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छत्तीसगढ़ के दर्जनों गांवों में लटक रहे ताले

रायपुर: छत्तीसगढ़ के दर्जनों गांवों के घरों पर इन दिनों ताले लटक रहे हैं। एक रुपये किलो वाला सरकारी चावल भी ग्रामीणों को रास नहीं आ रहा है। काम की तलाश में लगातार ग्रामीण परिवार सहित पलायन करते जा रहे हैं। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड सहित विभिन्न माध्यमों से प्रतिदिन छत्तीसगढ़ियों का पलायन जारी है।

सूबे के बलौदा बाजार जिले के आंकड़े तो और भी चौंकानेवाले हैं, यहां पिछले एक माह से 500 से अधिक मजदूरों का प्रतिदिन पलायन हो रहा है। पलायन के लिए चर्चित लवन क्षेत्र में अब तक कुल 20 हजार मजदूरों का पलायन हो चुका है। इस कारण गांवों की गलियां वीरान हो गई हैं। लगभग 15 गांवों के सैकड़ों मकानों में आज ताले लटके हैं। भविष्य में यही स्थितियां जारी रही तो ज्यादातर गांव वीरान ही नजर आएंगे।

छत्तीसगढ़ सरकार मजदूरों के लिए रोजगार गारंटी जैसे अनेक रोजगार मूलक कार्य करा रही है। इसके बावजूद आदतन पलायन करने वाले मजदूर गांव में छह माह कृषि कार्य करने के बाद अगले छह माह के लिए पलायन कर रहे हैं।

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नए वर्ष पर एक जनवरी को साल के प्रथम दिन भी ग्राम हरदी व दतान के लगभग 300 मजदूरों ने फैजाबाद, अयोध्या के ईंटभट्ठा में काम करने के लिए पलायन किया।

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जानकारी के मुताबिक, ग्राम पैसर, चंगोरी, सेमरिया, सुनसुनिया अमलीडीह, कोयदा, करदा, मरदा, गंगई, बाजारभाठा, सरखोर, कोरदा, पड़रिया, चिचिरदा, हरदी, भालूकोना, चितावर, धारासीव, दतान खैरा सहित अनेक ग्रामों से प्रतिदिन सैकड़ों मजदूर किसान अन्य प्रदेश पलायन कर रहे हैं।

बताया जाता है कि लवन क्षेत्र के 60 गांवों से प्रतिवर्ष करीब 35 हजार किसान मजदूर अन्य स्थानों के लिए पलायन करते हैं। ये मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू कश्मीर, दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश सहित देश के अन्य हिस्सों में जाकर भवन निर्माण, नाली निर्माण, ईंटभट्ठा में काम करते हैं।

नए वर्ष के पहले ही दिन पलायन करने वालों में गंगू नेताम दतान, पवन लाला निषाद, तेजराम ध्रुव, रामहिन, पुनुराम निषाद, ननकी नोनी, कन्या कुमारी, आनंद, धनेश्वर जानकी आदि प्रमुख हैं। लवन से 13 किलोमीटर दूर ग्राम दतान के 55 मजदूर ट्रैक्टर से बिलासपुर जाने के लिए लवन पहुंचे। र उनसे हुई मुलाकात में उन्होंने बताया, “हम लोग फैजाबाद जा रहे हैं।”

इसी तरह उत्तम निषाद (52) ने बताया, “खेती के लिए जमीन नहीं है, ठेके पर लेकर व गांव में मजदूरी करते हैं। इससे सात लोगों के परिवार का भरण-पोषण नहीं हो पाता, इसलिए काम करने हम बाहर जा रहे हैं।” उनका कहना है कि सरपंच ने गरीबी रेखा कार्ड तक नहीं बनाया, इसलिए गांव छोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

कंस निषाद ने बताया, “हम 55 मजदूर एक साथ गांव छोड़कर जा रहे हैं। साथ में 15 बच्चें भी हैं। हम लोग फैजाबाद में ईंट बनाने का काम करेंगे।” उसने बताया कि एक हजार ईंट बनाने पर 400 रुपये मिलते हैं। दो मजदूर मिलकर दो हजार से ज्यादा ईंट बना लेते हैं। इस तरह हमें प्रतिदिन 400 से 500 रोजी मिलती है। हम लोग 6 माह काम करने के बाद गांव वापस आ जाएंगे।

ग्राम दतान के ये 55 मजदूर लवन से बिलासपुर के लिए दो बसों में सवार होकर रवाना हुए जहां से वे शाम 6 बजे ट्रेन से फैजाबाद के लिए रवाना हुए हैं। ग्राम हरदी के 32, चितावर के 29, सरखोर के 65 मजदूरों ने भी पलायन किया। लवन इलाके में 8-10 कथित लाइसेंसी मजदूर दलाल भी हैं। इसके अलावा कसडोल,मस्तूरी व पामगढ़ क्षेत्र के मजदूर दलाल अंचल में घूमते नजर आते हैं।

फसल कटने के बाद छेरछेरा पर्व तक मजदूरों के पलायन का सिलसिला चलता रहता है। दलाल को 5 से 10 मजदूर ले जाने का अधिकार रहता है। इसके बाद भी वे सैकड़ों की संख्या में मजदूरों का पलायन कराते हैं।

ग्राम चितावर के गनेशु सतनामी जो नागपुर नहर नाली में काम करने जा रहा था, ने बस स्टैंड पर बताया कि उसके पास गांव में करीब आधा एकड़ खेत है। परिवार में 7 सदस्य हैं। उसका कहना है कि गरीबी रेखा के चावल से पेट नहीं भरता, वहीं सरकार काम नहीं दे रही है। इस कारण परिवार के दो सदस्यों को छोड़कर शेष 5 सदस्य पलायन कर रहे हैं। वहां छह माह काम करने के बाद आषाढ़ माह में वापस आएंगे।

दूसरी तरफ, मजदूरों के पलायन के संबंध में जनपद पंचायत बलौदा बाजार के मुख्य कार्यपालन अधिकारी हरिशंकर चौहान का साफ कहना है कि गांव-गांव में रोजगार गारंटी के तहत लोगों को काम दिया जा रहा है। इसमें मजदूर काम नहीं करना चाहते, ज्यादा पैसे के लालच में वे पलायन कर रहे हैं। इसके बावजूद प्रयास कर रहे हैं कि पलायन कम हो।”

यह तो सिर्फ एक जिले की बात है। बेमेतरा, बालोद, कवर्धा, गरियाबंद, दुर्ग, धमतरी सहित कई और जिलों से भी पलायन की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। समय रहते यदि इस पर ठोस पहल नहीं की गई तो पलायन का सीधा असर लोकसभा चुनाव के मतदान पर पड़ सकता है। (आईएएनएस)

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