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महामना की कर्मशीलता को ‘भारत रत्न’

|| प्रभुनाथ शुक्ला ||

पंडित मदन मोहन मालवीय के जीवन दर्शन सर्वागीण और बहुआयामी है। उनके जीवन और कृतित्व को एक विचाराधारा और सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। देश के वह पहली ऐसी विभूति थे, जिनके नाम के आगे महामना जुड़ा। पंडित जी को उनके योगदान के लिए भारत सरकार की ओर से भारत रत्न से नवाजा गया। उन्हें इतनी देर से यह सम्मान मिलना अन्याय है।

महामना को उनके जन्म के 155 साल बाद यह सम्मान मिला। जिस कांग्रेस से साथ वह जीवनभर जुड़े रहे, उसके विचारों, नीतियों और सिद्धांतांे का आयाम दिया। लेकिन वही कांग्रेस उन्हें यह सम्मान नहीं दिला सकी। लेकिन यह बहस का विषय नहीं है।

देश की सरकार ने उनकी कर्मशीलता का मूल्याकंन किया यह बड़ी बात है। देर आए दुरुस्त आए। यह सम्मान पूरे देश के लिए गौरव की बात है। लेकिन पूरी दुनिया में धर्मक्षेत्र की धरती काशी और प्रयाग के लिए यह सम्मान कुछ अलग है, क्योंकि प्रयाग मालवीय जी की जन्मभूमि रही, जबकि काशी उनके जीवन उद्दश्यों की कर्मभूमि।

देश के स्वाधीनता संग्राम में जहां उनका योगदान अवीस्मरणीय है, वहीं सनातनर्ध में उनका विश्वास अटूट था और उसकी रक्षा और विकास के लिए उन्होंने अमूल्य योगदान दिया। पंडित जी कुशल राजनीतिज्ञ, स्वाधीनता आंदोलन के प्रणेता, समाज सुधारक, अधिवक्ता, पत्रकार, भाषाविद के रुप में भारतीय जनमानस में अपनी अलग पहचान बनाई।

उनका जन्म 25 दिसंबर 1961 में प्रयाग में हुआ था। पिता का नाम ब्रजनाथ और माता का का नाम मूना देवी था। वह मालवा के रहने वाले थे। इसलिए इनके साथ मालवीय उपनाम जुड़ा। इनकी पत्नी का नाम कुंदन था। वह मिजार्पुर के पंडित नंदलाल जी की पुत्री थीं। उनकी प्राथमिक शिक्षा सनातनधर्म की शिक्षा देने वाले स्कूल में हुई।

मालवीय जी ने सनातनधर्मी परिवार और उसकी विचारधारा में जन्म लिया था। कोलकाता से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली। परिवार में आर्थिक समस्या थी, जिसके निजात के लिए उन्होंने शिक्षक के रूप में काम किया। उस दौरान उन्हें 40 रुपये वेतन मिलता था। बाद में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत भी किया। पंडित जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का भी नेतृत्व किया था।

उन्होंने 1909 से 1918 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कमान संभाली और उसके अध्यक्ष रहे। जाति-पात और अस्पृश्यता के विरोधी थे। मंदिरों में दलितों के विरोध को वे गलत मानते थे। सनातनधर्म के प्रबल पुजारी थे। हिंदू धर्म के विकास में उन्होंने अपना अमूल्य योगदान दिया। उन्हें काशी का कर्मशील कर्मकार भी कहा जाता है।

काशी हिंदू विश्वविद्याल की स्थापना के पहले उन्होंने कामच्छा में हिंदू कालेज की स्थापना की थी। बाद में यही कालेज काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का साकार रूप बना।

4 फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। देशभर के राजाओं और रियासतों से धन एकत्रित किया और विश्वविद्यालय निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में आज यह संस्थान दुनिया में अपनी गौरवशाली उपलब्धि दर्ज करा रहा है। देश के चिकित्सा क्षेत्र में इसकी अपनी अलग पहचान है।

उन्होंने कालाकांकर के राजा के अनुरोध पर दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के संपादन की जिम्मेदारी निभाई। यह अपनी यशस्वी लेखनी ने उन्होंने अपनी रचनात्मक प्रतिभा का आगाज किया और वैचारिक क्रांति से देश के लोगों नई स्कूर्ति भरी। पंडित जी के अग्रलेखों का बेहद गहर असर अवाम और उसकी जनचेतना पर पड़ा। उनकी ओर से साप्ताहिक समाचारपत्र ‘अभ्युदय’ का भी संपादन प्रारंभ किया गया। बाद में यह अखबार दैनिक हो गया।

उन्होंने अखबार ‘लीडर’ का भी संपादन किया। देश में पत्रकारिता विकास में मालवीय जी का योगदान अकथनीय और अमूल्य है। बाद में मर्यादा प्रत्रिका भी निकाली। यह वाराणसी के प्रसिद्ध ज्ञानमंडल प्रकाशन से प्रकाशित हो रही थी। इंडियन ओपीनियन का संपादन कर उन्होंने पत्रकारिता को बुलंदियों पर पहुंचाया।

सनातन धर्म में उनका अटूट भरोसा था। प्रयाग के कुंभ मेले में उन्होंने 1906 सनातन धर्म पर सम्मेलन कराया था। महामना ने सनातन धर्म सभा के मुखिया की जिम्मेदारी संभाली। लाहौर, कानपुर और अलीगढ़ में सनाधन महाविद्यालय की स्थापना करायी। गौ, गंगा और गायत्री महामना की महाप्राण थी।

अपनी मृत्यु के समय उन्होंने कहा था, “अब मेरी अंतिम यात्रा का सयम आए तो मुझे बनारस से बाहर ले जाया जाए क्योंकि हम मोक्ष नहीं चाहते हैं।” उनकी मौत प्रयाग में 12 नवंबर 1946 में हुई। हिंदी के विकास में उनका बड़ा योगदान था। अंग्रेजी भाषा और उसकी प्रगति के खिलाफ थे। शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का माध्यम वे हिंदी चाहते थे। सरकारी कामकाज की भाषा हिंदी हो इस पर भी उनका अधिक बल था। अपने पत्रकारिता के जरिए वे इसे आंदोलन का रुप दिया। सरकार को हिंदी को सरकारी कामकाज में बढ़ावा देने पर मजबूर कर दिया। कार्यालयों में वे हिंदी का प्रयोग बढ़ाना चाहते थे। अदालतों में पहले उर्दू में ही कामकाज होता था। लेकिन मालवीय जी के प्रसास से हिंदी को बाढ़ावा मिला। उनके इस प्रयास को तत्कालीन गर्वनर से स्वीकार कर लिया और हिंदी को सरकारी कार्यालयों की भाषा बनाया।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कुलपति रहते हुए जब भी किसी समारोह को संबोधित करते तो उनका भाषण हिंदी में होता था। देश मंे बढ़ते अंग्रेजी साम्राज्यवाद पर अपनी चिंता प्रगट करते हुए कहा था कि भारतीय विद्यार्थियों के मार्ग में आनेवाली कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है, क्योंकि हमारी शिक्षा की भाषा हिंदी न होकर दुरुह विदेशी है। किसी भी सभ्य संसार में जन समुदाय के शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।

सनातनधर्म से उनका मतभेद था। वे हिंदूधर्म से संबंधित कर्मकांडों को उचित मानते थे। काशी की नागरिणी प्रचारिणी सभा की स्थापना में उन्होंने अपना पूरा योगदान दिया। हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान उनकी मूल विचारधारा थी।

मालवीय जी ने गांधी जी के असहयोग आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई। 1928 में उन्होंने साइमन कमीशन का तगड़ा विरोध किया था। 1931 में उन्होंने गोलमेज सम्मेलन का नेतृत्व किया। सत्यमेव जयते को लोकप्रिय बनाने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभायी। बाद में उन्होंने वकालत छोड़कर कर देश सेवा का संकल्प लिया। धर्मनगरी काशी के सातवें ऐसे महामना सपूत हैं जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। महामना की सातवीं पीढ़ी। यह सम्मान अर्जित करेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी की धरती पर अपना प्रचार अभियान प्रारम्भ करते वक्त महामहाना के प्रति बेहद कृतज्ञता प्रगट की थी। इस दौरान उन्हें भारत रत्न देने का वादा किया था। आखिरकार महामना को यह राष्टीय गौरव मिल गया। हलांकि उनके योगदान को भारत रत्न में नहीं समेटा जा सकता है।

उनका भारत रत्न तो देश के लिए की गयी उनकी सेवा ही है। लेकिन यह सम्मान आने वाली युवा पीढ़ी और देशवासियों के लिए बड़़ा सम्मान है। यह काशी के लाल का सम्मान है। मालवीय जी के विचारों को आज की युवा पीढ़ी के सामने लाकर शिक्षा और समाज के विकास में उनके योगदान से परिचित कराने की आवश्यकता है।

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