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बकोरिया कांड का सच-01ः सीआईडी ने न तथ्यों की जांच की, न मृतकों के परिजन व घटना के समय पदस्थापित पुलिस अफसरों का बयान दर्ज किया

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NEWS WING
Ranchi, 25 November:
आठ जून 2015 की रात पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में हुए कथित मुठभेड़ में 12 लोगों के मारे जाने की घटना में झारखंड हाईकोर्ट ने 24 नवंबर को कहा कि जरुरत पड़ी तो मामले की जांच का जिम्मा सीबीआइ को सौंप देंगे. अभी इस मामले की जांच झारखंड पुलिस की सीआईडी कर रही है. सीआईडी की जांच पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सवाल खड़ किया था. आयोग ने डीजीपी को लिखे पत्र में कहा था कि जांच सही तरीके से नहीं हो रही है. मामले का अनुसंधान करने वाले और सुपरविजन करने वाले पुलिस अफसर के खिलाफ कार्रवाई करें. 24 नवंबर को हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद newswing.com ने सीआईडी की जांच के बारे में जानकारी जुटायी. पता चला कि मृतक के परिजनों ने सीआईडी को जो फोटो उपलब्ध कराये,  उसकी जांच अभी तक नहीं की गयी. मृतक के परिजनों का बयान भी दर्ज नहीं किया गया है. इतना ही नहीं घटना के वक्त जो पुलिस अधिकारी पलामू और सतबरवा में पदस्थापित थे, उनका भी बयान दर्ज नहीं किया गया है. उल्लेखनीय है कि कथित मुठभेड़ के तुरंत बाद पुलिस मुख्यालय और सरकार ने कई अफसरों का ट्रांसफर कर दिया था. सूत्रों के मुताबिक अफसरों को यह लगा था कि अगर वे अफसर वहां पदस्थापित रहें, तो मुठभेड़ का सच तुरंत सामने आ जायेगा. 

जब्ती सूची और घटनास्थल की तस्वीरों से उठे हैं कई सवाल
आठ जून 2015 की रात पलामू के सतबरवा में पुलिस ने मुठभेड के नाम पर नक्सली कहते हुए 12 लोगों को मार गिराया था. तब से लेकर आज तक सीआईडी इस मामले की जांच कर रही है. ढाई साल हो गये लेकिन सीआईडी इस बात को अभी तक स्पष्ट नहीं कर पायी है कि मुठभेड़ असली था या फर्जी, मारे गये लोग नक्सली थे या कोई और. इस बीच कुछ तस्वीरें भी सामने आयी थी, जो कि मुठभेड़ पर सवाल खड़ा करती है. पुलिस ने कथित तौर पर मुठभेड़ के बाद जो जब्ती सूची बनायी थी, प्रारंभिक तौर पर देखने में इस सूची में और तस्वीरों में बुनियादी फर्क दिखता है. जो  कई सवाल खड़े करते हैं.
जब्ती सूचीः पुलिस की जब्ती सूची के अनुसार उदय यादव के शव के पास एक 30.06 बोर की राइफल मिली थी. इसे खोलने पर चैंबर में लोड एक गोली मिली थी. पहना हुआ बिंडोलिया में पांच चार्जर के साथ 45 चक्र जिंदा गोली भी थी. राइफल के बैरल से बारूद की गंध आ रही थी. वहीं शव के बगल में कुछ दूरी पर चार खाली खोखा भी मिला.

तस्वीर से जो पता चलता हैः तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है. तस्वीर में यह देखा जा सकता है कि उदय यादव की तस्वीर के पास एक राइफल व एक लाल रंग का चप्पल पड़ा है. इस राइफल में ना तो मैगजीन है और ना ही बोल्ट हैं. ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि जब मैगजीन-बोल्ट नहीं है, तो पुलिस को इस राइफल के बैरल से बारूद का गंघ आता हुआ कैसे मिला?

जब्ती सूचीः आठ राइफल और गोलियां बरामद की गयीं. सभी राइफल में मैगजीन-गोली थी. बैरल से बारूद का गंघ भी आता मिला था.

तस्वीरः  लेकिन तस्वीर में एक राइफल में न तो मैगजीन है और ना ही बोल्ट, जबकि एक राइफल में बोल्ट और ट्रिगर तो दिख रहा है, पर मैगजीन नहीं दिख रहा. ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राइफल की मरम्मती करा कर उसे जब्ती सूची में दिखाया गया.

जब्ती सूचीः मृतक एजाज अहमद का शव स्कॉरपियो (डब्ल्यूबी-60ई-2011) में ड्राइवर की सीट पर पाया गया. ऊपरी हिस्से में खून लगा ब्लू-नारंगी रंग का तौलिया जब्त हुआ था. एजाज की पॉकेट से एक ड्राइविंग लाइसेंस मिला था, जसमें ग्वालियर का पता अंकित था.

तस्वीरः में यह भी देखा जा सकता है कि स्कॉरपियो के आगे की ड्राइविंग सीट पर कमर के नीचे के हिस्से में एक तकिया पड़ा है. कमर के ऊपर के हिस्से के तौलिया में खून नहीं लगा है. डैश बोर्ड, स्टीयरिंग, आगे का दाहिना दरवाजा या अन्य कहीं भी खून का एक धब्बा भी नहीं दिख रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि गोली लगने पर खून जहां-तहां लगा होना चाहिए था. पर तस्वीर में खून कहीं दिख नहीं रहा है.

जब्ती सूचीः पुलिस के अनुसार यह लिखा है कि घटनास्थल से नक्सलियों के पास से नोकिया का एक पुराना मोबाइल और एक स्पाईस कंपनी का मोबाइल फोन बरामद किया गया. वहीं स्पाईस कंपनी की मोबाइल में गोली लगने का छेद है.

तस्वीरः में यह देखा जा सकता है कि एक मृतक जिसने ब्लू रंग की गंजी पहनी थी. उसके हाथ के पास एक मोबाइल फोन पड़ा है. इसमें स्क्रीन पर खून लगा है, पर स्क्रीन सही सलामत है. अब सवाल यह है कि मोबाइल पर गोली लगी थी, तो वह सही सलामत कैसे थी. 

मुठभेड़ में कौन-कौन मारे गए थे
घटना में जो लोग मारे गये थे उनमें से एक थे, डॉ आरके उर्फ अनुराग, उनके नक्सली होने का रिकार्ड पुलिस के पास था. अन्य जो मारे गये थे, वे थे अमलेश यादव (35), अनुराग का बेटा संतोष यादव (25), महेंद्र (करीब 15 साल), और सत्येंद्र (करीब 17-18 साल). इन लोगों में से उस दौरान पुलिस के पास किसी के नक्सली होने का रिकार्ड नहीं था.सीआईडी जांच इसलिए की जा रही है ताकि पता चल सके कि इनमें से कितने नक्सली थे, कितने नहीं, मुठभेड़ हुई थी या नहीं. 

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