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बकोरिया कांड का सच-05ः स्कॉर्पियो के शीशा पर गोली किधर से लगी यह पता न चले, इसलिए शीशा तोड़ दिया

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Ranchi, 09 December: आठ जून 2015 को पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में हुए कथित मुठभेड़ में 12 लोगों के मारे जाने की घटना में लगातार नए तथ्य सामने आ रहे हैं. जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वह मुठभेड़ को फरजी होने की ओर इशारा कर रहा है. एक सूत्र ने दावा किया है कि पुलिस के अफसरों ने स्कॉर्पियों का शीशा को जान-बूझ कर तोड़ दिया. आज की तारीख में स्कॉर्पियो सतबरवा थाना में खड़ी है. जिसमें एक भी शीशा नहीं है. यह सब इसलिए किया गया है, ताकि यह पता न चल सके कि स्कॉर्पियो के शीशे पर जो छेद है, वह बाहर से चली गोली लगने से बना है या भीतर से चली गोली से. चूंकि शीशा और छेद ही नहीं रहा, तो यह भी पता नहीं चल पायेगा कि शीशा पर कितनी दूर से गोली लगी और किस एंगल से. इस बारे में पुलिस ने जो तर्क दिया है, वह यह कि स्कॉर्पियो को घटनास्थल से थाना ले जाने के क्रम में शीशा टूट गया. जबकि घटनास्थल पर खड़ी स्कॉर्पियो   की जो तसवीर न्यूज विंग को मिली है, उसमें स्कॉर्पियो के आगे और पीछे का शीशा सही-सलामत नजर आ रहा है. स्कॉर्पियो के अगले शीशे  पर गोलियों के आठ निशान मौजूद हैं और पीछे के शीशे पर पांच. लेकिन दोनों शीशा सही-सलामत है. जबकि एक खिड़की के शीशा पर गोली लगने के बाद वह टूट गया. 

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जांच की मांग कर रहे हैं मृतक के परिजन

कथित मुठभेड़ की घटना के बाद पुलिस ने जो कहानी बतायी थी, उसके मुताबिक कथित नक्सली स्कॉर्पियो पर सवार थे. पुलिस ने जब स्कॉर्पियो को रोकने की कोशिश की, तो स्कॉर्पियो के भीतर बैठे नक्सलियों ने फायरिंग शुरु कर दी थी. अगर इस बात में सच्चाई है कि नक्सलियों ने स्कॉर्पियो के भीतर से  पुलिस पर गोली चलायी थी, तो उसके शीशे पर भीतर से गोली चलने की वजह से सुराग बनता. मृतकों के परिजन इसकी जांच की मांग कर रहे हैं. यहां उल्लेखनीय है कि घटनास्थल के आसपास के ग्रामीणों ने अपने बयान में इस मुठभेड़ को फरजी करार दिया है. इसके अलावा पलामू प्रमंडल के तत्कालीन डीआइजी हेमंत टोप्पो और एसआइ हरीश पाठक ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दिए बयान में मुठभेड़ होने की जानकारी होने से इंकार किया है. डीआइजी ने अपने बयान में यह कहा है कि मुठभेड़ के बारे में डीजीपी डीके पांडेय ने बताया था. इस बारे में जब डीआइजी ने पलामू व लातेहार के तत्कालीन एसपी और सतबरवा थाना के तत्कालीन प्रभारी से पूछा था तब तीनों ने मुठभेड़ की घटना से इंकार किया था. 

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ढ़ाई सालों तक क्यों चुप रहे दो-दो एडीजी

पिछले माह इस मामले में हाइकोर्ट की टिप्पणी आने के बाद पुलिस के सीनियर अफसरों में कई तरह की चर्चा चल रही है. एक चर्चा यह चल रही है कि आखिर इस केस का अनुसंधान ढ़ाई साल से क्यों लटका रहा है. क्यों पीड़ित पक्ष और पुलिस पदाधिकारियों का बयान नहीं दर्ज किया गया. इस दौरान सीआइडी में दो-दो एडीजी अजय भटनागर और अजय कुमार सिंह पदस्थापित हुए. अाखिर इन अफसरों ने अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभायी. क्या इन दोनों एडीजी ने उपर के दवाब में एेसा किया. कानून के हिसाब से क्यों नहीं काम किया. सूत्रों के मुताबिक घटना से जुड़े लोग आने वाले समय में अनुसंधान को धीमा रखने में मदद करने को लेकर इन दोनों अफसरों को लपेट सकते हैं. 

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