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संसाधनों की घोर कमी से जूझ रहा झारखंड का मानवाधिकार आयोग, 1800 केस पेंडिंग

Mrityunjay  Srivastava

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Ranchi, 10 October : झारखंड का मानवाधिकार आयोग संसाधनों के आभाव का दंश झेल रहा है. आयोग में कर्मचारियों और अधिकारियों का घोर आभाव है. आयोग बड़ी मुश्किल से अपना काम कर रहा है. संसाधनों के आभाव की वजह से बैकलॉग केस की संख्या 1800 को पार कर गयी है. झारखंड निर्माण के 11 वर्षों के बाद यानि 17 जनवरी 2011 को मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया था. राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश नारायण राय को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था. आयोग गठन के साढ़े छह वर्ष के बाद भी राज्य मानवाधिकार आयोग कमियों से जूझ ही रहा है. आयोग के पास अपना भवन तक नहीं है. एचइसी के किराये के भवन में तंग माहौल में मानवाधिकार आयोग चल रहा है. अध्यक्ष नारायण राय जनवरी में रिटायर हो गये थे. राज्य मानवाधिकार आयोग करीब आठ महीने तक अध्यक्ष विहीन रहा था. बीते पांच सितंबर से मणीपुर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश आरआर प्रसाद मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर पदस्थापित हैं. संसाधनों के घोर आभाव के बाद भी आयोग बेहतर सेवा देने का प्रयास कर रहा है.

कर्मचारियों और अधिकारियों की घोर कमी

आयोग में अधिकारियों और कर्मचारियों की भी घोर कमी है. यहां अध्यक्ष के पीए का पद प्रभार में चल रहा है. मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पीए भगवान दास गृह विभाग में अपर सचिव के रूप में पदस्थापित है. वो आयोग में समय नहीं दे पाते हैं. सचिव और अवर सचिव का पद भी खाली है. आयोग में पीए के पांच पद के अलावा आदेशपाल का भी पद रिक्त है.

डेढ़ वर्षों से आइजी मानवाधिकार का पद भी रिक्त

पिछले डेढ़ वर्षों से आइजी मानवाधिकार का पद भी खाली पड़ा है. आइजी के नहीं रहने से जांच का काम काफी प्रभावित हो रहा है. आयोग के पास अपनी कोई स्वतंत्र एजेंसी नहीं होने की वजह से जांच के काम में बाधा आ रही है. पुलिस की जांच को पूरी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है. आयोग को पुलिस के द्वारा गलत रिर्पोटिंग भी मिल सकती है.

संसाधनों के आभाव में 1800 केस पेंडिंग

संसाधन के आभाव में मानवाधिकार हनन के कुल 1800 केश पेंडिंग है. त्वरित गति से मामलों का निष्पादन नहीं हो पा रहा है. बैकलॉग बढ़ता ही जा रहा है. आयोग के अध्यक्ष आरआर प्रसाद ने बताया कि मानव संसाधनों की कमी से मामलों के निष्पादन में कठिनाई आ रही है. मानवाधिकार के हनन मामले में लोगों को जल्द न्याय मिले इसके लिए रोजाना 20-20 मामलों का निष्पादन किया जा रहा है. उन्होंने साफ कहा कि आयोग को इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं मिलेगा तो आयोग हैंडीकैप्ट हो जायेगा. यह भी कहा कि आयोग का काम मुश्किल में चल रहा है. उन्होंने बताया कि लोग न्याय की आस में आयोग का दरवाजा खटखटाते हैं, लेकिन पीडित को त्वरित गति से न्याय नहीं मिल पा रहा है. आयोग के अध्यक्ष आरआर प्रसाद ने यह भी बताया कि अपनी स्वतंत्र जांच एजेंसी नहीं होने की वजह से पीड़ित को सही रूप में न्याय नहीं मिल पा रहा है. पुलिस के द्वारा गलत रिर्पोटिंग भी की जा सकती है. उन्होंने उम्मीद जतायी कि जल्द ही सरकार आयोग की समस्या का समाधान कर देगी.

थानों में दर्ज नहीं होती एफआइआर

मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस आरआर प्रसाद ने कहा कि थानों के प्रभारी पीड़ितों की एफआइआर दर्ज नहीं करते. अगर मुश्किल से एफआइआर दर्ज हो भी गया तो केस एकतरफा कर दिया जाता है. ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों को परेशानी होती है. उनके पास आने वाले ज्यादातर मामले एफआइआर दर्ज नहीं होने के ही आते है.

जहरीली शराब मामले में लिया था सुओ मोटो

राज्य मानवाधिकार आयोग ने रांची में हुई जहरीली शराब कांड मामले में सुओ मोटो लिया था. आयोग के अध्यक्ष जस्टिस आरआर प्रसाद ने सरकार को इस मामले में त्वरित कार्रवाई का आदेश दिया था और भविष्य में ऐसी घटना ना हो यह सुनिश्चित करने को कहा था. अध्यक्ष ने उत्पाद विभाग के सचिव को बुलाकर इस मामले में कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया था. आयोग के इस रूख के बाद विभाग ने तत्काल कार्रवाई कर बड़ी संख्या में नकली शराब के साथ-साथ इस धंधे में लिप्त सरगना सहित कई लोगों को सलाखों के पीछे भेजा था.

आयोग की वेबसाइट हैक होने के बाद इसे बंद कर दिया गया

राज्य मानवाधिकार आयोग की आधिकारिक वेबसाइट को बीते जुलाई माह में हैक कर लिया था. हालांकि आयोग की वेबसाइट को तीन बार हैक किया गया. किसने वेबसाइट को हैक किया, हैकर्स का मकसद क्या था, झारखंड पुलिस की साइबर विंग आजतक इसका पता नहीं लगा पायी. विभाग ने हैकर्स से तंग आकर वेवसाइट को ही बंद कर दिया. अब वैसे लोगों को दिक्कतें आ रही हैं, जो आयोग के पास न्याय की उम्मीद में आते है. वेबसाइट बंद हो जाने से दूर दराज के ग्रामीणों को लिखित शिकायत भेजने में दिक्कतें आती है, जिसकी वजह से उनको आयोग के पास चलकर आना पड़ता है.

राज्य में मानवाधिकार उल्लंधन की कई घटनायें घटी

राज्य में मानवाधिकार हनन की कई घटनायें घटित हो चुकी है. जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल और रांची के रिम्स में प्रबंधन और डॉक्टरों की लापरवाही से 200 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी. राजधानी रांची में जहरीली शराब से 19 लोगों की मौत हुई थी. रामगढ़ और गिरिडीह में गौ तस्करी का आरोप लगाकर मॉब लिंचिंग की घटना हुई. इसके अलावा बड़कागांव, खुंटी और रामगढ में आंदोलन कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग में कई लोगों की जानें गयी. इन सब घटनाओं में आयोग ने सरकार से जवाब तलब किया था.

सरकार ने मानवाधिकार आयोग को बिहार जैसा भी सुविधा नहीं दिया

सरकार ने बड़े तामझाम के साथ 17 जनवरी 2011 को मानवाधिकार आयोग का गठन किया था. आयोग के गठन के समय सभी संसाधनों से लैस करने की बात भी कही गयी थी. जबकि बिहार में मानवाधिकार आयोग के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है. बिहार मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बिलाल नाजकी ने कहा था कि मानवाधिकार के मामले में बिहार की स्थिति दूसरों राज्यों से बेहतर है. राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित मानवाधिकार आयोग की बैठक में बिहार का कार्य सर्वश्रेष्ठ माना गया था. इसका कारण बिहार सरकार से आयोग को पूर्ण सहयोग मिला था. आयोग की अनुशंसा पर बिहार सरकार त्वरित गति से काम करती है. लेकिन झारखंड सरकार आयोग को ओर ध्यान ही नहीं दे रही है. जाहिर है ऐसे में मानवाधिकार हनन पर कार्रवाई बेहतर तरीके से कैसे हो सकेगी.

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