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ये पप्पू हैं कमाल के, 1629 आरटीआई आवेदनों से उड़ा रखी है विभागों की नींद

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Kumar Gaurav

Ranchi/Giridih, 25 November : गुजरात चुनाव में भले ही पप्पू नाम के इस्तेमाल पर बैन कर दिया गया हो. लेकिन झारखंड में इस नाम के एक शख्स ने सरकार के हर विभाग की नींद उड़ा रखी है. गिरिडीह जिले के देवरी गोडोंडीह निवासी  पवन कुमार राय उर्फ पप्पू जिन्हें  पूरा गिरिडीह जिला पप्पू आरटीआई के नाम से जानता है. ये राईट टू इंफॉरमेशन को सरकार का जनता को दिया सबसे बडा तोहफा मानते हैं. अब ये पूरे गिरिडीह जिले में आरटीआई का एक पर्याय बन गए हैं.

1629 आरटीआई  आवेदनों के जरिए मांगा है जवाब

इस पप्पू साहब ने राज्य और जिले के सभी सरकारी विभागों से कुल 1629 आरटीआई आवेदनों के जरीए जवाब मांगा है. जिनमें से कुल 930 आवेदनों के जवाब सरकार और विभाग ने दिए हैं. पप्पू जी का कहना है कि जितने आवेदनों का जवाब मिला है. उसमें से करीब 750 पर कार्रवाई भी हो चुकी है और कितने लोगों को जुर्माना भी लगाया जा चुका है और जैसा काम होना चाहिए था वो हमारे आरटीआई करने के बाद से हो गया है.

मिल चुका है पैसे का प्रलोभन और जान से मारने की धमकी

पप्पू आरटीआई से जब पूछा गया कि इन सब के जरिए आपको क्या मिला. तो इसपर उनका चौंका देने वाला जवाब था. वे कहते हैं कि अगर आप समाज और इसके सुधार के लिए काम करना चाहेंगें तो आपको जान से मार देने की धमकी भी दी जाएगी और अगर आप डर गए तो समझों की आप अपने जीने और होने का मकसद गवां देंगे. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुझे कई बार जान से मारने की धमकी भी दी जा चुकी है. साथ ही पैसों का प्रलोभन भी दिया गया.

2010 में पहली बार किया था आरटीआई

2005 में आरटीआई अधिनियम आ जाने के बाद वो पांच साल इस चीज का कोई लाभ नहीं ले सके थे. इन्होंने 2010 में पहली बार आरटीआई का प्रयोग किया. इस आवेदन के जरिए उन्होंने विधवा पेंशन पर जवाब मांगा था. उसके बाद से इसमें व्यापक स्तर पर बदलाव हुआ है.

बना लिया है अपने जीने का ध्येय

पप्पू कुमार राय का कहना है की जब तक भारत में आरटीआई जैसा अधिनियम है, तब तक इसका उपयोग करके लोगेां की सेवा करता रहूंगा. अब जब भी इनको जिले और राज्य में कोई भी गड़बड़ी दिखती है तो ये इसमें बिना देर किए या तो उसमें सुधार के लिए कहते हैं और नहीं मानने पर आरटीआई का सहारा लेते हैं. अगर इनके दवारा किए गए आरटीआई के जरीए कोई सुधार हो जाता है तो ये खुद पर गौरवांन्वित होते हैं.

सिमट गई है दलालों और बुद्धिजीवियों के बीच

पप्पू कहते हैं कि लोगों में अब कंप्लेन करने की ज्यादा आदत हो गई है. लोग कई मामलों में पड़ना ही नहीं चाहते. आरटीआई को लेकर युवाओं में कोई उत्सुकता नहीं है. ये सिर्फ बुद्धिजीवियों और दलालों के बीच सिमट कर रह गया है.जिसका लगभग लोग गलत फायदा उठाते हैं और दलाली ज्यादा हो रही है. बहुत कम ही लोग इसे समाज में बदलाव लाने के लिए काम कर रहे हैं.

आरटीआई लिखने का भी देते हैं प्रशिक्षण

सरकारी कामों के पारदर्शिता के लिए बनाया गया ये अधिनियम चंद लोगों तक सिमट न जाए. इसके लिए वे आरटीआई कार्यकर्ताओं की एक फौज तैयार करना चाहते हैं. ताकि लोगों का काम उनतक पहुंचे और किसी तरह का गबन न किया जाए. इसलिए वे गांव-गांव जाकर भी लोगों को प्रशिक्षण देते हैं. पप्पू राय कहते हैं कि वे आने वाले सालों में राज्य के हरेक जिलों में कम से कम 50 लोगों को प्रशिक्षित कर देना चाहते हैं.

 

 

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