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पदाधिकारी नहीं दे रहे हैं आरटीआई से मांगी गई सूचना, आयोग में 10517 मामले लंबित, हर साल पहुंच रहे हैं 2700 आवेदन

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Md. Asghar Khan

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Ranchi, 30 November: किसी विभाग या कार्यलाय से संबिधित जानकारियां अगर आपको चाहिए तो आरटीआई के जरिए मांगी गई सूचना संभवतः जन सूचना पदाधिकारी नही देंगे. यही सूचना प्रथम अपीलीय पदाधिकारी से मांगते है तो इन्होंने भी इसी ढर्रे को अपना लिया है. फिर आपको द्वितीय अपीलीय यानी राज्य सूचना आयोग में अपील करना होगा, जहां आपके मामले की सुनवाई कब होगी इसकी कोई समय सीमा नहीं है.

इसका अंदाजा झारखंड राज्य सूचना आयोग में आरटीआई के 10517 लंबित मामलों से लगाया जा सकता है. सुनवाई की रफ्तार इतनी धीमी है कि आवेदक एक-एक साल से आयोग का चक्कार लगा रहे हैं. दस वर्षों में जानकारियां मुहैया नहीं कराने पर सिर्फ 350 ही सूचना पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई या जुर्माना किया गया है.

प्रतिदिन 60 और हर साल 2700 केस पहुंच रहे हैं

झारखंड में सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारियां नहीं देना विभागीय और कार्यालय के जन सूचना पदाधिकारियों की आदत होती जा रही है. झारखंड राज्य सूचना आयोग में प्रतिदिन आरटीआई के लगभग 60 आवेदन पहुंच रहे हैं, जबकि हर साल इनकी संख्या 2700 से ऊपर है, जो सूचना पदाधिकारियों की लापरवाही को साबित करता है. 2006 में झारखंड राज्य सूचना आयोग के गठन के बाद से 28 नवंबर 2017 तक 27,880 आरटीआई के मामले आयोग पहुंच चुके हैं. सबसे अधिक 2015 में 4091 मामले आएं, जबकि इस वर्ष अबतक का आकड़ा 3100 पार हो चुका है.

सूचना उपलब्ध नहीं कराने के कारण पेंडिंग होते हैं मामले

राज्य सूचना आयोग अक्सर अपने पास मैन पावर की कमी होने के कारण सैकड़ों-हजारों अपील पेंडिंग होने का रोना रोता रहता है. आयोग का कहना है कि मैन पावर की कमी के कारण ही अपीलों की सुनवाई की तारीख लंबी खींच जाती है. दरअसल, आयोग में इतनी अधिक संख्या में अपील पहुंचने का कारण है जन सूचना पदाधिकारियों द्वारा निर्धारित समय-सीमा में आवेदक को सूचना उपलब्ध नहीं कराना. जन सूचना पदाधिकारियों के इस रवैये और उनकी इस नेग्लिजेंस का सबसे बड़ा कारण है राज्य सूचना आयोग द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 20(1) और धारा 20(2) में उल्लिखित विभागीय कार्रवाई और आर्थिक दंड के प्रावधान का पालन नहीं करना. आयोग के द्वारा अक्सर ज्यादातर मामलों में इस प्रावधान की अनदेखी कर दी जाती है. वहीं समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराने पर आयोग के द्वारा दोषी जन सूचना पदाधिकारियों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करता है, जिससे जन सूचना पदाधिकारियों का मनोबल बढ़ जाता है.

क्या है आरटीआई का नियम

सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत आवेदक द्वारा मांगी गई सूचना (ए) अगर कोई जन सूचना पदाधिकारी निर्धारित अधिकतम 30 दिनों की समय-सीमा में प्रदान नहीं करता है, तो संबंधित विभाग/कार्यालय के प्रथम अपीलीय पदाधिकारी के पास आवेदक द्वारा अपील की जा सकती है. अगर यहां से भी अपील करने के 30 दिनों के अंदर सूचनाएं नहीं दी जाती है, तब आवेदक राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील कर सकता है. इसके बाद राज्य सूचना आयोग अपीलकर्ता को उस जन सूचना पदाधिकारी के माध्यम से सूचनाएं उपलब्ध कराता है. हालांकि इसके लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है.

जुर्माने का है प्रावधान

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निर्धारित 30 दिनों में सूचना उपलब्ध नहीं कराने के जुर्म में जन सूचना पदाधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने और उसे आर्थिक दंड देने का प्रावधान सूचना अधिकार अधिनियम-2005 की धारा 20(1) और धारा 20(2) में किया गया है. दोषी जन सूचना पदाधिकारी पर यह कार्रवाई करने की जिम्मेदारी राज्य सूचना आयोग की है. यानी राज्य सूचना आयोग को उक्त अधिनियम की धारा 20(1) और 20(2) का पालन करते हुए अपीलकर्ता को निर्धारित समय-सीमा (30 दिनों की समय-सीमा) में सूचना उपलब्ध नहीं कराने के दोषी जन सूचना पदाधिकारी को दंडित करना है.

सीआईसी समेत कुल दस आयुक्तों का पद रिक्त

झारखंड राज्य सूचना आयोग को एक मुख्य सूचना आयुक्त आदित्य स्वरुप और एक सूचना आयुक्त हिमांशु चौधरी चला रहे हैं. जबकि एक मुख्य सूचना आयुक्त(सीआईसी) और नौ सूचना आयुक्त के पद स्वीकृत है. नतीजा पेंडिंग मामले की सुनवाई नहीं हो पा रही है, साथ ही इसमें कई वर्ष भी लग जाते हैं. आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि इसकी वजह से विभागों में भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं. ऐसा मालूम होता है कि सरकार ने अधिकारियों को भ्रष्टाचार के लिए खुली छूट दे रखी है. वहीं समाजिक संगठन राज्य के सीएम रघुवर दास, गर्वनर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वीकृत पद पर नियुक्ति के पत्र लिख चुके हैं.

व्यवस्था पर क्या कहते हैं आरटीआई एक्टिविस्ट

एस अली का कहना है कि सूचना अधिकार अधिनियम का सबसे ज्यादा उल्लंघन कल्याण विभाग और शिक्षा विभाग के द्वारा किया जा रहा है. जनहित से जुड़े मामलों पर सूचना देने में काफी समय लिया जाता है, जिनमें से अधितकर मामलों में सूचनाएं भी उपलब्ध नहीं कराई जाती है. यह नियम के खिलाफ है.

विजय शंकर का कहना है कि राज्य के विभिन्न विभागों से सूचना प्राप्त करने के लिए आरटीआई करते हैं. कई विभागों से जब सूचना नहीं मिली, तो प्रथम अपील दायर किया. इसके बाद राज्य सूचना आयोग पहुंचा. यहां पर सुनवाई के लिए बुलाया तो गया लेकिन सुनवाई कभी पूरी नहीं हुई.

अकरम रशीद ने बताया कि निर्धारित समय पर सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत अगर पदाधिकारी सूचना उपलब्ध नहीं कराते हैं, तो धारा 20 के अन्तर्गत उनके उपर जुर्माना करने का प्रावधान है. ऐसे कई सारे मामले हैं, जिसमें सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई है. मुझे लगता है कि झारखंड सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त ने अभी तक किसी भी मामले में कार्रवाई नहीं की है. इसी वजह से अधिकारियों में डर नहीं है.

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