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रोजी-रोटी अधिकार अभियान ने आधार को लेकर रखा अपना पक्ष, कहा – अधिकारों पर प्रहार है आधार

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Ranchi : 21 मार्च 2018 को सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में आधार के पक्ष में अपने दावे देने शुरू किए. रोज़ी रोटी अधिकार अभियान निराश है कि सरकार एक बार फिर जन योजनाओं में आधार के फायदों के खारिज किए गए दावों को पेश कर रही है. अटर्नी जेनरल का यह दावा है कि आधार से जन योजनाओं के सही लाभार्थियों को चिन्हित किया जा सकता है. हकीकत ये है कि इन योजनाओं की पात्रताएं गरीबी, उम्र, लिंग, जाति व वैवाहिक स्थिति जैसे निर्धारकों पर आधारित है. आधार लोगों को केवल एक संख्या प्रदान करता है, जिससे किसी एक प्रकार के लोगों या परिवारों को चिन्हित करना संभव नहीं है.

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आधार से लोगो का सशक्तीकरण नहीं हुआ है !

आधार से लोगों के सशक्तीकरण पर विपरीत असर हुआ है – लोग अपने अधिकारों से वंचित हो रहे हैं और उनको कई प्रकार की कठिनाइयां सहनी पड़ रही है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता लागू होने के बाद राजस्थान के 33 लाख परिवार राशन दुकान से अनाज नहीं ले पाए. इसी प्रकार, झारखंड में प्रतिमाह 25 लाख परिवार राशन के अधिकार से वंचित हो रहे हैं. दिल्ली की जन वितरण प्रणाली में आधार-आधारित बायोमिट्रिक सत्यापन के कारण जनवरी 2018 में लगभग एक चौथाई राशन कार्डधारी अनाज नहीं ले पाए. जुलाई 2017 से जनवरी 2018 के बीच आधार की वजह से योजनाओं से वंचित होने के कारण तीन राज्यों के बीच कम से कम 10 लोगों की भूख से मौत हुई है.

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आधार से भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है

जन योजनाओं में आधार की अनिवार्यता के कारण कई नए प्रकार के भ्रष्टाचार उत्पन्न हुए हैं. कई लोगों को आधार में नामांकित होने, उसमें अपनी जानकारी बदलवाने, उसे सुविधाओं के साथ जोड़ने जैसी प्रक्रियाओं के लिए बिचौलियों व अन्य लोगों को घूस देनी पड़ती है. आधार से बस यह रुक सकता है कि एक व्यक्ति कोई सुविधा पाने के लिए कोई अन्य व्यक्ति होने का दावा करे. परन्तु, योजनाओं में अधिकांश चोरी लाभार्थियों को उनके अधिकार की तुलना कम मात्रा और गुणवत्ता की सुविधा देने में होती है.

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आधार से सालाना 57,000 करोड़ रुपये की बचत नहीं हो रही है

आधार से बचत के दावे को बार बार खारिज किया गया है. इसके विश्लेषण से पता चलता है कि सरकार इस बचत के कारण या इसकी गणना की प्रणाली नहीं बता रही है. इस आंकड़े (11 बिलियन डॉलर) का मूल स्रोत विश्व बैंक की 2016 की एक रिपोर्ट है. 57,000 करोड़ रुपये असल में भारत सरकार का ”मुख्य नकद हस्तांतरण योजनाओं” पर सालाना खर्च का आंकडा है. जब इसके बारे में विश्व बैंक को टोका गया, तो उसने जन कल्याणकारी योजनाओं पर केंद्र सरकार के सालाना खर्च को बढ़ा-चढ़ाकर 70-100 बिलियन डॉलर बताया और दो योजनाओं में आधार के कारण हुई कथित बचत की दर के अनुसार अनुमान लगाया कि आधार से सालाना कुल 8-14 बिलियन डॉलर की बचत हो सकती है.

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क्या आधार अधिकारों पर प्रहार है ?

अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि जन योजनाओं में आधार की अनिवार्यता जीने के अधिकार पर एक प्रहार है. रोज़ी रोटी अधिकार अभियान सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह करता है कि सामाजिक और आर्थिक अधिकारों में आधार की अनिवार्यता तुरंत समाप्त हो.

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