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राज्यसभा चुनाव : यूपी में बिगड़ सकता है बीजेपी का गणित, अखिलेश की डिनर पार्टी में जाकर चाचा शिवपाल ने चौकाया

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यूपी में फूलपुर और गोरखपुर सीट पर जीत के बाद जहां समाजवादी पार्टी की बाछें खिली हुई हैं, वहीं बसपा की उम्मीदों को भी एक नयी ताकत मिली है. मगर अचानक साथ आए बुआ-भतीजे का राज्यसभा चुनाव में  समीकरण बिगाड़ने को लेकर बीजेपी भी पूरी ताकत लगा रही है. वहीं विरोधियों के खेमे में कुछ ऐसा हो गया, जिससे बीजेपी का गणित बिगड़ सकता है.

Lucknow : यूपी में राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा आयोजित रात्रिभोज में एक अरसे से नाराज चल रहे चाचा शिवपाल यादव और निर्दलीय विधायक राजा भैया के शामिल होने से अमित शाह का राज्यसभा वाला गणित थोड़ा डगमगाता नजर आ रहा है. चूंकि अपने नौवें उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए बीजेपी जिन विधायकों पर डोरे डाल रही थी, वो अब सपा से हाथ मिलाते हुए नजर आ रहे हैं. दरअसल, 21 मार्च, 2018 को अखिलेश यादव ने राज्यसभा (23 मार्च, 2018) चुनाव से पहले पार्टी के सभी विधायकों को रात्रिभोज पर बुलाया था. विरोधी खेमे में माना जा रहा था कि नाराजगी के चलते शिवपाल इसमें शामिल नहीं होंगे, लेकिन आखिरी समय में शिवपाल और निर्दलीय विधायक राजा भैया के शामिल होने से भाजपा की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं.

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बीजेपी के नौवें उम्मीदवार की राह नहीं होगी आसान

यूपी में 403 विधानसभा सीटें हैं. इसमें 324 सीटें एनडीए के पास बताई जाती हैं. विधायकों के संख्या बल पर भाजपा अपने आठ उम्मीदवारों को आराम से राज्यसभा भेज सकती है. हालांकि, इसके बाद भी भाजपा के 28 विधायक बच जाते हैं. इस हिसाब से देखें तो अपने नौवें उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए पार्टी को 9 और विधायकों को अपनी ओर लाना होगा. यूपी में एक सांसद के चुने जाने के लिए 37 वोटों की जरूरत होगी. अगर भाजपा को सपा के सात बागी विधायकों का साथ मिल जाता है तो उसके वोटों की संख्या 35 हो जाएगी, जो बहुमत से महज दो वोट दूर है. निषाद पार्टी के एकमात्र विधायक विजय मित्रा ने भी भाजपा का साथ देने का एलान किया था.

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शिवपाल के कारण बिगड़ा शाह का गणित ?

अगर सब कुछ अमित शाह द्वारा बैठाए गए आंकड़ों के मुताबिक होता तो बीजेपी को सिर्फ एक वोट की जरूरत रह जाती. लेकिन अंतिम समय में अखिलेश यादव को चाचा शिवपाल और राजा भैया दोनों का प्यार मिल गया और दोनों ने रात्रिभोज में शामिल होकर बीजेपी की उम्मीद का जायका बिगाड़ दिया है. हालांकि जंग की तरह सियासत में भी सबकुछ जायज ही होता है. चुनाव के आखिरी वक्त तक समीकरण बनने-बिगड़ने का खेल चलता रहता है.

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