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विरोध प्रदर्शन के दौरान जान-माल की क्षति के लिये जिम्मेदारी तय की जाये : सुप्रीम कोर्ट

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New Delhi, 28 November : आन्दोलनों के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को होने वाले नुकसान और लोगों की जान जाने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुये उच्चतम न्यायालय ने आज केन्द्र से कहा कि इस तरह की गुण्डागर्दी की जिम्मेदारी निर्धारित करने और ऐसे हिंसक प्रदर्शनों के पीडितों को मुआवजा देने के लिये प्रत्येक राज्य और केन्द्र शासित प्रदेशों में अदालतों का सृजन किया जाये. अटार्नी जनरल ने हाल ही में पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग में हुये आन्दोलन का जिक्र करते हुये कहा कि स्थानीय जनता के लिये इससे काफी मुश्किल हो गयी थी क्योंकि खाद्य सामग्री और पेट्रोल की आपूर्ति बाधित हो गयी थी तथा केन्द्र को ट्रकों को कलिंपोंग में प्रवेश दिलवाने के लिये अर्द्धसैनिक बलों की दस कंपनियां भेजनी पडी थीं.

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शीर्ष अदालत ने केन्द्र को सुझाव दिया
वकील विल्स मैथ्यू ने न्यायालय से अनुरोध किया कि उसे याचिकाकर्ता कोशी जैकब को उनकी परेशानियों के लिये कुछ न कुछ मुआवजा देने का निर्देश देना चाहिए. शीर्ष अदालत ने केन्द्र को सुझाव दिया कि संबंधित उच्च न्यायालयों से परामर्श करके एक या इससे अधिक जिला न्यायाधीशों को ऐसे तत्वों पर मुकदमा चलाने और ऐसी अराजकता के लिये जिम्मेदार लोगों के दीवानी दायित्व तय करने की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए. न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति उदय यू ललित की पीठ ने ऐसे संगठनों अथवा राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की हिमायत की है जिनके सदस्य सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने में लिप्त होते हैं. पीठ ने कहा कि यद्यपि 2009 में शीर्ष अदालत ने दिशा निर्देश बनाये हैं जिनमे ऐसे आन्दोलनों की वीडियोग्राफी करना भी शामिल है परंतु इससे पीडित व्यक्तियों को नुकसान की भरपाई कराने के लिये कोई व्यवस्था नहीं है.

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आन्दोलनों की परिणति अक्सर जान-माल के नुकसान में होती है
पीठ ने कहा, ‘‘ये आन्दोलन, जिनकी परिणति जान माल के नुकसान में होती है, अक्सर होते रहते हैं. यदि उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय को इनसे निबटना होगा तो यह बहुत ही मुश्किल हो जायेगा. इसके लिये कोई अन्य मंच होना चाहिए जिसके पास जाकर लोग कानूने के अनुसार राहत प्राप्त कर सकें.’’ पीठ ने यहआदेश वकील कोशी जैकब की याचिका पर दिया जिसमें ऐसे आन्दोलनों के दौरान प्रशासन द्वारा अपनायी जाने वाली प्रक्रिया के बारे में न्यायलाय के दिशा निर्देशों पर अमल करने और उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है. न्यायालय ने कहा कि यद्यपि संविधान ने लोगों को स्वतंत्र रूप से एकत्र होने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार प्रदान किया है परंतु किसी को भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या हिंसा में संलिप्त होने का अधिकार नहीं दिया गया है जिसमें लोग अपनी जान गंवा दें.
अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने इस सुझाव से सहमति व्यक्त की और कहा कि सरकार ने विधि एवं न्याय मंत्रालय के परामर्श से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से रोकने के कानून में संशोधन के लिये कदम उठाये हैं. उन्होंने कहा कि इस संबंध में विधेयक का मसौदा तैयार हो गया है और इसे गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया गया है. इसमे जनता और इसमें दिलचस्पी रखने वाले लोगों के विचार आमंत्रित किये गये हैं.

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