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दुनिया के महाजनों के खिलाफ आक्रोश में झारखंडी जनमानस

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pravin kumar

Ranchi,27 November : इतिहास को देखने और समझने के विशेष तरीके के प्रति आदिवासी इलाकों में लगातार चेतना और संघर्ष बढ़ रहा है. यही  कारण है कि आदिवासी इलाकों में पहचान का संघर्ष निरंतर नई चेतना अर्जित कर रहा है. तमाम तरह की मुश्किलों के बाद भी झारखंड के लोग अब अपने इतिहास और विरासत के प्रति सजग हो गए हैं. जिससे इतिहास की अपनी समझ को स्थापित करने के लिए आंदोलनरत भी हैं. झारखंड की इस चेतना का सीधा संबंध विश्व के महाजनों के खिलाफ बढ़ती जागरूकता से, झारखंड के विभिन्न आंदोलन में इतिहास के प्रति आम लोग की बढ़ रही रुचि इसका गवाह है. झारखंडी गीतों से लगातार यह अभिव्यक्त भी हो रहा है. आदिवासी इलाके के लोग इसी कारण इतिहास की गलतियों को सुधार देना चाहते हैं और पूर्वग्रह से मुक्त तथ्यपरक इतिहास को स्थापित करना चाहते हैं. इस सच्चाई को नहीं नकारा जा सकता है कि आदिवासी क्षेत्र में इतिहास के परंपरागत स्वरूप के अनुसार समाज बनाने की कोशिश के कारण शोषणकारी तबकों में भारी परेशानी हो रही  है और यही कारण है कि आदिवासी क्षेत्र की वास्तविकताओं को गलत रूप में पेश किया जाता है. यह अलग बात है कि अभी तक ऐसे लोगों को कोई खास सफलता हासिल नहीं हुई है .

सीएनटी -एसपीटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ राज्यसत्ता को मुंह की खानी पड़ी

आदिवासी अंचलों में आज पूंजीवाद के काले करतूत को अपनी दृष्टि से देखा जा रहा हैं. इसी कारण से सीएनटी -एसपीटी एक्ट में संशोधन के खिलाफ राज्यसत्ता को मुंह की खानी पड़ी. साथ ही परंपरागत स्वशासन के अधिकार एवं पत्थरगड़ी आंदोलन में जनभागीदारी ने राजसत्ता को हिला कर रख दिया है.पांचवी अनुसूची एवं पेशा कानून में मिले संवैधानिक अधिकारों को गांव के बाहर बड़े-बड़े पत्थर पर लिखा जा रहा है. जिसे देख कर शासन की बेचैनी साफ दिख रही है. विस्थापन के खिलाफ आंदोलनों में जनता बढ़-चढ़कर भगीदारी  कर रही है. हाल के दिनों में हाथी सुरक्षा के नाम पर सिरसि-पालकोट-सारंडा वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर के निमार्ण के तहत प्रलामू प्रमंडल के लातेहार सहित गुमला, खूंटी, सिमडेगा और पश्चिम सिंहभूम जिले के 214 गांवों को चिन्हित किया गया है. उसके लिए 1,87,233 एकड़ जमीन को अधिग्रहित करने का सरकार का इरादा है. जिसके खिलाफ हुई प्रर्दशन आदिवासी अंचलों की सुगबुगहट दिखती है.

विश्न के नये महाजन एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं

झारखंड की जनमानस अब ऐसे लोगों पर कोई विश्वास नहीं करती और वह जानती है कि विश्व के नये महाजन के एजेंटों  के रूप में सरकार काम कर रही है. इन तमाम राज्यसत्ता की गतिविधि के कारण  झारखंडी जनमानस अब समझ चुका है कि आदिवासी अंचल में जो अकूत खनिज संपदा है और उसे लूटना है.

आज झारखंड क्षेत्र में स्वशासन की हक को हासिल करने की बेचैनी साफ दिख रहा है. यह हक के सवाल पूरी बहस का केंद्र बन गया है, जिसे सदियों पहले छीन लिए गए थे. वह आज अपने इस अधिकार को हासिल करना चाहती है. सवाल जंगल का हो, जमीन का हो, खदान का हो चाहे जल प्रबंधन का है.

गरीबों को लूटने का काम हो रहा है

आदिवासी स्वशासन की सोच है कि आज दुनिया को लूटने का नया तरीके इजाद किया जा रहा है, जिससे मानवीय चेहरा दिखाने की कोशिश होती है. गरीब लोग यह नहीं समझे कि उन्हें पूरी तरह लूटा जा रहा है. आदिवासी इलाकों में संसाधनों पर कब्जा जमाने की चाहत रखने वाली देशी और विदेशी पूंजीपती सरकार के माध्यम से अब संसाधन को लूटने का एक नया हथकंडा बनाए हुए हैं. जब उनसे आदिवासी जनता कहती है कि हमारे संसाधनों का दोहन बंद करो तो वह ऐसे सवालों में उसे फंसा देना चाहते हैं जो कोई मुद्दा है ही नहीं. झारखंड में यह खतरा बार-बार आ जा रहा है. मोमेंटम झारखंड, भूमि अधिग्रहण कानून, धर्म स्वतंत्र विधेयक जैसे कानून के प्रति लोगों का आक्रोश यह बतलाता है कि फिर से झारखंड के आदिवासी समाज अपनी स्वशासन व्यवस्था को प्राप्त करने के लिए सत्ता से सीधा संघर्ष करने के लिए खड़ी हो रही है.

आज झारखंड में बड़े पूंजीपति विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों तक अपनी सीधी पहुंच बनाने के लिए उतावले हैं और हर हालत में जैविक संपदा का विनाश भी कर देना चाहते हैं. एक जमाना था, जब उपनिषद ने भारत की संस्कृति और भाषा को समाप्त कर उसकी पहचान खत्म करने की कोशिश की गयी. लेकिन इन में पूरी सफलता नहीं मिली. आज भी झारखंड में अपनी संस्कृति और भाषा को लेकर जागरूकता है और किसी भी हालत में आदिवासी समाज के  इरादे को नष्ट नहीं किया जा सकता. इसका परिणाम यह निकलता हुआ दिख रहा है कि उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष तेज हो गया है.

वर्तमान में  राजसत्ता एक नए चेहरे और उदारवादी तरीके का इस्तेमाल कर रही 

वर्तमान समय में राजसत्ता एक नए चेहरे और उदारवादी तरीके का इस्तेमाल कर रही है. विकास के जुमलों का लगातार इस्तेमाल हो रहा है. वह इसी दिशा की ओर संकेत करता है और इस अभियान में वह गैर सरकारी तंत्र का भी सहारा ले रहा है ताकि उन की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठाया. आज का खतरा बाहर से जितना है उससे कहीं ज्यादा घर के भीतर से है .

आज ऐसा भी राज्य में देखा जा रहा है कि क्रांतिकारी दिखने वाले कई नारे और विचार भी राज्य में यथास्थिति बनाए रखने के साधन बन कर रह गए हैं और जनता बदलाव की अपेक्षा कमजोर होती जा रही है और ऐसा लगता है की साजिश सफल हो रहा है. साजिश यह है कि जनता को अतीत के गौरव से काट दिया जाए और यह बताया जाए कि जनता एक मुक्त समूह है, जिसका अपना इतिहास बहुत प्रेरक नहीं है. लेकिन जनता किसी भी हालत में अपनी संस्कृति और इतिहास चेतना के विरासत को बदलने को तैयार नहीं है और यह कैसे भविष्य की बात की सोचती है, जिसे अतीत हर हालत में प्रेरक बना रहे हैं. यही कारण है कि पत्थरगड़ी आंदोलन में बहुत सारी बात लिखी गई .

राज्य अब बलिग हो गया है और इसे देखते हुए सरकार को समझना चाहिए कि जन आकांक्षाओं के अनुरूप विकास का नया रूप रेखा समाज के बीच में जाकर तैयार करें और इस रूपरेखा में जन भागीदारी के साथ ही पूरा करने की परिकल्पना हो. जनमानस को संतुष्ट करने के लिए उन्हें साथ लेकर बढ़ना होगा अन्यथा एक नई विद्रोह की अवधारणा आदिवासी अंचलों में साफ झलक रही है. (लेखक का निजी विचार)

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