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“पैसे वालों” का सदन ना बन जाये देश का “उच्च सदन”

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Surjit singh

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एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की ताजा रिपोर्ट से देश के उच्च सदन (राज्यसभा) को लेकर नयी चर्चा शुरू होगी. रिपोर्ट के अनुसार राज्य सभा के लिए होने वाले चुनावों में राजनीतिक पार्टियां, जिन्हें उम्मीदवार बनाती हैं, उनमें से 87 प्रतिशत करोड़पति होते हैं. कुल 63 प्रत्याशियों में से 55 की संपत्ति एक करोड़ से ज्यादा है. पांच प्रतिशत उम्मीदवारों की संपत्ति तो 250 करोड़ से 4000 करोड़ तक पायी है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या देश का उच्च सदन” “पैसे वालों का सदनबनने की राह पर है. क्या उच्च सदन का सदस्य बनने के लिए होने वाले चुनावों में पैसा फेंको तमाशा देखो वाली नीति ही चलती है. क्या उच्च सदन का सदस्य बनने के लिए सबसे बड़ी योग्यतापैसा ही रह गया है.

शायद ही कभी चर्चा में भाग लेते हैं पैसे वाले सांसद

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार से जदयू के प्रत्याशी महेंद्र प्रसाद (किंग महेंद्र) की संपत्ति 4078 करोड़ है, उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी जया बच्चन की संपत्ति 1001 करोड़ है. कर्नाटक से जेडी (एस) के प्रत्याशी बीएम फारुक की संपत्ति 766 करोड़, पश्चिम बंगाल से कांग्रेस के प्रत्याशी अभिषेक मनु सिंघवी की संपत्ति 649 करोड़ और आंध्रप्रदेश से टीडीपी प्रत्याशी सीएम रमेश की संपत्ति 258 करोड़ है. रिपोर्ट बताती है कि इस बार राज्यसभा चुनाव में जदयू ने दो, टीडीपी ने दो, कांग्रेस ने 11, राजद ने दो, भाजपा ने 29, टीआरएस व बीजद ने तीन-तीन और एआईटीसी पार्टी के चार प्रत्याशी करोड़पति हैं. राज्य सभा के करोड़पति सांसदों की लिस्ट देखें, ऐसे-ऐसे नाम मिलेंगे, जो वार्ड या मुखिया के चुनाव भी नहीं जीत सकते. ये सभी पहले भी राज्यसभा में मनोनित सांसद रह चुके हैं. शायद ही किसी को याद हो, वहां जाकर उन्होंने कभी किसी चर्चा में भाग लिया. देश, राज्य और समाज में उनकी पहचान क्या है, किन कारणों से लोकप्रिय हैं. यह भी समझने की जरूरत है.

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रिपोर्ट के तथ्यों से यह साबित होता दिख रहा है कि उच्च सदन में करोड़पति सांसदों की संख्या बढ़ती जा रही है और राजनीति में कम पैसे वालों के लिए मौका कम होता जा रहा है. पार्टियां भी उम्मीदवार बनाते वक्त प्रत्याशी की आर्थिक स्थिति को ही महत्वपूर्ण मानने लगी है. झारखंड की ही बात करें, तो भाजपा ने यहां दो प्रत्याशी उतारे थे. एक समीर उरांव, जिनकी जीत पक्की थी. दूसरे प्रदीप सोंथालिया, जिनकी जीत जोड़-तोड़ के बिना संभव नहीं था. जोड़-तोड़ अंतरात्मा की आवाज के नाम पर होती है, पर यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि अंतरात्मा की आड़ में कैसे पैसे का खेल चलता है. प्रदीप सोंथालिया उद्योगपति हैं और उनकी संपत्ति करोड़ों में है. उनका उद्योगपति होना ही उनकी उम्मीदवार बनने की योग्यता था. क्योंकि कांग्रेस ने जिस धीरज साहू को प्रत्याशी बनाया था, वह भी उद्योगपति और करोड़पति ही हैं.

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