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पीएचडी होल्‍डर बार्बर जो और पढ़ना चाहता है

रांची : स्थान-झारखंड की राजधानी रांची का महात्मा गांधी मार्ग स्थित उर्दू लाइब्रेरी। जी हां, इसी उर्दू लाइब्रेरी के नुक्कड़ पर ठेलेवाले चाय दुकान और पान दुकान के बगल में दीवार पर टंगे एक छोटे से आईने, एक छोटा संदूक और एक डलियानुमा प्लास्टिक का छोटा सा हैंगर, दो छोटी पुरानी कुर्सियों के साथ एक युवक आपको लोगों के बाल दाढ़ी बनाता हुआ दिखाई देगा।

महात्मा गांधी मार्ग (साधारणतर: रांची का मेन रोड के नाम से प्रचलित) से प्रतिदिन लाखों लोग गुजरते हैं. पर उनमे से बहुत कम लोग ही रोड पर खड़े होकर बाल दाढ़ी बनाते इस युवक को जानते पहचानते होंगे या इनके विषय में जानते होंगे। इनका परिचय है, अशरफ हुसैन. शिक्षा – पी.एच.डी.। विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है पर अशरफ हुसैन जो खास रांची के ही रहने वाले हैं, ने उर्दू विषय में रांची विश्वविद्यालय से 2011 में पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। डॉक्टर ऑफ फिलासफी (मानविकी) में इनका विषय था, “ ए कम्पेरेटिव एंड एनालिटिकल स्टडी ऑफ एमिनेंट उर्दू शार्ट स्टोरी राइटर्स ऑफ झारखण्ड स्टेट। ”

शालीन स्वभाव के स्वामी अशरफ बातचीत के क्रम में बताते हैं कि 1928 से ही उनके पूर्वज रांची में रह रहे हैं। कोनका रोड में उनका पैतृक मकान है पर अब वह नेजाम नगर हिन्दपीढ़ी रांची में छोटे से मकान में रहते हैं। अपने स्वर्गीय पिताजी (अब्दुल अजीज) के समय से ही वह इसी नुक्कड़ पर लोगों के बाल दाढ़ी बनाते रहे हैं। अशरफ कहते हैं कि पिताजी की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी। पिताजी की मृत्यु के बाद घर का बोझ और बढ़ गया है। पत्नी, दो पुत्रों और एक पुत्री के साथ साथ बड़े भाई जिनकी मृत्यु हो चुकी है उनके परिवार के भरण पोषण का बोझ भी उन्हीं के सर पर है।

कहते हैं कि बचपन से ही उन्हें शिक्षा के प्रति बहुत लगाव था, फलस्वरूप दिन भर दुकान वस्तुतः फुटपाथ पर लोगों के बाल दाढ़ी बनाने के बाद जो भी समय बचता बिजली हो या लालटेन की रौशनी में, पढाई में लग जाते। स्नातक, स्नातकोत्तर और फिर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने के बाद भी वह शिक्षा ग्रहण करने के लिए बहुत ही उत्साहित दिखते हैं। वह अब डी.लिट्. करना चाहते हैं, पर आर्थिक तंगी उनकी इस इच्छा में आड़े आ रही है। अर्थाभाव और बच्चों की शिक्षा की प्राथमिकता के कारण अभी रुके हुए हैं।

नौकरी नहीं मिलने के प्रश्न पर (थोड़े उदास लहजे में) कहते हैं कि झारखण्ड सरकार में नियुक्ति नहीं हो रही है। अखबारों से ही पता चला है कि विश्वविद्यालय सेवा आयोग के गठन की मांग हो रही है। अब पता नहीं क्या तकनीकी समस्या है। बिहार में भी आवेदन दिया है। मौलाना आजाद कॉलेज, कार्तिक उरांव कॉलेज कामड़े आदि निजी संस्थानों में प्रयास करने के बाद भी नौकरी नहीं मिल सकी, दूसरे विषयों में नियुक्तियां तो हुईं पर उर्दू और होम साइंस के आवेदन ठन्डे बसते में डाल दिए गए। अब पता नहीं क्या उनके अपने मैनेजमेंट की बात थी।

उन्होंने कहा कि वह आरक्षण कोटे से आते हैं। ओ.बी.सी. – वन कैटगरी में हैं। नाई का काम करने के प्रश्न पर कहते हैं कि एक तरह से क्या कहा जाय, लोग सिस्टम के आदि हो जाते हैं। कहा कि वैसे पेशे का संबंध शिक्षा से नहीं होना चाहिए, परन्तु सामान्यत: लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद यह अपेक्षा करते हैं कि अच्छी नौकरी मिलेगी, जीवन स्तर में सुधार होगा। कहते हैं कि 150-200 रुपए रोजाना की कमाई पर क्या करें, क्या न करें। इससे अधिक आय तो कितने दिहाड़ी मजदूरों की हो जाती है।

अशरफ कहत हैं कि स्थायी, बड़ी दुकान करने के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। कहाँ से करेंगे। अगर पैसा रहता तो सबसे पहले बी.एड., एम.एड. करते। अशरफ अपने गुरुओं हसन इमाम, गुलाम रब्बानी आदि के कृतज्ञ हैं। कहते हैं कि अगर उनकी मदद नहीं मिलती तो पढाई का शौक दफ़न हो जाता!

“ जदीद हिंदुस्तान की तामीर में मौलाना अबुल कलाम आजाद का किरदार ” , टॉपिक पर डी.लिट्. करने की उनकी इच्छा है! कहते हैं कि मौलाना अबुल कलाम आजाद हिंदुस्तान और हिन्दू मुस्लिम एकता के जबररदस्त हिमायती थे। अशरफ हुसैन ने एक किताब भी लिखी है “ झारखण्ड की ख्वातीन उर्दू अफसानानिगारों का तकाब्ली और तजजि़याती जायज़ा ” ( झारखण्ड की महिला उर्दू उपन्यासकारों का आलोचनात्मक और विवेचनात्मक अध्यन ), उन्होंने कहा कि अब तक झारखण्ड की महिला उर्दू उपन्यासकारों पर कोई काम नहीं हो पाया है, पर वो इस किताब को छपवा नहीं पा रहे हैं। छपवाने में हजारों रुपयों की आवश्यकता है जिसका वह वहन नहीं कर सकते।
( के. ई. सैम )

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