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पार्क पड़तालः रांची की खूबसूरती पर दाग बने शहर के पार्क, टूटी दीवार, फैली गंदगी और मॉडर्नाइजेशन के नाम पर अश्लीलता  

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NEWS WING TEAM

शहर के बीच में पार्क. इतना बोलते ही नजरों के सामने एक स्वच्छ वातावरण. उसमें टहलते कुछ बुजुर्ग और पार्क के बीच में खेलते कुछ बच्चों की तस्वीर नजरों के सामने फिल्म की तरह चलती है. लेकिन हकीकत इस सपने से परे है. खास कर रांची के पार्कों का सच तो यही है. यहां आपको टूटी दीवार, फैली गंदगी और झुरमुट के पीछे बेशर्मी के साथ बैठा कोई जोड़ा मिल जाएगा. शहर के पार्कों की स्थिति महज खानापूर्ति ही मालूम पड़ती है. इन जगहों पर की गई व्यवस्था की चर्चा कई बिंदुओं पर की जा सकती है. मसलन, स्वच्छ भारत के नारों की बीच यहां की साफ-सफाई. घोषणाओं के मुताबिक यहां की मनोरंजन की व्यवस्था. इन सब के बीच मॉडर्नाइजेशन के नाम पर अश्लीलता. ऐसी ही और कई बातें हैं जो पार्क की व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है.

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दो विभागों के बीच बंटे हैं पार्क

रिफ्रेश्मेंट के लिए सबसे बेहतर स्थान और लोगों की पहली पंसद पार्क को ही माना जाता है. लेकिन राजधानी रांची में संचालित पार्कों को देखने के बाद ऐसा लगता है कि ये गंजेड़ियों और शराबियों का अड्डा बने हुए हैं. दूसरी और तीसरी तस्वीर भी सिस्टम पर प्रश्न खड़ा करती है. जैसे इन जगहों पर युगल की हरकतों को देख शर्मा जाना. खूबसूरती के नाम पर बहता हुआ नाले का पानी और बिखरा हुआ कचरा. दरअसल शहर के पार्क दो विभागों के अंतगर्त हैं. वन विभाग और रांची नगर निगम. इनमें से अधिकतर पार्क वन विभाग में आते हैं, जिसकी स्थिति साफ-सफाई में निगम के पार्कों की तुलना में ज्यादा बेहतर है. जबकि स्वच्छ भारत अभियान के तहत रांची शहर को स्वच्छ बनाना नगर निगम की जिम्मेदारी है. ऐसे में निकाय चुनाव के दौरान रांची नगर निगम की सुस्त व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है.

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जानिए मोरहाबादी मैदान पार्क का हाल

रांची के मोरहाबादी मैदान में ही आधे दर्जन पार्क हैं. इन जगहों पर करोड़ों रुपये की लागत से बनाए गए पार्क के उदेश्य पर स्थानीय लोग अलग राय रखते हैं. छात्र रुपेश साहू कहते हैं कि पार्क का मकसद लोगों के अलपहार के दृष्टिकोण से जगह मुहैय्या कराने के साथ-साथ हरियाली का वातावरण बनाना है. पर इससे विपरीत तस्वीर देखने को मिलती है. रुपेश का कहना है कि मोराबादी मैदान को बीते 20 सालों में पार्क और स्टेडियम के नाम पर काफी छोटा कर दिया गया है. इससे शहर का वातावरण पहले की तुलना में बदला है. एक और अन्य छात्र अमरेंद्र सिंह कहते हैं कि विशाल और एतिहासिक मोराहाबादी मैदान का वजूद स्टेडियम और पार्क के नाम पर खतरे में पड़ता जा रहा है. आगे वह कहते हैं अब टाइम्स स्क्वायर बनाया जा रहा है. अब वो दिन भी दूर भी नहीं जब यहां मैदान नहीं सिर्फ पार्क होगा.

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दादा-दादी और रामदयाल मुंडा पार्क का सूरत-ए-हाल

दादा-दादी और रामदयाल मुंडा पार्क की व्यवस्था का अंदाजा पार्क में बिखरे कचरे और मैदान में पड़ी हुई शराब की बोतलों को देखकर लगाया जा सकता है. वहीं इन जगहों के शौचालय की गंदगी लोगों को अपने नाक पर रूमाल रखने को मजबूर कर देती है. इत्तेफाक से ये दोनों ही पार्क रांची नगर निगम के हैं, जिसकी देख-रेख का जिम्मा निगम ने किसी और को दे रखा है. वहीं रांची के मशहूर सिद्धू-कान्हों पार्क में छात्र-छात्राओं के द्वारा अशलील हरकतें भी बेपरवाह व्यवस्था की पोल खोलती है. इधर नव-निर्मित ऑक्सीजन पार्क की स्थिति भी कुछ इसी तरह की है. जबकि पंडित दीन-दयाल पार्क इन सब में थोड़ा बेहतर है, जहां सुबह-शाम सिर्फ परिवार संग ही लोग पार्क की हरियाली का मजा लेते हैं. ये सभी पार्क वन विभाग का है, जिसकी देख-रेख भी विभाग के द्वारा ही किया जाता है. 

(प्रथम भाग)

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