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प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु को रोकने के लिए अस्पतालों के समीप बनाया जाए “प्रसव पूर्व केन्द्र” : समिति

New Delhi : मां बनना महिलाओं के सबसे सुखद एहसास में से एक है. लेकिन भारत में इस एहसास को यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था से लगातार चुनौती मिल रही है. इसी को लेकर संसद की एक समिति ने सुझाव दिया है कि प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर कम करने और प्रसूति केन्द्र तक जाने का समय बचाने के लिए अस्पतालों के समीप प्रसव पूर्व केन्द्र बनाये जाने चाहिए, जहां गर्भवती महिलाएं अपनी नियत तारीख से करीब एक सप्ताह पहले रूक सकें. महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी देखभाल, नीतिगत विकल्प विषय पर महिलाओं को शक्तियां प्रदान करने संबंधित संसदीय समिति ने बुधवार को संसद के दोनों सदनों में पेश अपनी रिपोर्ट में यह सुझाव दिया है. उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रसव पूर्व केन्द्रों में प्रसव की निर्धारित तिथि से एक सप्ताह या दस दिन पहले गर्भवती महिलाओं विशेषकर गरीब परिवारों के अंतिम समय में अस्पताल ले जाने के खर्च को कम किया जा सकेगा.

केंद्रों में होने चाहिए कुशल चिकित्सा सहायक

समिति ने सुझाव दिया है कि इस प्रकार के केन्द्र अस्पतालों के समीप होने चाहिए तथा उनमें कुशल चिकित्सा सहायक होने चाहिए. रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘संभावित माताओं को समीप के प्रसूति स्थलों तक आसानी से ले जाना कठिन भौगलिक क्षेत्रों, परिवहन सुविधाओं के अभाव, प्राकृतिक आपदाओं, विद्रोहियों के कारण सुरक्षा भय के चलते अभी तक एक कठिन काम बना हुआ है. इससे प्रसव करने जा रही महिलाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं. समित ने कहा कि प्रतीक्षा केन्द्र की परिकल्पना को पश्चिम बंगाल सरकार ने सुंदरबन, संदेशखाली, गोसाबा जैसे दूरदराज के इलाकों में सफलतापूर्वक लागू किया है.

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संसदीय समिति ने आशाकर्मियों को निश्चित मासिक वेतन दिये जाने की वकालत की

आशाकर्मियों के कामकाज की सराहना करते हुए संसद की एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसूति केंद्रों के पास प्रसवपूर्व देखभाल केंद्र बनाने की सिफारिश करने के साथ ही गर्भवती महिलाओं की देखभाल करने वाली आशाकर्मियों को निश्चित मासिक वेतन दिये जाने की वकालत की. महिलाओं को शक्तियां प्रदान करने संबंधी समिति ने तीन जनवरी को संसद में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में देशभर में काम कर रहीं आशाकर्मियों के कामकाज की सराहना करते हुए कहा कि उनके परिवारों को थोड़ी वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए सरकार को उन्हें प्रोत्साहन राशि देने के साथ कम से कम तीन हजार रुपये प्रतिमाह निश्चित मासिक वेतन देने के लिए एक प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजना चाहिए.

प्रसव व्यवस्था में सुधार कर लाये जा सकते है परिवर्तन

गौरतलब है कि आशाकर्मियों को निश्चित मासिक वेतन की मांग समय-समय पर उठती रही है. संसद में भी सदस्य इस विषय को उठाते रहे हैं. फिलहाल आशाकर्मियों को सरकार की ओर से मानदेय दिया जाता है. भाजपा सदस्य विजया चक्रवर्ती की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि केंद्र और राज्य की नीतियों में निर्बाध समन्वय से ही विशेषत: देश में मातृ और शिशु मृत्यु दर को नीचे लाने और प्रसवपूर्व, प्रसव के समय और प्रसव के बाद दी जाने वाली सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार कर भारत में मातृ तथा शिशु स्वास्थ्य परिदृश्य के समग्र विकास में योगदान कर महिला स्वास्थ्य देखभाल में उल्लेखनीय परिवर्तन लाये जा सकते हैं.

गर्भवती महिलाओं के लिए परिवहन पर मंत्रालय ने नहीं दिया पर्याप्त ध्यान

रिपोर्ट के अनुसार समिति ने अध्ययन के दौरान पाया कि मंत्रालय ने गर्भवती महिलाओं के लिए परिवहन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है. समिति ने सिफारिश की कि सरकार ऐसे प्रसवपूर्व केंद्रों का निर्माण करे जो प्रसूति केंद्रों के निकट हों और जहां प्रसूति की अनुमानित तिथि से 7 से 10 दिन पहले गर्भवती महिलाओं को लाकर रखा जा सके. जहां कुशल चिकित्साकर्मी उनकी देखभाल करेंगे और उन्हें उनकी सेहत की जरूरत के उपयुक्त भोजन और दवाइयां प्रदान करेंगे. समिति का मानना है कि इससे अधिकांश गरीब और कमजोर परिवारों के खर्च में कमी आएगी जिन्हें देश के कई भागों में दूरस्थ अस्पतालों तक गर्भवती महिलाओं को ले जाने के लिए वाहन किराये पर लेने के लिए भारी धनराशि का भुगतान करना पड़ता है. इसके अलावा इन केंद्रों के होने से मातृ मृत्यु और प्रसव के दौरान होने वाली अन्य जटिलताओं में कमी आएगी.

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प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु रोकना एक बड़ी चुनौती

एनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु रोकना, भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. भारत में हर 10 मिनट में गर्भावस्था से जुड़े किसी कारण से एक महिला की मौत हो जाती है. गर्भवती महिलाओं में से 15 प्रतिशत के मामले में किसी न किसी प्रकार की चिकित्सकीय जटिलता उभरने की संभावना रहती है. हर साल लगभग 48,000 मातृ मुत्यु होती हैं. इसके अतिरिक्त, लाखों महिलाएं और नवजात शिशु गर्भावस्था व प्रसव से जुड़ी विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित होते हैं. इस तरह, गर्भावस्था से जुड़ी मृत्यु व बीमारियां भारतीय महिलाओं और उनके नवजात शिशुओं के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती हैं.

प्रसव के दौरान होने वाली समस्याओं का सही से नहीं हो पाता इलाज

बहुत सी महिलाओं की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में प्रसव के दौरान महिलाओं को होने वाली समस्याओं का तत्काल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज नहीं हो पाता. इस वजह से अब तक मातृत्व मृत्यु दर बहुत अधिक है. एनएफएचएस इसका कोई संकेत नहीं देता. अब पहले के मुकाबले सांस्थानिक प्रसव का अनुपात बढ़ा है. महिलाएं अब घरों में ही प्रसव करवाने की बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में ज्यादा जा रही हैं. ऑपरेशन से होने वाले प्रसव (सिजेरियन सेक्शन) में भी बढ़ोतरी हुई है और महिलाएं सिजेरियन के लिए निजी अस्पतालों में जा रही हैं. अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि निजी अस्पताल पैसों के लालच में जरूरत से ज्यादा सिजेरियन ऑपरेशन करते हैं. स्तनपान करवाने वाली महिलाओं का औसत भी पहले के मुकाबले बढ़ा है.

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