न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

दलित संगठनों का भारत बंद : संघर्ष, सियासत, आक्रोश और सिसकियों का सैलाब

20

एक असंतोष अनेक चिंगारियों को जन्म देता है, वो चिंगारियां जब एकजुट होती हैं तो लपटों में तब्दील हो जाती हैं. आग जब भड़कती है, तो वो भले-बुरे का भेद नहीं करती, वो सिर्फ जलाना जानती है. 2 अप्रैल को आहूत दलित संगठनों के भारत बंद के दौरान भी कुछ ऐसी ही दाहक तस्वीरें उभरीं, दलितों के आक्रोश और तत्संबंधी परिस्थितियों का आकलन समय सापेक्ष है.”

mi banner add

Murli Manohar Mishra

एससी एसटी एक्ट पर  सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ 2 अप्रैल के भारत बंद के दौरान देश भर में बड़े पैमाने पर हिंसक घटनाएं हुईं. खबरों के मुताबिक देश के अलग-अलग सूबों में 12 लोगों की मौत हुई, जबकि घायलों का आंकड़ा सैकड़ों में पहुंच गया. वहीं बंद के दौरान सबसे नागवार गुजरने वाली घटना भी हुई, जो अमूमन पहले नहीं होती थी. वो है बंद के दौरान एंबुलेंस को रोका जाना. नतीजतन 4 मौतें ऐसी भी हुई हैं, जिन्हें अगर समय पर इलाज मिल जाता तो शायद उनकी जान बच सकती थी.

इसे भी देखें- NEWS WING IMPACT:  न्यूज विंग में खबरें छपने के बाद कंबल घोटाले में होने लगी कार्रवाई, विकास आयुक्त अमित खरे ने की सीएम से एसीबी जांच की अनुशंसा 

…तो शायद बच सकती थी जिंदगी

भारत बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा एंबुलेंस रोके जाने की वजह से 4 मौतें हो गई, जो अपने आप में संवेदना और इंसानियत दोनों का मामला है. इनमें से एक तो रुड़की का मामला है, जहां अजन्मे बच्चे ने इलाज के अभाव में गर्भ में ही दम तोड़ दिया. बिहार के वैशाली में सड़क जाम में एंबुलेंस फंसने की वजह से जहां मो.कदील नामक शख्स के नवजात बच्ची की अस्पताल नहीं पहुंच पाने के कारण सांसें थम गई. वहीं बक्सर में इलाज के लिए दिल्ली जा रही महिला की ट्रेन स्टेशन पर ही फंसी रही, लिहाजा उसकी जिंदगी ने भी साथ छोड़ दिया. वहीं, चौथी दर्दनाक घटना बिजनौर की है, जहां बंद समर्थकों द्वारा एंबुलेंस रोके जाने पर एक युवक बीमार पिता को कंधे पर उठाकर अस्पताल दौड़ा, मगर अस्पताल पहुंचते-पहुंचते उसके पिता की जान जा चुकी थी. अधिकार और सुरक्षा के लिए संघर्ष करना बेशक लोगों का बुनियादी हक है, पर क्या ये सवाल नहीं उठता कि बंद के दौरान जिन मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जरूरी या आपात सेवाओं को बंद से मुक्त रखा जाता है, उनका पालन क्यों जरूरी नहीं समझा गया ? अगर समझा गया होता तो इलाज के अभाव में चार लोग बेमौत न मरते.

इसे भी देखें- फेक न्यूज पर पत्रकार की मान्यता नहीं होगी रद्द, मोदी सरकार ने नये गाइडलाइंस पर लगाई रोक

दलितों का प्रदर्शन

बीजेपी शासित राज्यों में सर्वाधिक हिंसा

दलित संगठनों द्वारा आहूत भारत बंद को अमूमन तमाम विपक्षी पार्टियों ने समर्थन दिया. किसी को अंदाजा भी न था कि दलितों का आक्रोश इस हद तक उफान पर आएगा. शायद ऐसा पहली बार देखा गया, जब दलितों के क्रोध ने इतना हिंसक रूप लिया. भारत बंद के दौरान हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, गुजरात, झारखंड व महाराष्ट्र जैसे राज्य रहे. इसमें एक गौरतलब पहलू ये भी है कि उन राज्यों में सर्वाधिक हिंसक घटनाएं घटी, जहां बीजेपी की सरकार है. इसके दो मतलब निकाले जा सकते हैं. एक तो ये कि बीजेपी शासित राज्यों में जन बूझकर सरकारों ने प्रशासन के जरिए इतनी सख्ती की कि आंदोलनकारी भड़क उठें, ताकि आंदोलन को हिंसक बताकर उनके प्रदर्शन को अनुचित ठहराया जा सके, या दूसरा मतलब ये हो सकता है कि तमाम विपक्षी दल दलितों के आंदोलन के जरिए ये हवा बनाना चाहते हैं कि बीजेपी दलितों का दुश्मन नंबर वन है, जो हक की आवाज को दबाना चाहती है. सच चाहे जो भी हो, मगर ये सच है कि अधिकारों के संघर्ष में अगर सियासत मिल जाए तो परिणाम आग में घी जैसा ही होता है. नतीजा भी वही निकला देश भर में हुई हिंसक घटनाओं में करीब 8 लोगों की जान गई. इनमें अकेले एमपी में ही चार लोगों की जान हिंसा के कारण चली गई. यहां भी एक प्रश्न है कि क्या मरने वालों का सिर्फ इतना कसूर था कि उन्होंने सड़क पर निकलने की हिम्मत की, अथवा आंदोलन की आवाज बनने की कोशिश की. या फिर कसूर उस सियासत का है, जो लाशों के ढेर पर सिंहासन सजाने की लाससा रखती है?

इसे भी देखें- रांची: पत्थलगड़ी पर राजभवन में मंथन, खूंटी के 6 प्रखंडों के ग्राम प्रधान शामिल

lathicharge

Related Posts

पूर्व सीजेआई आरएम लोढा हुए साइबर ठगी के शिकार, एक लाख रुपए गंवाये

साइबर ठगों ने  पूर्व सीजेआई आरएम लोढा को निशाना बनाते हुए एक लाख रुपए ठग लिये.  खबर है कि ठगों ने जस्टिस आरएम लोढा के करीबी दोस्त के ईमेल अकाउंट से संदेश भेजकर एक लाख रुपए  की ठगी कर ली.

बयानों में सिमटी राजनीति

एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोदी सरकार घिरी हुई है. विपक्ष ने केंद्र पर इस मामले की पैरवी ठीक से नहीं करने का आरोप लगाया है. इसपर बैकफुट पर आयी सरकार ने एक तरफ रिव्यू पिटिशन दाखिल कर किया, तो दूसरी तरफ उसे सदन में स्टैंड क्लियर करना पड़ा. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने आज लोकसभा में कहा कि एनडीए सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को कमजोर नहीं किया है बल्कि 2015 में इसमें संशोधन कर इसे और भी मजबूत बनाया है. वहीं उन्होंने विपक्ष पर आरक्षण खत्म को लेकर निराधार अफवाहें फैलाने का आरोप लगाया. जबकि ठीक एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी और आरएसएस के डीएनए को लेकर सवाल उठाए थे. उन्होंने बीजेपी पर हक मांगने वालों की आवाज दबाने का आरोप लगाया था.

इसे भी देखें- रांची: माले विधायक राजकुमार यादव पार्टी के सभी पदों से निलंबित, सेंट्रल कमेटी करेगी जांच

सियासत में दब न जाए दलितों का हित

क्या देश की राजनीति दलितों की चिंता को नहीं समझ पा रही है, या दलितों की चिंता पर नयी सियासी बिसात बिछाई जा रही है. जिसमें किसी को लाभ होगा, किसी को हानि. मगर इन सब के बीच दलित क्या वहीं खड़े रहेंगे, जहां अभी हैं. यह प्रश्न इसलिए लाजिमी है क्योंकि भारत बंद के दौरान थोड़ी भ्रम की स्थिति भी दिखी, कम लोगों को ही पता था कि विरोध सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ है, जिसमें एससी एसटी एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारी को गैरजरूरी बताया गया था, अधिकांश लोगों को यही लग रहा था कि आरक्षण खत्म किया जा रहा है, जिसका विरोध करना है. लिहाजा दलितों का गुस्सा विस्फोटक स्थिति तक जा पहुंचा. केंद्र सरकार को भी यह जरूर सोचना चाहिए कि आखिर क्यों दलितों का असंतोष हिंसक प्रदर्शन में बदला.

क्या है दलितों की चिंता ?

एससी एसटी एक्ट कमजोर हो जाएगा तो बढ़ेगा दलितों का उत्पीड़न

– तुरंत गिरफ्तारी नहीं होने से बढ़ेगा उत्पीड़न करने वालों का हौसला

– घटना को अंजाम देकर आसानी से अग्रमि जमानत ले लेंगे आरोपी

– दलित उत्पीड़न के केस को भी आरोपी बाहर रहकर करेंगे प्रभावित

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
%d bloggers like this: