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पत्‍नी को साथ रखने के लिए पति को मजबूर नहीं कर सकती कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट

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News Wing New Delhi, 26 November: पति-पत्नी के साथ रहने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी अदालत पत्नी को साथ रखने के लिए पति को मजबूर नहीं कर सकती है. इस संबंध में पति पर किसी तरह का दबाव भी नहीं डाला जा सकता है. कोर्ट ने पेशे से पायलट एक व्यक्ति को अलग रह रही पत्नी और बेटे की परवरिश के लिए 10 लाख रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता के तौर पर जमा कराने के लिए कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस जमानत आदेश को बहाल कर दिया है, जिसे पति द्वारा सुलह समझौता मानने से इनकार करने के कारण रद्द कर दिया गया था. न्यायमूर्ति आदर्श गोयल और न्यायमूर्ति यू यू ललित ने कहा कि हम एक पति को पत्नी को रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते. यह मानवीय रिश्ता है.

कोर्ट ने रकम कम करने की अपील ठुकरायी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 लाख रुपए अंतरिम गुजारा भत्ता देने के फैसले पर पति के वकील ने राशि को कम करने की अपील की. इसपर पीठ ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट है न कि फैमिली कोर्ट. इस विषय पर आप चर्चा नहीं कर सकते हैं. इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि अगर तुरंत 10 लाख रुपए जमा करने के लिए राजी हो जाते हैं तो जमानत अर्जी बहाल कर दी जाएगी. इसपर वकील पैसा जमा करने के लिए राजी हो गया. इसके बाद अदालत ने पति को 10 लाख रुपए जमा करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर दोनों पक्ष चाहें तो अदालत के बाहर समझौता भी कर सकते हैं.

पहले भी हुए हैं ऐतिहासिक फैसले
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट इस तरह के ऐतिहासिक फैसले दे चुका है. कुछ समय पहले कोर्ट ने कहा था कि अगर पति को उसके बूढे़ मां-बाप से अलग रहने के लिए पत्नी मजबूर करती है और अत्याचार करती है, तो यह तलाक का आधार हो सकता है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बार-बार खुदकुशी की धमकी देना भी अत्याचार ही माना जाएगा.

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