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चाचा ने चार साल पहले भतीजी को दिल्ली में बेचा, सीरमटोली के राजा ने घर पहुंचाया

NEWSWING
Ranchi, 13 September :
राजा और बहुमनी की यह कहानी बॉलिवुड की बहुचर्चित फिल्म बजरंगीभाई जान की कहानी से मिलती जुलती है. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम के तास्ता गांव की रहने वाली बहुमनी के लिए रांची सीरमटोली के राजा किसी फरिश्ते से कम नहीं. राजा राउंड टेबल संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. चार साल पहले चाचा के हाथों दिल्ली में बेचे जाने के बाद आखिरकार राजा के तीन दिनों के अथक प्रयास के बाद 9 सितंबर को बहुमनी अपने घर पहुंच पाई. यह सबकुछ राजा के दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण ही मुमकिन हो सका. वरना एक समय बाद मुश्किलों ने तो उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. एक नाबालिक आदिवासी लड़की जो मुंडारी के सिवा न कुछ बोल सकती थी ना समझ सकती है. जिसे ना अपने गांव का नाम पता था, न अपने घर वालों के बारे में कुछ बता पा रही थी. उसे घर पहुंचाना आसान नहीं था. हर एक कदम पर जोखिम था. पर उसका मासूम चेहरा और आशा भरी निगाहों ने राजा के अंतरआत्मा को झंगझोर कर रख दिया. यहीं से शुरू हुई यह दास्तां…

राजा के दोस्त अमित ने दी बहुमनी की जानकारी
राजा कहते हैं भगवान की इच्छा के आगे मनुष्य दुर्बल है. उन्होंने बताया कि दिल्ली में रह रहे उनके दोस्त अमित खुराना ने उन्हें बहुमनी के बारे बताया और नाबालिक को उसके घर पहुंचाने की इच्छा जतायी. इसके बाद सात सितंबर की सुबह बहुमनी अमित के नौकर और पत्नी के साथ रांची पहुंची. बहुमनी को असके घर पहुंचाने के लिए राजा ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. उन्होंने बताया कि यह जानते हुए की अगर कुछ गड़बड़ हो जाए तो यह गैर जमानती अपराध होगा. वह इस बच्ची को पुलिस को नहीं सौंपना चाहते थे. हर जोखिम उठाते हुए बच्ची को घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया. 

एडीजीपी अनुराग गुप्ता ने किया सहयोग
दिल्ली से रांची और रांची से सारंडा के घने जंगलों को पार करते हुए बहुमनी को उसका घर मिल ही गया. हर तरह से प्रयास करने के बाद तब निराशा हाथ लगी तो एक पल के लिए राजा ने भी हार मान लिया था. पर बच्ची को अपनी जिम्मेवारी मानते हुए उन्होंने एडीजीपी अनुराग गुप्ता का सहयोग मांगा. राजा ने बताया कि बहुमनी किस भाषा में बात कर रही थी, वह समझना बहुत जरूरी था. इसके लिए उन्होंने उसे बकरी, डेक्ची दिखाकर यह जानना चहा कि उसकी भाषा में इसे क्या कहते हैं. जवाब के आधार पर एक आदमी ने बताया यह शहर से 40 किमी दूर पहाड़ी के उस पार की भाषा है. साथ ही उधर ना जाने की हिदायद भी दी. शहर के 190 किमी का सफर तय करने के बाद एक हाट दिखा जहां उसने अपने गांव के मुखिया को पहचाना. सोनुआ थाना में केस दर्ज कराने के बाद लड़की को पिता को सौंपा गया. 

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राज्य में लगातार बढ़ रहे मानव तस्करी के मामले अगर देखें तो एक आंकड़े के मुताबित यह हर साल बढ़ रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार का जो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा है वह आखिर कबतब सफल हो पाएगा. क्योंकि प्रेत्येक वर्ष झारखंड से कई नाबालिग बच्चों की तस्करी बदस्तूर जारी है. 

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