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झारखंड में भाजपा सरकार ने पैदा की खाद्य सुरक्षा की आपातकालीन स्थिति

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Dheeraj Kumar

झारखंड में  खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बावजूद पिछले दो महीने में लगातार भूख से मौत हुई है. मरने वालों में 11 वर्षीय बच्ची से लेकर 64 साल की वृद्ध महिला है. सिमडेगा की 11 वर्षीय संतोषी कुमारी ने खाने के अभाव में भात- भात कहते-कहते दम तोड़ दिया. आधार से नहीं जुड़ने के कारण परिवार का राशन कार्ड रद्द कर दिया गया था. देवघर के रूप लाल मरांडी भी खाने के अभाव में मौत के शिकार हो गए क्योंकि मशीन में अंगूठा काम नहीं कर पाने के कारण उनको डीलर ने राशन नहीं दिया. धनबाद के रिक्शाचालक  बैजनाथ रविदास ने भी लगातार कई दिन तक खाना नहीं मिलने के कारण दम तोड़ दिया. परिवार का राशन कार्ड नहीं बना था. हाल ही में गढ़वा में 64 वर्षीय वृद्ध विधवा महिला प्रेमनी कुंवर ने भी खाने के अभाव में दम तोड़ दिया. आधार सम्बंधित समस्याओं के चलते उनको राशन पेंशन नहीं मिल पाया था. लेकिन राज्य सरकार ने इन गरीबों की भूख से हुई मौत को न सिर्फ बीमारी से हुई मौत साबित करने की कोशिश की, बल्कि मुख्यमंत्री ने तो 11 वर्षीय संतोषी कुमारी की मौत को “साजिश” तक कह डाला.

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झारखंड में राशन वितरण की व्यस्था ध्वस्त हो गयी है

लगातार हुई भूख से मौतों ने साबित कर दिया है कि झारखंड में राशन वितरण की व्यस्था ध्वस्त हो गयी है एवं खाद्य सुरक्षा को लेकर राज्य में आपातकालीन स्थति है एवं जिसके लिए कोइ और नहीं बल्कि झारखंड की भाजपा सरकार ही जिम्मेदार है. राज्य सरकार कानून को बेहतर ढंग से लागू करने के बजाय बिलकुल तानाशाही तरीके से राशन कार्ड एवं राशन के लिए आधार अनिवार्य करना जैसे प्रावधान लागू कर रही है. जिससे लाखो रोज कमाने खाने वाले जरूरतमंद परिवार भुखमरी के कगार पर धकेल दिए गए हैं. ऐसा नहीं है कि सरकार के पास अनाज की कमी है. सरकार के पास पर्याप्त अनाज हैं, लेकिन राज्य सरकार अनाज के कालाबजारी के लिए जिम्मेदार भ्रष्ट  डीलरो एवं अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई न कर राज्य की गरीब जनता के खिलाफ ही कार्रवाई कर रही है. लाखों योग्य एवं जरूरतमंद परिवारों को फर्जी बतलाकर उनका राशन कार्ड मात्र इसलिए रद्द कर दिया गया है क्योंकि आधार से नहीं जोड़ा गया था . इतना ही नहीं गरीब मेहनत कर के कमाने वालों का राशन कार्ड रद्द कर सरकार करोड़ों रुपये बचाने का भी दावा कर रही है.

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राशन कार्डधारियों को भी हक का अनाज नहीं मिल रहा

ऐसा नहीं है कि जिनका राशन कार्ड है, उनको उनके हक का अनाज मिल जा रहा है. राशन वितरण के लिए सरकार ने 80% से ज्यादा ऑनलाईन व्यवस्था लागू की है. राशन लेने में पहले से ज्यादा दिक्कत आ रही है. अगर मशीन में अंगूठा काम नहीं करता है या नेटवर्क नहीं रहता है तो लोगों को उनका राशन नहीं मिल पाता है. राशन कार्ड रहने के बावजूद भी लोगों को महीनों तक राशन नहीं मिल पा रहा है. इसके अलावा कई योग्य जरूरतमंद परिवारों का बार-बार आवेदन देने के बावजूद भी राशन कार्ड नहीं बना है. राशन कार्ड बन भी गया तो परिवार के सभी सदस्यों का उसमें नाम ही नहीं है. आसमान छूती महंगाई के बीच मामूली मजदूरी पर रोज कमाने खाने वाले परिवार के लिए 1 रुपये के दर पर मिलने वाला सस्ता अनाज भूख से व्यापक सुरक्षा देता है. लेकिन सरकार उनसे यह न्यूनतम मामूली सुविधा भी छीन लेना चाहती है.

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झारखंड सरकार लोगों से भोजन भी छीन रही है

झारखंड की भाजपा सरकार की नीतियां न सिर्फ लोगों से उनका भोजन छीन रही है, बल्कि कृषि संकट को भी बढ़ावा दे रही हैं. इस साल झारखंड में न सिर्फ चार भूख से मौतें हुई हैं बल्कि आठ किसानों ने आत्मह्त्या भी की है.  खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत सरकार से यह भी उम्मीद की गयी है कि वह अनाज के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि में व्यापक सुधार करेगी. लेकिन झारखंड सरकार भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन एवं लैंड बैंक द्वारा राज्य की कृषि योग्य उपजाऊ जमीन को बड़ी-बड़ी कम्पनियों को सौंपकर झारखंड में खाद्य सुरक्षा एवं विस्थापन का संकट पैदा कर रही है. झारखंड की भाजपा सरकार अगर इस आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाये तो आने वाले दिनों में भूख से मौत एवं किसानों की आत्महत्या का सिलसिला चलता रहेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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