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मिशनरीज को बढ़ावा देने के लिए अंग्रेजों ने जबरन हड़पी थी आदिवासियों की जमीन : महावीर विश्वकर्मा

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खतियानी रैयती जमीन को खास महल बनाने के लिए था अलग डिपार्टमेंट

Ranchi/Hazaribagh : हजारीबाग के पूर्व सांसद व भाजपा नेता महावीर लाल विश्‍वकर्ता ने एक पुस्‍तक के हवाले से कहा है कि आजादी के पहले अंग्रेजों ने ईसाई मिशनरीज को बढ़ावा देने के लिए गरीब आदिवासियों की जमीनों को जबरन हड़प लिया. इसके लिए अंग्रेजों का एक अलग विभाग बना हुआ था, जिसका काम ही था खतियानी रैयती जमीन को आदिवासियों से हड़प कर खास महल भूमि घोषित करना था. इसके पहले खास महल भूमि जैसा कोई शब्‍द अस्तित्‍व में नहीं था. महावीर विश्‍वकर्मा ने बताया कि अधिवक्‍ता अरूण प्रकाश पुरियार के द्वारा लिखित पुस्‍तक भारतीय मुसलमानों की कहानी मेरी जुबानी के पेज नंबर 56 से 58 के शीर्षक आजादी के बाद भी अधिग्रहित भूमि की आजादी नहीं हुई में वर्णित तथ्‍यों से प्रभावित होकर एवं अपने व्‍यक्तिगत सर्वे में पाये गये तथ्‍यों के आधार पर ऐसा माना है.

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लोक प्रयोजन के नाम पर छीने गये जमीन

महावीर लाल विश्‍वकर्मा ने इस पुस्‍तक पर सहमति जताते हुए कहा है कि अंग्रेजी सरकार के दौरान झारखंड के गरीब रैयतदारों की भूमि को दो तरीके से उनसे हड़पी गई थी. पहला तरीका था- भू-अधिग्रहण अधिनियम 1894 बनाकर अधिग्रहण कानून के नाम पर और दूसरा तरीका था, बगैर किसी भी कानून के मात्र अपने मनमानी के आधार पर. पहला तरीका भी मात्र कानून के नाम पर खानापूर्ति था. उन्‍होंने बताया कि इस तरीके के अन्‍तर्गत अंग्रेजों ने ईसाई मिशनरी को बढ़ावा देने के लिए उनके चर्च, हॉलीक्रास, स्‍कूल, अस्‍पताल के भवन निर्माण और उनसे संबंधित लोगों के आवास इत्‍यादि भवन निर्माण को लोक प्रयोजन का नाम देते हुए ये अंग्रेज सरकारी दफ्तरों में बैठ कर यहां के गरीब लोगों के खतियानी रैयती भूमि को अधिग्रहण की मात्र प्रक्रिया चलाकर इनसे छिन ली.

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भूमि अधिग्रहण के पूर्व न गजट प्रकाशन हुआ और न किसी को मुआवजा दिया

विश्‍वकर्मा ने बताया कि भूमि अधिग्रहण की मात्र प्रक्रिया के पूर्व ना ही अधिग्रहण संबंधित भूमि का गजटीय प्रकाशन हुआ और न ही उन्‍हें एक भी रूपया मुआवजा के तौर पर भुगतान किया गया. यहां के गरीब लोगों की रैयती भूमि इनसे इस तरह छिन कर उन ईसाई मिशनरी संस्‍थानों को भी पूर्ण रूपेण इसे प्रदान नहीं की गई, बल्कि अपने सरकारी अहाते में लेकर और उसे स्‍वमेव सरकारी खास महल भूमि घोषित करते हुए मात्र 15 वर्ष और बाद के समय में 30 वर्ष के पट्टे के आधार पर उन संस्‍थानों को सशर्त प्रदान कर दिया गया. उन पट्टों की शर्त यह थी कि वह खास काम जिस हेतू उन संस्‍थाओं को पट्टा प्रदान किया है, यदि एक खास अवधि के अन्‍तर्गत वह पूरा नहीं कर लेते हैं तो वह पट्टा ही रद्द हो जायेगा. उन संस्‍थानों ने पट्टा के शर्त के अनुसार वह काम कर लिया तो ठीक अन्‍यथा पट्टा रद्द करते हुए उक्‍त भूमि को पूर्वग्रहण कर लिया और इस तरह इस प्रकार की भूमि पूर्वत: सरकारी खास महल भूमि के रूप में अंग्रेजी सरकार के अधीन चली गई.

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सरकारी निर्देश के बाद भी वापस नहीं हुए आदिवासियों की जमीन

महावीर लाल विश्‍वकर्मा ने बताया कि इस इस संदर्भ में स्‍मरण रहे, स. 123 डीएलए नीति 1/78 दिनांका 12 जनवरी 1979 को सरकार के विशेष सचिव, अरूप कुमार बसु ने सभी समाहर्ता और सभी उपायुक्‍त को एक राजकीय सर्कुलर भी निर्गत किया था, जिसका विषय था भू-अर्जन अधिनियम 1894 के अन्‍तर्गत अर्जित भूमि की अधिसूचित प्रयोजन के लिए आश्‍वयकता ने होने पर वापसी जिसके अंतर्गत वैसी भूमि का पुनर्ग्रहण कर सरकारी खास महल भूमि में रखा जाना गलत था. उस प्रकार की भूमि भूतपूर्व भू-स्‍वामियों वापस कर कर देने का निर्देश उस सरर्कुलर के अन्‍तर्गत स्‍पष्‍ट रूप से दिया गया था. बावजूद इसके सरकार ने आज की तिथि तक वैसी भूमि को कभी वापस नहीं की है, जो बहुत ही दुर्भाग्‍यपूर्ण है.

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आदिवासी जमीन पर ईसाई मिशनरी संस्‍थानों का भवन निर्माण गलत

पहला तो अधिकांश ईसाई मिशनरी संस्‍थानों के भवन निर्माण इत्‍यादि को लोक प्रयोजन का नाम दिया जाना अपने आप में गलत था. दूसरा कि बगैर गजटीय प्रकाशन और बगैर अधिग्रहण संबंधी नोटिस किये और बगैर मुआवजा भुगतान के गरीबों की खतियानी रैयती भूमि इनसे छिन लिया जाना. तीसरा मात्र सशर्त पट्टा पर उन मिशनरी संस्‍थानों को भी वैसी भूमि प्रदान किया जाना और चौथा शर्त पूरा न किये जाने पर वैसी भूमि को पूर्वाग्रहण कर अपने अहाते में मिला लिया जाना यानि भूतपूर्व भू-स्‍वामियों को वापस नहीं किया जाना पूर्णत: अवैधानिक, असंगत और मनमानीपन और भू-हड़प नीति भी स्‍थापित करती है.

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आदिवासी जमीन हड़पने के लिए अंग्रेजों ने अपनाये कई हथकंडे

महावीर लाल विश्‍वकर्मा ने कहा है कि अंग्रेजी सरकार के द्वारा यहां के गरीब लोगों की रैयती भूमि की हड़पने का दूसरा तरीका यह था कि सरकार ने बगैर किसी कानून या प्रक्रिया के नाम पर गरीब लोगों के खतियानी रैयती भूमि को अपने सरकारी अहाते में ले लिया और स्‍वमेय उसे खास महल की भूमि घोषित कर दिया. उसी भूमि को प्रारंभ में 15 वर्ष और बाद के समय में मात्र 30 वर्षों के सशर्त पट्टा देकर उन्‍हीं व्‍यक्तियों के प्रदान कर दिया जो कभी भूमि के खतियानी मालिक थे. पट्टा भी उन्‍हें एक खास काम के लिए प्रदान किया गया था, जैसे छप्‍परबंदी, महालबंदी और बाग-बगीचा लगाने के लिए. उसने ऐसा काम कर दिया तो ठीक और नहीं कर सका तो उसे भी पूर्णग्रहण कर लिया गया, यानि वो भूमि भी पूर्णत: सरकारी खास महल हो गई.

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विश्वकर्मा ने सरकार से की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग

गौरतलब है कि उक्‍त काम करने की अवधि भी पट्टाधारियों को दी जाती थी, मात्र एक या दो वर्ष का समय दिया जाता था, जिसके अन्‍तर्गत वे व्‍यक्ति आर्थिक कमी के कारण काम को करने में अधिकांशत: सफल ही रहते थे और इस तरह उसी खतियानी रैयती भूमि का अब वह पट्टेदार भी नहीं रह पाता था और पूरी तरह से वह भूमि उसके हाथ से निकल कर सरकारी खास महल भूमि भी बन चुकी होती थी, जिसका एक भी रूपये मुआवजा का भुगतान उन्‍होंने नहीं किया. इस संबंध में विशेष ज्ञातव्‍य हो कि इस प्रकार भू-हड़प के संबंध में यह भी तथ्‍य सामने आया है. इस तरह सामान्‍य कानून एवं प्रावधान 1908 की धारा 46(1’क’) एवं अन्‍य प्रावधानों का भी घोर उल्‍लंघन था, जिसके अन्‍तर्गत आदिवासियों की रैयती भूमि गैर आदिवासियों को लीज पर या अन्‍यथा भी प्रदान नहीं की जा सकती थी. इसपर विश्‍वकर्मा ने गहरी चिन्‍ता व्‍यक्‍त करते हुए कहा है कि राज्य सरकार इसकी उच्‍च स्‍तरीय जांच करवा कर गरीब रैयतों के हक में नीतिगत निर्णय ले.

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