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महेंद्र सिंह आज भी जिंदा हैं जनता के अरमानों में

प्रवीण कुमार

Ranchi : आज भी महेंद्र सिंह जिंदा है. वह झारखंड के जल, जंगल, जमीन, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक की हित के पूरेजोर प्रवक्ता थे. महेंद्र सिंह ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आम लोगों को गोलबंद करने के अपने प्रयासों के तहत बिरसा युग की उस परंपरा को आगे बढ़ाया जो झारखंड अस्मिता और जनविकास के सपनों को हकीकत में बदलना चाहता था. महेंद्र सिंह राज्य के  विस्थापन के खिलाफ लड़ाई के अग्रणी योद्धा थे. कोयलकारो गोलीकांड के बाद से ही उन्होंने आदिवासी जनमानस के बीच में अपनी एक खास पहचान बनायी, जो आदिवासी और मूलवासी एकता के लिये एक खास मिशाल बन गया. बगोदर से निकलकर महेंद्र सिंह पूरे झारखंड और बिहार  में अपनी एक अलग पहचान बनायी. वह जनता के संघर्ष के साथ हमेशा खड़े रहे, साथ ही जनमानस में घुल-मिलकर आम लोगों की आवाज उभारने का पुरजोर कोशिश करते रहे. एक किसान परिवार में पैदा होकर सादगी विनम्रता और भाषा की मर्यादा पर अधिक जोर दिया करते थे. उनके वक्तव्य में किसी अनर्गल शब्दों का इस्तेमाल नहीं होता था. का. महेंद्र सिंह जितने कुशल वक्ता थे उतनी ही कुशलता के साथ कविता  भी लिखा करते थे. उनकी कविता में संघर्षों की चेतना और आग मौजूद रहती थी. उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वह आम और खास में कभी मतभेद नहीं करते थे. महेंद्र सिंह जीवन भर इन्हीं मूल्यों का पालन करते रहे.

जनता के सरोकार और उनके आवाज को बुलंद करने से उन्हें कभी भय नहीं लगता था. इसी कारण सत्ता के असंवैधानिक एवं जनसरोकार से विमुख कार्यों के विरुद्ध सत्ता के समक्ष हमेशा रोड़ा बने रहते थे. उनके शब्दों के प्रहार से सत्ता थरथरा जाती थी. वहीं आम जनता को सुकून और अपनी आवाज की प्रतिध्वनी महसूस होती थी. उन्होंने अपनी लड़ाई को बगोदर तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि राज्य व्यापी बनाया. भ्रष्टाचार और विस्थापन के सवाल को अपने संघर्षों का केंद्रीय सवाल बनाया था. महेंद्र जी मानते थे कि जब तक आम जनता सशक्त नहीं होगी तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा. इसलिए वह कहा करते थे कि जनता के प्रधिकार की स्थापना लोकतंत्र में सर्वव्यापी हो, वर्तमान राजनीति में उनका यह कथन आज कहीं  दिखायी नहीं पड़ता है, जो जनता के प्रधिकारों को ताकतवर बनाये.

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महेंद्र सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माले के अकेले विधायक होने के बावजूद जनमानस में उन्हें विपक्ष स्वप्रिय नेता के रुप में मानता रहा. उनकी निर्भीकता और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों के कारण वह राज्य के निहित स्वार्थी तत्वों की आंख की किरकिरी बन गये थे. विधानसभा में उनके पीछे अक्सर विपक्ष को आना पड़ता था और उनकी अनदेखी सत्ता पक्ष भी करने की हिम्मत जल्दी नहीं कर पाता था. इसलिए कि उनकी जड़ें जनता में गहरी थीं और उनपर कोई दाग नहीं लगा सकता था. सिर्फ एक उदाहरण – एक बार इसी तरह के किसी गलत आरोप लगाये जाने के चलते महेंद्र सिंह ने विधान सभा से अपना त्याग-पत्र दे दिया और विधायक निवास से अपना सामान समेट चल दिये. सत्ता पक्ष की साजिश तो यह थी कि इस मौके का फायदा उठा इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाये. लेकिन विधान सभा अध्यक्ष को उनका इस्तीफा स्वीकार करने की हिम्मत न हुई और समूचे विपक्ष के अनुरोध और आरोप-वापसी के बाद उन्होंने अपना इस्तीफा वापस लिया.  सदन से लेकर सड़क तक उनके सवाल इतने तीखे तार्किक एवं तथ्यपरक होते थे कि उससे भ्रष्टाचार और एवं भ्रष्टाचारी सत्ता थरथराने लगती थी.

महेन्द्र सिंह जहां जनसंघर्षों की मजबूती में विश्वास करते थे, वहीं विधानसभा में जनता के सवालों को जीवंत केंद्र बनाने का भी निरंतर प्रयास करते रहते थे. विधानसभा में उनकी अपनी उपस्थिति मात्र से ना केवल बहस का स्तर ऊपर रहता था बल्कि उनके तर्क और तत्व की प्रस्तुति पक्ष और विपक्ष दोनों को अनुकरणीय बना देता था. महेंद्र सिंह की विधानसभा में मौजूदगी भर से ही नैतिक मापदंड खड़े हो जाते थे. महेंद्र सिंह अविभाजित बिहार में और झारखंड बनने के बाद तो और भी स्पष्ट रूप में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पर अपना नैतिक वर्चस्व बनाने में कामयाब रहे थे.

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वे पहल के धनी थे और हर पहल को जन-पहल बना देने की उनके पास कुशलता थी. ऐसे कई उदाहरण थे जहां वह अकेले थे फिर भी सत्ता को जनसरोकर के लिए पहल करना पड़ा. झारखंड में उस दौरान पंचायत चुनाव नहीं कराया जा रहा था. सता का विकेंद्रीयकरण न होने की वजह से आम लोगों की अवाज दब जा रही थी. महेंद्र सिंह ने अपने विधानसभा क्षेत्र बागोदर में जनता को अपने बल पर पंचायत चुनाव करने के लिए कहा और यह जनता की पहल में बदल गया. प्रशासन द्वारा इसे गैर संवैधानिक करार दिया जाता रहा, लेकिन फिर भी अधिसूचना जारी करने से लेकर नामांकन और बूथ बनाकर मतदान दिये गये और गिनती के बाद चुनाव परिणाम तक निकाले गये. उन पंचायतों के जरिये जनता अपना सवाल प्रशासन और सरकार के सामने पेश करने लगी और अंतत: सबको उन पंचायतों के माध्यम से ही काम करने को विवश होना पड़ा.

मार्क्सवादी चिंतन के कारण महेंद्र जी झारखंड के सवालों को ना सिर्फ वर्ग चेतना बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की भूमिका में तार्किक तरीकों से प्रस्तुत करते थे. उन्होंने संथाल हूलहूल, बिरसा और गुलाम की बिल्कुल नयी व्याख्या की. मौत उन्हें कभी नहीं डरा पायी. वे जनता से एक ही वादा किया करते थे कि “आपके मत को बेचूंगा नहीं”, हाँ जरूरत हुई तो अपनी जान देकर भी आपके और आपके मत का मान रखूंगा. और जब 16 जनवरी के उस दिन हत्यारों ने पूछा कि महेंद्र सिंह कौन हैं तो उन्होंने मौत को सामने खड़े देख कर भी उससे आंख मिलाते हुए कहा -”मैं हूँ महेंद्र सिंह!”

16 जनवरी 2005 को राजसत्ता से चिपके हुए स्वार्थी और जनता के अधिकारों का हनन करने वाले रक्त पिचासुओं ने उनकी हत्या कर दी. महेंद्र सिंह आज भी मरे नहीं हैं. वह आम जनमानस के बीच जिंदा हैं. महेंद्र जी खेतों में, खलिहानों में, कारखानों में दलित वंचित और आदिवासियों के अरमानों में आज भी जिंदा है.

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