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कुदरत ने बच्चियों को बनाया ज्यादा मजबूत, फिर भी हार जाती हैं जिंदगी की जंग

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भारत में नवजात बच्चियों की मृत्यु दर चिंताजनक

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Priyanka

भारत में कहने को तो नारी को शक्ति का रुप माना जाता है. उसकी पूजा की जाती है. लेकिन उसी नारी को या तो जन्म लेने से पहले ही मारने की कोशिश होती है. या फिर जन्म लेने के बाद परिवार की लापरवाही उनकी जान ले लेते है. भले ही देश की सरकार बेटियों को बचाने के लिए कई योजनाएं चलाये. उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के दावे करें, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि आज भी देश में बेटियों की हालत दयनीय है. देश में सेक्स रेशियो और बच्चियों का मृत्यु दर इस बात का सूचक है. और ये हम नहीं ब्लकि बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ का कहना है. यूनिसेफ की हाल की जानकारी में बताया गया कि जन्म के समय भले ही बच्चियां, शारीरिक तौर पर लड़के से ज्यादा मजबूत होती हैं. लेकिन भारत ही एक ऐसा देश है जहां नवजात बच्चियों की मृत्युदर बच्चों से ज्यादा है. यूनिसेफ के आंकड़ों की मानें तो इस साल भारत में, लगभग 6 लाख बच्चों की एक महीने के पहले ही मौत हो जायेगी.

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क्यों होती है नवजात बच्चियों की मौत ?

यूनिसेफ की स्टडी के मुताबिक भारत जैसे नवजात बच्चियों की मौत का बड़ा कारण सामाजिक असमानता है. समाज की रुढ़िवादी विचारधाराओं के कारण परिजन बच्चियों के प्रति लापरवाह रवैया रखते हैं. जबकि यूनिसेफ की ही एक रिपोर्ट में भारत को उन दस देशों में रखा गया है, जहां नवजात बच्चों को जीवित रखने के लिए सर्वाधिक ध्यान देने की जरूरत है. सबसे अधिक ध्यान बच्चे के जन्म लेने के बाद के चार सप्ताहों पर देना होता है. नवजात के मरने का जोखिम सबसे अधिक पहले दिनफिर पहले सप्ताह और फिर पहले महीने तक होता है.  बच्चियों के स्वास्थ्य को लेकर परिजन कितने लापरवाह होते है, इसका खुलासा भी यूनिसेफ की रिपोर्ट से होता है. दरअसल नवजात के मृत्युदर को घटाने को लेकर जिला अस्पतालों में नवजात शिशु सघन चिकित्सा इकाइयां होती हैं जहां नि:शुल्क सेवा दी जाती है. इन इकाइयों में साल 2017 में लड़कों की तुलना में डेढ़ लाख कम लड़कियों को भर्ती कराया गया. ये बताता है कि लोग लड़कियों को इलाज के लिए कम लाते हैं. यदि लड़कियां एक बार इन केन्द्रों पर आ जाये तो उनकी जान बचायी जा सकती है.

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बच्चों की मृत्यु का उनकी मां के शिक्षित होने से गहरा नाता

नवजातों की मृत्यु का उनकी मां के शिक्षित होने से बहुत गहरा नाता है. यदि मां अशिक्षित है तो उसके बच्चे के मरने का जोखिम 2.71 प्रतिशत अधिक होता है. अशिक्षित मां ना तो अपने स्वास्थ्य के लिये ना ही अपने बच्चे के स्वास्थ्य के लिये जागरुक होगी. इसके विपरीत अगर मां शिक्षित हो तो इसका असर टीकाकरणसंस्थागत प्रसव आदि उपायों पर भी स्पष्ट देखने को मिलता है. इसलिये बेटियों को बचाना है तो बेटियों को पढ़ाना बबेहद जरुरी है.

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