सीमा बढ़ाने वाली सरकार नक्सलियों की लेवी वसूली पर रोक लगाने में भी नाकाम साबित हो रही है. पुलिस महकमा भले ही ऑल इज वेल की बात कह कर रिलेक्स हो ले, लेकिन सुदूर क्षेत्रों में नक्सलियों का खौफ अब-तक कायम है. इसकी तस्दीक कोई और नहीं, बल्कि पुलिस के ही आंकड़े कर रहे हैं. शीर्ष माओवादी अरविंद की हार्टअटैक से मौत और हाल में बड़े नक्सलियों की गिरफ्तारी से प्रशासन चैन की सांस ले रहा है. नक्सलियों के इशारे पर लेवी वसूली का काम अबतक चल रहा है. आज भी ज्यादातर जगहों पर नक्सलियों के लेवी के फरमान की अवहेलना करना किसी के बूते में नहीं है. इस मामले में सबसे मुख्य बात यह है कि लेवी देने वाले भी अपने जान-माल के बचाव के लिए कभी भी सामने आकर इसका विरोध नहीं करते हैं. शायद ही कभी नक्सालियों के द्वारा लेवी मांगने की शिकायत दर्ज होती है. लेवी को लेकर हत्या होने पर या नक्सलियों द्वारा धमकी देने पर ही इस बात का खुलासा होता है कि लेवी मांगी गयी थी. नक्सालियों की आमदनी का मुख्य स्रोत लेवी ही है. और लेवी देने वालों में छोटे व्यवसायियों, ठेकेदारों से लेकर उस स्तर के उद्योपति भी शामिल रहे हैं, जिन्हें झारखंड में काम कर के निकल लेना था. एक बार तो आरोप यहां तक लगा था कि मधु कोड़ा सरकार तक ने नक्समलियों को लेवी दी थी.

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ग्राफिक तस्वीर

खतरनाक घटनाओं को अंजाम देते रहे हैं नक्सली

लेवी के कारण नक्सलियों ने कई खतरनाक घटनाओं को अंजाम दिया है. झारखंड पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार 2011 में नक्सलियों ने लेवी न देने पर या लेवी के लिए भय का माहौल बनाने के लिए 145 घटनाओं को अंजाम दिया. इसमें हत्या , आगजनी जैसी घटनाएं ज्यादा थीं. वाहन जलाने से लेकर ठेकेदारों, मजदूरों के साथ मारपीट और प्रतिरोध करने वालों की हत्या प्रमुख थीं. बेशक हाल की घटनाओं में नक्सली वारदातों में कुछ कमी आयी है, पर लेवी वसूली पर नक्सलियों की पकड़ कभी भी कम नहीं हुई है यही कारण है कि 2017 में अक्टूबर तक 87 नक्सली वारदातें सिर्फ लेवी वसूली को लेकर ही हुई हैं. पुलिस के अनुसार 2001 से लेकर 2006 तक लेवी वसूली को लेकर नक्सली वारदातों का आंकड़ा 50 से कम है.

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नक्सली वारदात के आंकड़े

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2001 में 27, 2002 में 27,  2003 में 16,  2004 में 19, 2005 में 17, और 2006 में एकाएक बढकर 47 घटनाओं तक पहुंचना ये दर्शाता है कि पहले लेवी वसूली को लेकर नक्सली घटनाएं कम हो रहीं थी, पर इन मामलों के जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं था कि, 2006 से पहले लेवी वसूली नहीं हो रही थी. हकीकत में तो 2006 तक नक्सलियों द्वारा लेवी वसूली का काम और भी बिना किसी प्रतिरोध के होता था, तब इसके खिलाफ प्रतिरोध न के बराबर था इस कारण नक्सिलियों ने लेवी के लिए कम घटनाओं को अंजाम दिया.

2006 से बढ़ी है लेवी वसूली की घटना

2006 के बाद लेवी वसूली पर नक्सलियों ने ज्यादा ध्यान केंद्रित किया और हर साल 50 से ज्यादा घटनाओं को अंजाम दिया. और वर्ष 2007 में 71,  2008 में 88, 2009 में 52, 2010 में 132, 2011 में 145, 2012 में 120, 2013 में 117, 2014 में 77, 2015 में 96, 2016 में 91 और वर्ष 2017 में 87 घटनाओं को नक्सलियों ने अंजाम दिया.

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पुलिस की सफाई ये है कि ये संख्या केवल लेवी के लिए की गई घटनाओं की है न कि किसी और नक्सिली वारदातों की. स्पयष्ट है कि नक्सली खूनखराबा करने के बजाय भयादोहन कर अपना वर्चस्वक कायम रखे हुए हैं, रेवेन्यू के लिए लेवी वसूली पर ज्यादा केंद्रित रहते हैं. यही कारण है कि नक्सली घटनाएं भले हाल के सालों में कम हुई हों, पर लेवी वसूली अनवरत चलता रहा है, नक्सली मालामाल हो रहे हैं. यहां तक कि नोटबंदी के दौर में उन्हें अगर कुछ नुकसान हुआ भी है तो लेवी वसूली से उसकी भरपाई भी कर रहे हैं.

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