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सत्र खत्म होने के करीब, विभाग ने स्कूल कोष में दो महीने पहले भेजे पैसे, फिर भी छात्रों को नहीं मिली किताबें

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Kumar Gaurav/News Wing

Ranchi , 04 December: झारखंड में सरकारी स्कूलों की शिक्षा अब भी भगवान भरोसे ही है. शिक्षक आए दिन हड़ताल में व्यस्त रहतें हैं और शिक्षा विभाग के अधिकारी गिरते शिक्षा स्तर का जिम्मा लचर व्यवस्था को देकर बचकर निकल जाते हैं. पढाई कैसे हो रही है इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है. राज्य के अधिकतर स्कूलों में बिना किताब के ही पढाई हो रही है. सत्र समाप्त होने को है और किताब बच्चों के पहुंच से अब भी दूर ही है. ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पढाई का स्तर क्या होगा और इनके भविष्य के नींव से कैसे खेला जा रहा है.

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क्या है मामला

झारखंड में सरकार हरेक सरकारी स्कूलों के बच्चों को ड्रेस और किताब मुहैया करवाती है. इसके लिए विभाग हर स्कूल के स्कूल कोष में पैसे भेज देती है. ड्रेस के पैसे तो बच्चों को देकर खरीदने के लिए बोल दिया जाता है पर किताब स्कूल प्रबंधन ही मुहैया कराती है. मामला ये है कि मार्च के पहले सप्ताह में मैट्रिक और इंटर की परीक्षाएं होनी है. इसके बावजूद अब तक किताबें बांटी नहीं गई. इसके पड़ताल में पता चला है कि विभाग की ओर से स्कूल कोष में पैसे दो महीने पहले भेजे गए हैं पर किताब बाजार में उपलब्ध नहीं होने के कारण किताबों का वितरण सही से नहीं हो पा रहा है. किताबें एनसीईआरटी की ही बांटनी है. इससे राज्य के हर जिले के स्कूलों में पढाई प्रभावित हो रही है.

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लगातार गिर रहा है रिजल्ट का प्रतिशत

झारखंड में मैट्रिक और इंटर की परीक्षाओं के रिजल्ट का प्रतिशत लगातार गिर रहा है. हर बार रिजल्ट का प्रतिशत पचास से कम ही रहता है. ऐसे में हमारे बच्चे कैसे अन्य राज्यों और प्राईवेट स्कूलों के बच्चों से मुकाबला कर पाएंगें. जबकि हमारे स्कूलों के शिक्षकों कि नियुक्ति प्रतियोगिताओं के माध्यम से होती है. ऐसे में विभाग की चूक और बच्चों को किताब मुहैया नहीं हो पाने को ही बड़ी वजह समझा जा सकता है. अगर किताबें सही समय पर उपलब्ध नहीं कराई जाएंगी तो पढाई करा पाना और रिजल्ट में सुधार की कोई गुंजाईश नहीं रह जाती.

विकल्प निकालेंगें और अगले सत्र से एडवांस में मंगा ली जाएंगी किताबें

इस मामले में जब रांची जिला शिक्षा पदाधिकारी से संपर्क किया गया तो उनका कहना था कि हमें एनसीईआरटी की किताबें ही बांटनी हैं और बाजार में किताबें उपलब्ध नहीं होने के कारण नहीं बांटी जा सकी हैं. धीरे-धीरे सभी स्कूलों में उपलब्ध करा दी जा रही है. साथ ही कहा कि कई बच्चे अन्य पब्लिकेशन की पुस्तकों से पढाई कर रहे हैं. सवाल ये उठता है की सरकारी स्कूलों में अधिकतर गरीब बच्चे ही पढाई करते हैं तो क्या वे अन्य पब्लिकेशन की किताबें खरीद पाने में समर्थ हैं. अगर हां तो फिर किताबें बांटने का क्या फायदा. इस एवज में पदाधिकारी कहते हैं कि ऐसा है तो पैसा बांटने पर भी विचार किया जाएगा. और अगले सत्र से किताबें एंडवांस में ही मंगा ली जाएगी. मालूम हो कि इस बार  किताबों के लिए पैसे सत्र चालू होने के सात महिनों के बाद स्कूल को ही राशि दी गई है.

स्कूलों के प्राचार्यों के हैं अपने तर्क

इस मामले में जब रांची के जिला स्कूल के प्राचार्य से बात की गई तो वे कहते हैं कि राशि बलिकाओं के स्कूलों को दी जाती हैं और हमें सीधा किताब ही मुहैया करा दिया जाता है. और हमने सही समय पर किताबें बांट दी हैं. पर डीईओ का कहना है कि हम सभी स्कूलों को राशि ही आवांटित करते हैं. ऐसे में जब विभाग ने ही अभी से दो महीने पहले पैसे दिए हैं तो वहां सही समय पर किताबें कैसे बांट दी गईं. क्या वे इस मामले से बचने के लिए ऐसा जवाब दे रहे हैं. वहीं मारवाडी प्लस टू स्कूल की प्राचार्य का कहना है कि आज ही किताब मंगवाई गई है और हम कल से बांटेगें.

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