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कौन लेता है जेएमएम के बड़े फैसले, आखिर किसके कब्जे में हैं कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन?

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Pravin Kumar/Saurabh Shukla

NEWSWING Ranchi, 07 December : झारखंड आंदोलन की एक बड़ी पार्टी (जेएमएम) के युवा नेता हेमंत सोरेन अपने पिता की राजनीतिक विरासत को मजबूती के साथ संभाल रहे हैं. पार्टी ने सर्वमान्य रूप से उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया. युवा नेता ने राज्य में तेज तर्रार नेता के रूप में खुद को स्थापित किया. उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता पिछले कई चुनावों में दिखाया भी है, लेकिन इधर कुछ दिनों से पार्टी के अंदर हेमंत के फैसलों को लेकर असंतोष उभरना शुरु हुआ है. दबे स्वर में पार्टी के कई कार्यकर्ता कहते हैं कि हेमंत सोरेन किसी और प्रभाव में हैं. पार्टी के अंदर मौजूद नाटे कद-काठी वाले एक शख्स के सलाह के बिना वे कोई काम नहीं करते. कहा तो यहां तक जा रहा है कि दूसरे राज्य से रजिस्टर्ड स्कॉर्पियो पर चलने वाले उस शख्स के बिना इजाजत पार्टी के अंदर पत्ता तक नहीं हिलता. जिस शख्स की बात हो रही है वह कोई जननेता नहीं हैं, पर पार्टी में बोलने वाले पद पर है और हेमंत सोरेन के साथ हमेशा साये की तरह नजर आते हैं. चाहे प्रेस कॉन्फ्रेंस हो, सभा हो या कोई भी महत्वपूर्ण बैठक हो, वो महाशय हर जगह उनके साथ नज़र आते हैं. हेमंत के आवास पर भी वह हमेशा नजर आते हैं.

पार्टी में बढ़ती जा रही नाराजगी

इन दिनों यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि हेमंत सोरेन को आखिर एक व्यक्ति किन कारणों से नियंत्रित कर रहा है. इससे पार्टी के वरिष्ठ निष्ठावान नेता से लेकर कार्यकर्ता तक को परेशानी हो रही है, साथ ही पार्टी में नाराजगी भी बढ़ती जा रही है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक कहा तो यह भी जा रहा है पार्टी एक व्यक्ति के कारण अपनी विपक्ष की बड़ी और संघर्षशील भूमिका का निर्वाहन नहीं कर पा रही है. इसका एक हेमंत पर मानसिक रूप से एक व्यक्ति द्वारा कब्जा कर लिया जाना है. इससे ना केवल पार्टी की नीतियां प्रभावित हो रही हैं बल्कि वह मुख्य विपक्षी दल के रूप में झारखंड की जनता के आक्रोश, तकलीफ और आकांक्षा के स्वर भी नहीं दे पा रहा है. जब पार्टी सरकार के जन विरोधी नीतियों के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार करती है, तब वह इसे सुस्त कर देता है.

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हर मामले में हस्तक्षेप से परेशान हैं जेएमएम के नेता

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि किसी राजनीतिक विषय पर कार्यकारी अध्यक्ष से विचार-विमर्श करने के दौरान भी वह व्यक्ति बीच में हस्तक्षेप करता है. मुद्दे को दूसरे विषय की ओर मोड़ देता है. ऐसा पार्टी के किसी एक पदाधिकारी के साथ नहीं हुआ, बल्कि कई वरिष्ठ नेता और विधायक एवं संसद के साथ हो चुका है. पार्टी के निष्ठावन कार्यकता परेशान हैं. वे कहते हैं कि आखिर हम अपनी पीड़ा किससे कहें. हाल के दिनों में ऐसी घटना आम हो गयी है.

हेमंत से मिलने से पहले पार्टी नेताओं को लेनी पड़ती है ‘महाशय’ की आज्ञा

पार्टी में उनका कद इतना बड़ा हो चुका है कि कार्यकारी अध्यक्ष भी उनके सामने नतमस्तक हैं. वह व्यक्ति गणमान्य लोगों, विधायकों, सांसदों को भी घंटों इंतजार में बिठाये रखते हैं. पार्टी के हर मुद्दे, आंदोलन यहां तक कि पार्टी की रणनीति तैयार करने और उसे अंतिम रूप देने से पहले उस व्यक्ति की सहमति-असहमति बहुत ही मायने रखती है. इस वजह से पार्टी को अपनी कई आंदोलन और जन मुद्दों से पीछे हटना पड़ा. पार्टी के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं को भी कार्यकारी अध्यक्ष से बात करने से पूर्व उनसे बात करना पड़ता है.

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पार्टी में शामिल होने आये लोगों को चार बार टाला

हाल के दिनों में उस व्यक्ति का हस्तक्षेप चर्चा का विषय बना हुआ है. दरअसल, पड़ोसी राज्य ओडिशा के एक नेता अपने कार्यकर्ताओं सहित जेएमएम में शामिल होना चाहते थे. उक्त व्यक्ति ने पहले उन्हें मिलने के लिए 14 नवंबर का समय दिया. इसके बाद समय को बदलते हुए 23 नवंबर का दिन निर्धारित किया गया. पर उस दिन भी उक्त व्यक्ति ने ओडिशा के नेता और कार्यकर्ताओं से मुलाकात नहीं की और मीटिंग को टाल दिया. फिर उन्हें एक दिसंबर और पांच दिसंबर का समय दिया गया पर भेंट नहीं की गयी.

कई बार टालने के बाद हेमंत से मिलवाया

पांच दिसंबर को पार्टी में शामिल होने आये विधायक को जब समय नहीं मिला तो वे निराश हो कर वापस लौटने लगे. तोरपा पहुंचने पर उन्हें रास्ते में जेएमएम के एक नेता ने फोन किया और छह दिसंबर को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष के आवास पर आने को कहा गया. छह दिसंबर को ओडिशा के नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ निर्धारित स्थान पर पहुंचे. वहां पहुंचने पर उस विशेष व्यक्ति ने नेता और कुछ कार्यकर्ताओं को कार्यकारी अध्यक्ष से मिलवाया. वहीं, आधे कार्यकर्ताओं को गेट के बाहर ही रोक दिया. मौके पर उस व्यक्ति की सहमति के बाद ओडिशा से आये नेता और कार्यकर्ताओं को पार्टी की सदस्यता मिली.

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हेमंत को भाजपा भगाओ रैली में शामिल नहीं होने दिया

यह भी बात सामने आयी है कि अक्टूबर 2017 में हुई भाजपा भगाओ झारखंड बचाओ रैली में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष ने रैली में सम्मिलित होने की सहमति दी थी. विपक्षी पार्टियों का कहना है कि उस व्यक्ति ने ही कार्यकारी अध्यक्ष को रैली में शामिल न होने की सलाह दी थी. उसकी बात मान कर ही कार्यकारी अध्यक्ष रैली में शामिल नहीं हुए. इस वजह से झारखंड में विपक्षी पार्टियों में नाराजगी है.

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