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देश में तेजी से बदल रही बीमारी की प्रकृति

नई दिल्ली : विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक आज भारत में गैर संचारी रोग से मरने की संभावना संचारी रोग की अपेक्षा दोगुना से अधिक है। करीब एक दशक पहले देश में संचारी और गैर संचारी रोगों से मरने की संभावना बराबर थी।

यह बदलाव विकास के रास्ते पर बढ़ रहे कमोबेश हर देश में हुआ है।

देश में 2012 तक एक-चौथाई मौतें हृदयवाहिनी से संबंधित रोगों से हो रही थीं। श्वास संबंधी बीमारियों से 13 फीसदी, कैंसर से सात फीसदी, मधुमेह से दो फीसदी तथा अन्य गैर संचारी रोगों से 12 फीसदी मौतें हो रही थीं।

एचसीजी कैंसर हॉस्पीटल के अध्यक्ष बी. अजयकुमार ने बताया कि देश भर में कैंसर मरीजों की संख्या जहां बढ़ रही है, वहीं बेंगलुरू में इसके मामले सर्वाधिक तेजी से बढ़ रहे हैं।

देश में प्रति लाख पर कैंसर मरीजों की संख्या 81 है, वहीं बेंगलुरू में प्रति लाख पर यह संख्या 126 है और यह शहर देश में कैंसर राजधानी के तौर पर उभर रहा है।

अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में आज तीन-चौथाई मौतें गैर संचारी रोगों के कारण होती हैं। भारत में डब्ल्यूएचओ की प्रतिनिधि नाता मेनाब्डे ने कहा, “मौतों में रोग के योगदान में बदलाव होने में विकसित देशों में एक शताब्दी लगी।”

भारत में इस बदलाव की शुरुआत 1970 में हुई थी। शहरीकरण, औद्योगीकरण और सामाजिक-आर्थिक विकास के कारण इसमें 1995 के बाद तेजी आ गई।

1900 ईस्वी तक अमेरिका में मौत का 10 सबसे प्रमुख कारण संचारी रोग हुआ करता था। एक औसत अमेरिकी की जीवन प्रत्याशा 48 वर्ष थी, जो अभी 79 वर्ष हो गई है। दुनिया भर में तब मामूली कारणों से भी लोगों की मौत हो जाया करती थी।

दवाओं के विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं में वृद्धि के बीच 1950 तक अमेरिकियों की जीवन प्रत्याशा 68 वर्ष हो गई। इस समय तक दूसरे कारणों से मरने वालों का अनुपात बढ़ गया।

भारत में गैर संचारी रोगों से होने वाली मौतों का अनुपात जहां बढ़ा है, वहीं संचारी रोग भी कम नहीं हुए हैं।

भारत में वृद्धों के जीवन पर अधिक जोखिम बना हुआ है।

मुंबई में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन स्टडीज के प्रोफेसर पेरियनायगम अरोकियासामी ने कहा कि देश के वृद्धों को गैर संचारी रोग हो सकता है। इसके साथ ही वे संचारी रोग की चपेट में भी आ सकते हैं।

डब्ल्यूएचओ के मेनाब्डे ने कहा कि दूसरे देशों से भारत की स्थिति इस मायने में भी अलग है कि यहां गैर संचारी रोग अपेक्षाकृत पहले हमला करते हैं। दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले हृदयवाहिका संबंधी बीमारी एक आम व्यक्ति को भारत में करीब 10 साल पहले हो जाती है।

देश के 50 शहरों में 20,937 मरीजों पर किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक, अमीरों की अपेक्षा गरीबों की हृदय रोग से अधिक मौतें हुईं, लेकिन सिर्फ 0.7 फीसदी गरीब मरीजों को कोरोनरी आर्टरी बायपास ग्राफ्ट सर्जरी के लिए सिफारिश की गई, जबकि अमीर मरीजों में यह 7.5 फीसदी था।

देश में आर्थिक विकास में तेजी के कारण महामारी के बदलाव में भी तेजी आई है, लेकिन भारत में आम लोगों को वैसी स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पाई है, जो पश्चिमी और कई विकासशील देशों में मिली है।

(आंकड़ा आधारित, गैर लाभकारी, लोकहित पत्रकारित मंच, इंडियास्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत। यहां प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं।)
(चारू बाहरी)

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