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पॉलिटेक्निक कॉलेजों को चाहिए 390 शिक्षक, 314 सीटें है खाली 

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KUMAR GAURAV
Ranchi :
राज्य के 13 डिप्लोमा कॉलेजों की स्थिति दयनीय तो है ही साथ ही यहां शिक्षकों के कुल 390 सीटों में से 314 सीटें खाली है. जिसके लिए जेपीएससी को उच्च तकनीकी एवं कौशल विकास विभाग ने शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अधियाचना भी भेजी थी. पर इसके लिए जेपीएससी के द्वारा न कोई अधिसूचना जारी हुई न ही उसके बाद विभाग ने कोई सुध ली. अभी कुल 76 सरकारी शिक्षकों के बल पर ही पॉलिटेक्निक कॉलेजों में कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है. 

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राज्य में कुल 13 सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज

अभी राज्य में 13 सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज है. हरेक कॉलेज में सीटों की संख्या करीब 360 है. इन कॉलेजों में छह से अधिक स्ट्रीम की पढ़ाई कराई जाती है, पर इनकी पढ़ाई पार्ट टाईम लेक्चरर से पूरी कराई जाती है. इसके लिए कॉलेज प्रबंधन अपने हिसाब से बीटेक एमटेक किए हुए अभ्यर्थियों को अपने कॉलेजों में बुलाकर पढ़ाई करवाता है.

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पीटीएल शिक्षकों को हर क्लास के हिसाब से देता है पैसा

राज्य के कॉलेजों में सरकारी शिक्षकों के अभाव को पूरा करने के लिए पीटीएल शिक्षक नियुक्त किए हुए है. जिन्हें हर क्लास के हिसाब से 600 रुपये की राशि दी जाती है. जो महीने के अत्यधिक 22 हजार रुपये तक होती है. ऐसे शिक्षक परमानेंट जॉब हो जाने की स्थिति में कक्षाओं को बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं. इस स्थिति में छात्रों को सिलेबस पूरा करने में काफी दिक्कत होती है.

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कॉलेजों में नहीं बना सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

सरकार द्वारा पॉलिटेक्निक कॉलेजों में पढ़ाई करने के बाद छात्रों को नियोजन देने के लिए कई तरह की योजना बनाई गई थी. जिसमें से कई कंपनियों के साथ एमओयू भी किया गया था. दूसरा राजकीय तकनीकी संस्थानों में प्रशिक्षण कार्यक्रम और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की योजना भी सरकार ने बनाई थी, इसका उद्देश्य छात्रों को रोजगार उपलब्ध कराना था.

रोजगार के अभाव में भटक रहे हैं स्टूडेंट्स

राज्य से हर साल करीब 30 हजार बच्चे डिप्लोमा पास करते हैं. ये आंकड़े सरकारी और प्राईवेट दोनों कॉलेजों के हैं. राज्य में डिप्लोमा करने वाले छात्रों के लिए नियोजन की कोई नीति सरकार के पास नहीं है, जबकि इस राज्य में अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा कल कारखाने मौजूद हैं.टाटा स्टील को छोड़ दिया जाए तो कोई भी डिप्लोमा पास करने वालों को अपने पास मौका नहीं देना चाहता, वहीं दूसरी ओर इंटर्नशिप और एक साल की ट्रेनिंग के नाम पर तीन से चार हजार में काम करना पड़ता है.

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